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चाचा छक्कन ने खत लिखा

हिंदी हास्य साहित्य — चाचा छक्कन6 मिनट का पठन
चाचा छक्कन ने खत लिखा

चाचा छक्कन को महीने-दो महीने में कभी-कभार कोई 'खत' लिखने का दौरा पड़ता था। और जब यह दौरा पड़ता था, तो पूरे घर में ऐसा 'अलर्ट' जारी हो जाता था जैसे कोई बहुत बड़ा सरकारी काम होने वाला हो।

एक दिन सुबह-सुबह चाचा जी ने घोषणा की, "आज मुझे अपने पुराने दोस्त मुंशी जी को एक बहुत ही ज़रूरी खत लिखना है। घर में कोई शोर नहीं मचाएगा!"

यह सुनते ही घर के सभी नौकर और बच्चे अपने-अपने कामों में चौकन्ने हो गए। चाचा जी अपने कमरे में गद्दा बिछाकर, मसनद (तकिए) के सहारे बिल्कुल किसी नवाब की तरह बैठ गए।

"लल्लू! ओ लल्लू!" चाचा जी ने आवाज़ लगाई। लल्लू दौड़ता हुआ आया, "जी चाचा जान!"

"जा, मेरा कलमदान और दावात लेकर आ। और सुन, कागज़ का वह नया दस्ता भी लेते आना।"

लल्लू सामान लेकर आया। चाचा जी ने कागज़ निकाला, लेकिन जैसे ही कलम दावात में डुबोई, पता चला कि दावात बिल्कुल 'सूखी' हुई है। उसमें स्याही का एक कतरा भी नहीं था।

चाचा जी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। "अरे इस घर में तो कोई चीज़ ठिकाने से नहीं मिलती! दावात सूख गई है और किसी को खबर तक नहीं? लल्लू, दौड़ कर जा और बाज़ार से नीली स्याही की नई शीशी लेकर आ! और जल्दी आना, मेरा खत बहुत ज़रूरी है।"

लल्लू बाज़ार दौड़ा। तब तक चाचा जी ने चची को आवाज़ लगाई, "अरी सुनती हो! मेरी 'ऐनक' (चश्मा) कहाँ है? बिना ऐनक के मैं खत कैसे लिखूँगा?"

चची रसोई से हाथ पोंछती हुई आईं, "यहीं कहीं मेज़ पर रखी होगी, ढूँढ लीजिए।" "मैं ढूँढूँ? इस घर में सारे काम मुझे ही करने पड़ते हैं!"

पूरा घर चश्मा ढूँढने में लग गया। तकिए हटाए गए, बिस्तर झाड़े गए, अलमारियाँ खोली गईं। आधा घंटा बीत गया। तभी छोटे बेटे 'मुन्ने' की नज़र चाचा जी के चेहरे पर पड़ी। "अब्बा जान! ऐनक तो आपके 'माथे पर' चढ़ी हुई है!"

चाचा जी ने झेंपते हुए अपना हाथ माथे पर लगाया। ऐनक वहीं थी! "हम्म... मुझे पता था! मैं तो बस तुम लोगों की फुर्ती देख रहा था।" चाचा जी ने ऐनक नाक पर टिका ली।

इतने में लल्लू स्याही लेकर आ गया। चाचा जी ने स्याही की शीशी खोली और उसे दावात में पलटने लगे। लेकिन चाचा जी ठहरे चाचा जी! शीशी उनके हाथ से फिसल गई और 'छपाक्!'... सारी नीली स्याही उनके सफेद कुरते, उनके हाथों और नीचे बिछे महँगे कालीन पर गिर गई!

"हाय अल्लाह! कालीन!" चची सिर पकड़ कर बैठ गईं। चाचा जी के हाथ नीले हो गए थे, मुँह पर भी नीले छींटे थे। "अरे यह शीशी ही खराब थी! इसमें ढक्कन ढीला था। जल्दी से कोई गीला कपड़ा लाओ!"

फिर से घर में भाग-दौड़ मची। कपड़े बदले गए, कालीन पोंछा गया, चाचा जी के हाथ धुलाए गए। इस सब में दोपहर के बारह बज गए।

आखिरकार, सब कुछ साफ हुआ। नई स्याही आई। कागज़ रखा गया। चाचा जी ने बहुत ही शान से कलम उठाई, उसे स्याही में डुबोया, ऐनक को उँगली से नाक पर सेट किया और कागज़ पर झुक गए।

लेकिन जैसे ही उन्होंने पहली लाइन लिखनी शुरू की, कलम की 'निब' टूट गई! 'कड़च्!'

चाचा जी ने कलम को घूरते हुए कहा, "देखा! इसे कहते हैं पनौती। इस घर में कोई इंसान चैन से एक खत भी नहीं लिख सकता। लल्लू! जा चाक़ू ले कर आ, मैं कलम को छीलूँगा।"

लल्लू चाक़ू लाया। चाचा जी ने कलम छीलना शुरू किया, तो छीलते-छीलते उन्होंने पूरी कलम ही छोटी कर दी।

दोपहर के दो बज चुके थे। बच्चे स्कूल से आ गए थे। चची ने कहा, "खाना तैयार है, खा लीजिए। खत बाद में लिख लीजिएगा।" चाचा जी ने डांटते हुए कहा, "खाना? यहाँ इतना अहम खत लिखा जा रहा है और तुम्हें खाने की सूझ रही है? जब तक यह खत पूरा नहीं होगा, इस घर में कोई रोटी नहीं तोड़ेगा!"

दोबारा नई कलम आई। अब बिल्कुल सन्नाटा था। चाचा जी ने फिर से कागज़ पर कलम रखी। उन्होंने लिखा— 'मेरे अज़ीज़ दोस्त मुंशी जी...'

इतना लिखने के बाद चाचा जी रुक गए। उन्होंने कलम कान के पीछे लगाई। आसमान की तरफ देखा। अपनी दाढ़ी खुजाई।

दस मिनट तक वे ऐसे ही आसमान को घूरते रहे।

चची ने परेशान होकर पूछा, "अब क्या हुआ? अब कौन सी आफत आ गई?"

चाचा जी ने बहुत ही मासूमियत और बेचैनी से अपनी पत्नी की तरफ देखा और बोले: "अरी भाग्यवान! सुबह से स्याही, ऐनक और कलम के चक्कर में मेरा दिमाग इतना खराब हो गया कि मैं बिल्कुल भूल ही गया हूँ कि मुझे मुंशी जी को खत लिखना किस बारे में था! मुझे याद ही नहीं आ रहा कि मैं उनसे क्या कहना चाहता था!"

चची ने एक गहरी साँस ली, अपना सिर दीवार पर टिकाया और बोलीं, "या अल्लाह! मुझे उठा ले! लल्लू, दस्तरख्वान बिछाओ, खाना खाएँगे सब। खत अब अगले महीने लिखा जाएगा!"

और चाचा छक्कन का वह 'ज़रूरी खत' सिर्फ एक लाइन पर ही खत्म हो गया!

🎉 कहानी समाप्त

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