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चाचा छक्कन ने केले खाए

हिंदी हास्य साहित्य — चाचा छक्कन6 मिनट का पठन
चाचा छक्कन ने केले खाए

गर्मियों की एक दोपहर थी। चची अपने मायके गई हुई थीं। चाचा छक्कन घर के आँगन में अपनी आरामकुर्सी पर लेटे हुए अखबार पढ़ रहे थे।

तभी गली में एक फल वाले की आवाज़ आई— "केले ले लो! मीठे-मीठे केले!"

चाचा जी को केले बहुत पसंद थे। उन्होंने फल वाले को अंदर बुलाया और बहुत ही मोल-भाव करके पूरे 'एक दर्जन (12) केले' खरीद लिए। केले बहुत ही पके हुए, खुशबूदार और पीले रंग के थे।

चाचा जी ने सोचा: "चलो, शाम को जब बच्चे स्कूल से लौटेंगे, तो सबको दो-दो केले खाने को दूँगा। तब तक इन्हें कमरे में टोकरी में ढक कर रख देता हूँ।"

चाचा जी ने केले कमरे में मेज़ पर रखे और वापस आकर आरामकुर्सी पर लेट गए। लेकिन उनका मन अब अखबार में नहीं लग रहा था। उनके नथुनों में उन पके हुए केलों की खुशबू बस गई थी।

थोड़ी देर बाद चाचा जी उठे और उस कमरे में गए। उन्होंने केलों की टोकरी देखी और खुद से तर्क किया: "अरे! फल वाले ने केले तो दे दिए, लेकिन क्या पता ये अंदर से सड़े हुए या कच्चे हों? अगर बच्चों ने खराब केले खा लिए, तो वे बीमार पड़ जाएँगे। एक ज़िम्मेदार पिता होने के नाते, मुझे एक केला चखकर देखना चाहिए कि वह ठीक है या नहीं!"

यह महान और 'ज़िम्मेदार' तर्क देकर चाचा जी ने एक केला छीलकर खा लिया। केला बहुत मीठा और स्वादिष्ट था।

अब चाचा जी ने फिर से केलों को देखा। ग्यारह केले बचे थे। चाचा जी ने एक और तर्क निकाला: "हम्म... एक केला तो मैंने 'चेक' करने के लिए खाया। लेकिन यह तो मेरा 'हक' नहीं था। मैं घर का मुखिया हूँ। एक दर्जन में से दो केले तो मेरे हिस्से में भी आते हैं। तो मुझे अपने हिस्से के दो केले अभी खा लेने चाहिए!"

उन्होंने दो केले और खा लिए।

अब बचे नौ केले। चाचा जी कमरे से बाहर आए, लेकिन पाँच मिनट बाद फिर अंदर चले गए।

इस बार उनका तर्क था: "मेरी बीवी (चची) तो मायके गई हुई है। वह रात तक आएगी। तब तक ये इतने पके हुए केले खराब हो जाएँगे। और वैसे भी उसे केलों से खाँसी हो जाती है। इसलिए उसका हिस्सा खराब करने से अच्छा है कि मैं ही उसके हिस्से के दो केले खा लूँ!"

चाचा जी ने दो केले और गटक लिए। अब सिर्फ सात केले बचे थे।

चाचा जी ने टोकरी को घूरते हुए सोचा: "मेरा सबसे छोटा बेटा 'मुन्ने' अभी बहुत छोटा है। अगर उसने इतना बड़ा केला खा लिया, तो उसके पेट में दर्द हो जाएगा। मुझे उसकी सेहत का ध्यान रखना चाहिए। मुन्ने के हिस्से के केले उसे नुकसान पहुँचा सकते हैं!"

और यह सोचकर उन्होंने मुन्ने के हिस्से के भी दो केले खा लिए।

देखते ही देखते, चाचा छक्कन ने हर केले के लिए कोई न कोई नया 'दार्शनिक और पारिवारिक' बहाना बनाया और आधे घंटे के अंदर पूरा का पूरा एक दर्जन (12) केलों का गुच्छा साफ कर दिया! टोकरी में सिर्फ 'छिलके' बचे थे।

शाम को जब बच्चे स्कूल से आए, तो उन्होंने फल वाले को गली से जाते देखा। बड़ा बेटा दौड़कर चाचा जी के पास आया और बोला, "अब्बा जान! आपने फल वाले से केले नहीं खरीदे? मुझे बहुत भूख लगी है!"

चाचा जी, जिनका पेट 12 केले खाकर बिल्कुल 'गुब्बारे' की तरह फूल चुका था और जिन्हें डकारें आ रही थीं, उन्होंने बहुत ही 'मासूमियत और गुस्से' का मिला-जुला नाटक करते हुए कहा:

"अरे बेटा! मैं तो तुम्हारे लिए एक दर्जन बेहतरीन केले लाया था। लेकिन तुम बच्चों की किस्मत ही खराब है! मैंने केले मेज़ पर रखे थे, तभी पड़ोस की 'काली बिल्ली' कमरे में घुस आई। मैंने उसे भगाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह बिल्ली इतनी भूखी थी कि मेरे देखते ही देखते, छिलका छील-छील कर पूरे के पूरे बारह केले खा गई! मैंने तो बस तुम लोगों के लिए ये छिलके बचाकर रखे हैं ताकि तुम यकीन कर सको!"

बच्चे हैरानी से एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। आज तक दुनिया में किसी ने ऐसी 'बिल्ली' नहीं देखी थी जो केले का छिलका उतारकर केला खाती हो!

लेकिन पिता जी की बात कौन टालता? चाचा छक्कन अपना पेट सहलाते हुए वहाँ से खिसक गए, और बच्चे उस 'केले खाने वाली चमत्कारी बिल्ली' को ढूँढने में लग गए!

🎉 कहानी समाप्त

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