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चाचा छक्कन ने धोबी को कपड़े दिए

हिंदी हास्य साहित्य — चाचा छक्कन7 मिनट का पठन
चाचा छक्कन ने धोबी को कपड़े दिए

चाचा छक्कन के घर में 'धोबी को मैले कपड़े देना' और 'धुलकर आए कपड़ों का हिसाब रखना' चची का काम था। चची बहुत ही आसानी से यह काम कर लेती थीं।

लेकिन एक दिन चाचा जी का 'अकाउंटेंट' वाला दिमाग जाग गया।

सुबह-सुबह धोबी कपड़े लेने आया, तो चाचा जी ने उसे आँगन में ही रोक लिया। "रुक जाओ रमज़ू धोबी! आज से कपड़ों का हिसाब मैं खुद करूँगा। औरतों को हिसाब-किताब करना नहीं आता। तुम लोग कपड़ों की चोरी करते हो और इन्हें पता भी नहीं चलता। आज मैं तुम्हें दिखाऊँगा कि 'असली हिसाब' कैसे लिखा जाता है।"

चची ने कहा, "रहने दीजिए, यह सिरदर्दी वाला काम है। मैं कर लूँगी।" "चुप रहो! तुम बस घर के सारे मैले कपड़े आँगन में एक जगह इकट्ठा कर दो।"

घर के सारे मैले कपड़ों का एक बहुत बड़ा 'पहाड़' आँगन में लगा दिया गया।

चाचा जी ने एक लंबी सी कागज़ की पर्ची और कलम निकाली। उन्होंने ऐनक नाक पर टिकाई और ज़मीन पर उकड़ूँ बैठकर कपड़ों की गिनती शुरू की।

"हम्म... एक कुरता मेरा... दो पाजामे मुन्ने के... तीन... चार... पाँच टोपियाँ..." गिनती 'बीस' (20) तक पहुँची ही थी कि गली में से किसी कबाड़ी वाले ने ज़ोर से आवाज़ लगाई— "रद्दी पेपर ले लो!"

चाचा जी का ध्यान भटक गया। "अरे, यह कबाड़ी वाला रोज़ सुबह शोर मचाने आ जाता है। हाँ, तो मैं कहाँ था? बारह कपड़े हुए थे या पंद्रह?"

धोबी ने कहा, "हुज़ूर! आप बीस तक पहुँच गए थे।" चाचा जी ने धोबी को आँखें दिखाते हुए कहा, "तुम चुप रहो! तुम तो चाहते ही हो कि गिनती गलत हो जाए ताकि तुम मेरे कपड़े चुरा सको। मैं शुरू से गिनूँगा!"

चाचा जी ने दोबारा गिनती शुरू की। इस बार उन्होंने कपड़ों को सिर्फ गिनने के बजाय, उनकी 'डिटेल' भी लिखनी शुरू कर दी, ताकि कोई कपड़ा बदल न सके।

उनकी पर्ची पर कुछ ऐसा लिखा जा रहा था:

1 सफेद कुरता (जिसकी दायीं आस्तीन पर हल्दी का पीला दाग है)

1 पाजामा (जिसके नाड़े में एक मोटी सी गाँठ लगी हुई है)

1 तौलिया (जिसका एक कोना चूहे ने कुतर दिया है)

मुन्ने की 2 कमीज़ें (जिनमें से एक का कॉलर फटा हुआ है)

धोबी माथा पकड़ कर बैठा था। "हुज़ूर! सिर्फ गिनती लिख लीजिए। आप तो कपड़ों की पूरी जन्मपत्री लिख रहे हैं। मुझे और भी घरों में कपड़े लेने जाना है।"

चाचा जी ने डांटा, "मैं कोई बेवकूफ़ नहीं हूँ। तुम लोग अक्सर फटे हुए कपड़े देकर कहते हो कि 'हुज़ूर यह तो पहले से ही फटा था'। आज मैं एक-एक दाग और छेद का हिसाब लिखूँगा!"

इस जन्मपत्री को लिखने में पूरे दो घंटे लग गए। अंततः कुल कपड़ों की गिनती हुई— 'पैंतालीस' (45)।

चाचा जी ने बहुत ही गर्व से वह लंबी सी पर्ची अपने सामने रखी। पसीने से लथपथ चाचा जी उठे और बोले, "देखा! इसे कहते हैं परफेक्ट हिसाब। अब तुम एक कपड़ा भी इधर-उधर नहीं कर सकते। लल्लू! जा इन कपड़ों की 'गठरी' बाँध दे।"

लल्लू ने एक बड़ी सी चादर बिछाई। चाचा जी ने सारे 45 कपड़े उस चादर में रखे और उसे कसकर बाँध दिया।

धोबी गठरी सिर पर उठाकर जाने लगा।

तभी चची ने आकर पूछा, "कपड़े दे दिए? गिनती लिख ली पर्ची पर?"

चाचा जी ने शान से कहा, "बिल्कुल! पूरे 45 कपड़े हैं। और एक-एक कपड़े की निशानी भी लिख ली है। यह रही मेरी वह शानदार पर्ची..."

चाचा जी ने अपना हाथ ज़मीन की तरफ बढ़ाया, लेकिन वहाँ कोई पर्ची नहीं थी!

"अरे! पर्ची कहाँ गई? अभी तो मेरे सामने रखी थी।" लल्लू ने कहा, "चाचा जान, आपने पर्ची मुझे दे दी थी।" "तो तुमने क्या किया उसका?" लल्लू ने बहुत ही मासूमियत से कहा, "आपने ही तो कहा था कि सब कुछ चादर के अंदर डाल दो। मैंने वह 'पर्ची भी उन्हीं मैले कपड़ों के साथ गठरी के बिल्कुल बीचों-बीच' रखकर बाँध दी!"

चाचा जी का मुँह खुला का खुला रह गया। धोबी जो गठरी सिर पर उठाकर दरवाज़े तक पहुँच चुका था, चाचा जी ने उसे आवाज़ लगाई, "अरे रमज़ू! रुक जा!"

धोबी ने मुड़कर देखा, "अब क्या हुआ हुज़ूर?"

चाचा जी ने अपना सिर पीटते हुए कहा: "गठरी ज़मीन पर रख और उसे वापस खोल! मेरी वह शानदार हिसाब वाली 'पर्ची' उन मैले कपड़ों के बीच में ही दब कर बँध गई है! हमें उन पैंतालीस कपड़ों को फिर से बाहर निकालना होगा और तीसरी बार फिर से सारा हिसाब लिखना होगा!"

यह सुनते ही रमज़ू धोबी ज़मीन पर बैठ कर रोने लगा। चची ने ज़ोर से हँसते हुए अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया। और चाचा छक्कन उस दिन दोपहर के खाने तक, वापस उसी मैले कपड़ों के पहाड़ के बीच बैठकर, तीसरी बार कपड़ों के 'पीले दाग और फटे कॉलर' गिनते रहे!

🎉 कहानी समाप्त

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