चाचा छक्कन की छतरी

बरसात का मौसम था। सुबह से आसमान में काले बादल छाए हुए थे। चाचा छक्कन को किसी ज़रूरी काम से बाज़ार जाना था। उन्होंने अपनी शेरवानी पहनी, सिर पर टोपी रखी और दरवाज़े तक पहुँचे।
तभी बाहर हल्की-हल्की बूँदाबाँदी शुरू हो गई।
चाचा जी ने दरवाज़े से ही आवाज़ लगाई, "लल्लू! ओ लल्लू! ज़रा दौड़ कर मेरी 'काली छतरी' लाना। पानी बरसने लगा है।"
लल्लू दौड़ता हुआ दालान में गया, लेकिन उसे छतरी कहीं नहीं मिली। "चाचा जान! दालान में तो छतरी नहीं है।"
चाचा जी का पारा तुरंत चढ़ गया। "दालान में नहीं है? तो क्या छतरी के पर निकल आए और वह उड़ कर आसमान में चली गई? इस घर में किसी चीज़ की कोई हिफाज़त नहीं है! जो चीज़ जहाँ रखनी चाहिए, वहाँ कभी नहीं मिलती।"
चाचा जी वापस घर के अंदर आ गए। उन्होंने अपनी शेरवानी के बटन खोले और अपनी छतरी की तलाश शुरू कर दी।
"अरी सुनती हो!" चाचा जी ने चची को आवाज़ दी, "मेरी वह नई काली छतरी कहाँ छिपा कर रख दी तुमने? मुझे बाज़ार जाने में देर हो रही है।"
चची रसोई का काम छोड़कर बाहर आईं। "मैंने कहाँ छिपानी है आपकी छतरी? कल शाम को जब आप नवाब साहब के घर से लौट कर आए थे, तो आपने खुद ही उसे कहीं रखा होगा।"
"मैंने रखी होगी? तुम लोगों का बस चले तो सारी दुनिया की गलतियाँ मेरे सिर मढ़ दो। मुझे अच्छी तरह याद है, कल शाम को मैंने अपनी छतरी दालान में उस बड़ी वाली कुर्सी के पास रखी थी।"
पूरे घर में छतरी का 'सर्च ऑपरेशन' शुरू हो गया।
लल्लू बैठक में छतरी ढूँढ रहा था। चची रसोई और आँगन में ढूँढ रही थीं। बच्चे बिस्तर के नीचे और अलमारियों के पीछे छतरी तलाश रहे थे।
चाचा जी बीच-बीच में खड़े होकर सबको हिदायतें और ताने दे रहे थे। "अरे उस कोने में ठीक से देखो! लल्लू, तू तो बिल्कुल अंधा है, कल वाली अख़बार के नीचे देख, कहीं वहाँ तो नहीं दबी है? तुम सबने मिलकर मेरी महँगी छतरी गुम कर दी। अब मैं बाज़ार कैसे जाऊँगा?"
आधा घंटा बीत गया। पूरा घर पसीने से तर-बतर हो गया, लेकिन वह 'काली छतरी' कहीं नहीं मिली।
चाचा जी गुस्से में बड़बड़ाते हुए एक कुर्सी पर बैठ गए। "बस! अब इस घर में कोई नई चीज़ नहीं आएगी। मैं कल ही बाज़ार जाकर एक और छतरी खरीदूँगा और उसे 'ताले' में बंद करके रखूँगा ताकि कोई उसे हाथ न लगा सके!"
तभी छोटा बेटा 'मुन्ने' खेलते-खेलते चाचा जी के पास आया। उसने चाचा जी को बहुत ध्यान से देखा और अपनी तोतली आवाज़ में बोला: "अब्बा जान! आप किस छतरी की बात कल ले हैं? क्या वह छतरी 'काले लंग' (रंग) की थी?"
चाचा जी ने झुँझलाते हुए कहा, "हाँ बेटा! काले रंग की थी। तुम सबने उसे कहीं घुमा दिया है।"
मुन्ने ने अपनी छोटी सी उँगली उठाई और चाचा जी की 'बगल' की तरफ इशारा करते हुए बोला: "तो अब्बा जान... वह छतरी तो आपने अपनी 'बगल में' ही दबा लखी (रखी) है!"
चाचा जी ने झटके से अपनी बायीं बाँह नीचे की।
'धड़ाम्!' वह लंबी, काली और लकड़ी की मूठ वाली छतरी सीधा ज़मीन पर आ गिरी!
चाचा जी जब दरवाज़े से वापस अंदर आए थे, तो उन्होंने शेरवानी के बटन खोलने के लिए वह छतरी अपनी 'बगल' में दबा ली थी। और इसके बाद वे पूरे आधे घंटे तक, उसी छतरी को अपनी बगल में दबाए-दबाए, पूरे घर में हाहाकार मचाकर उसे ढूँढ रहे थे!
चची ने जब वह छतरी ज़मीन पर गिरती देखी, तो उन्होंने अपना सिर पकड़ लिया। "या अल्लाह! खुद छतरी बगल में दबा रखी है और पूरे घर को चोर साबित कर दिया! 'बगल में छोरा और शहर में ढिंढोरा' वाली कहावत आज बिल्कुल सच हो गई।"
चाचा जी का चेहरा मारे शर्म के लाल हो गया। उन्हें कोई बहाना नहीं सूझ रहा था।
उन्होंने झेंपते हुए छतरी उठाई और खाँसते हुए बोले: "हम्म... मुझे... मुझे तो पता ही था कि छतरी मेरी बगल में है। मैं तो बस यह देख रहा था कि तुम लोगों की नज़र कितनी तेज़ है! किसी की भी नज़र काम नहीं करती इस घर में!"
और यह फालतू सा तर्क देकर चाचा जी छतरी खोलते हुए, सिर झुकाकर जल्दी से बाज़ार की तरफ खिसक गए। पीछे से चची और बच्चों की ज़ोरदार हँसी पूरे घर में गूँज रही थी।
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