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चाचा छक्कन ने तस्वीर टाँगी

हिंदी हास्य साहित्य — चाचा छक्कन6 मिनट का पठन
चाचा छक्कन ने तस्वीर टाँगी

चाचा छक्कन के घर का एक नियम था— जब भी घर में कोई नया काम होता, चाचा जी उसे खुद करने की ज़िद पकड़ लेते थे, और फिर पूरे घर की शामत आ जाती थी।

एक दिन बाज़ार से शीशे में मढ़ी हुई एक बहुत ही खूबसूरत 'तस्वीर' घर आई। चची ने नौकर से कहा, "लल्लू! इसे बैठक में दीवार पर टाँग दे।"

तभी चाचा छक्कन ने अखबार से सिर उठाया और बोले, "अरे रुको! तुम औरतों और नौकरों को कोई काम ढंग से करना नहीं आता। तस्वीर टाँगना कोई बच्चों का खेल है? लाओ, इसे मैं खुद अपने हाथों से दीवार पर टाँगूँगा। तुम सब बस देखते जाओ कि सलीके से काम कैसे होता है!"

बस, घर में 'इमरजेंसी' लागू हो गई। चाचा जी ने अपना कोट उतारा और उसे चची के हाथ में पकड़ा दिया।

"लल्लू! दौड़ कर जा और बाज़ार से दो-आने की कीलें लेकर आ! और सुन, सुब्बन से हथौड़ी माँग ला! मोदन! तू सीढ़ी पकड़ कर ला!" चाचा जी ने ऐसे हुक्म देना शुरू किया जैसे वे कोई बहुत बड़ी जंग लड़ने जा रहे हों।

थोड़ी देर में कीलें आ गईं, हथौड़ी आ गई और सीढ़ी भी लग गई। पूरा घर— चची, चारों बच्चे और नौकर— सब चाचा जी के इर्द-गिर्द हाथ बाँधे खड़े हो गए।

चाचा जी सीढ़ी पर चढ़े। उन्होंने तस्वीर उठाई, लेकिन दीवार तक पहुँचने से पहले ही तस्वीर उनके हाथ से फिसल गई और 'छन्न!' से ज़मीन पर गिर पड़ी। तस्वीर का शीशा चकनाचूर हो गया!

"अरे राम-राम!" चची चिल्लाईं। चाचा जी को अपनी गलती छुपानी थी, सो वे उलटा शीशे को पकड़ने लगे और इसी जल्दबाज़ी में उन्होंने अपनी 'उँगली काट ली'। खून बहने लगा।

"हाय अल्लाह! खून!" चाचा जी अपनी उँगली पकड़कर कमरे में गोल-गोल घूमने लगे। "अरे कोई मेरा रुमाल लाओ! खून निकल रहा है!"

रुमाल उनके उस 'कोट' की जेब में था जो उन्होंने उतार कर रखा था। लेकिन अब उन्हें याद ही नहीं था कि उन्होंने कोट कहाँ रखा है!

पूरा घर खून रोकने के लिए रुमाल और कोट ढूँढने में लग गया। आधा घंटा कोट ढूँढने में बर्बाद हो गया। अंत में पता चला कि चाचा जी खुद उसी कोट के ऊपर बैठे हुए थे!

उँगली पर पट्टी बँधने के बाद काम फिर से शुरू हुआ। एक नया शीशा मँगवाया गया। चाचा जी फिर सीढ़ी पर चढ़े।

"लल्लू! कील दे!" लल्लू ने कील दी। चाचा जी ने जैसे ही कील दीवार पर रखी, कील उनके हाथ से फिसल कर नीचे कालीन पर गिर गई।

"लो! अब कील गिर गई! तुम सब अंधे हो? जल्दी ढूँढो!" पूरा घर घुटनों के बल ज़मीन पर रेंगता हुआ उस एक छोटी सी कील को ढूँढने लगा। बहुत मुश्किल से कील मिली।

कील मिलते ही चाचा जी चिल्लाए, "अब हथौड़ी कहाँ गई? अभी तो मेरे हाथ में थी! अरे बेवकूफ़ो, तुम सात लोग कमरे में हो और तुम्हें यह नहीं पता कि मैंने हथौड़ी कहाँ रख दी?"

हथौड़ी भी मिल गई। अब चाचा जी ने दीवार पर कील लगाई और पूरी ताक़त से हथौड़ी का पहला वार किया।

'धड़ाम्!' हथौड़ी कील पर लगने के बजाय सीधे चाचा जी के अँगूठे पर जा लगी!

"उई माँ! मर गया!" चाचा जी दर्द से चीखते हुए सीढ़ी से नीचे आ गिरे। हथौड़ी उछलकर चची के पैर पर गिर गई। घर में चीख-पुकार मच गई।

चची ने अपना माथा पीट लिया और बोलीं, "हे भगवान! अगर मुझे पता होता कि आज घर में तस्वीर टँगने वाली है, तो मैं एक हफ्ते के लिए अपने मायके चली जाती!"

चाचा जी ने चची को घूरते हुए कहा, "तुम औरतों में यही तो खराबी है! ज़रा सी बात का बतंगड़ बना देती हो। यह तो मर्दों वाले काम हैं, थोड़ी-बहुत चोट तो लगती ही है।"

रात के बारह बज चुके थे। पूरे घर की हालत ऐसी थी जैसे वहाँ कोई भूकंप आया हो। हर तरफ धूल, दीवार पर कई सारे गलत छेद और थके-हारे लोग!

अंततः, बहुत ही टेढ़ी-मेढ़ी, खस्ता हालत में वह तस्वीर दीवार पर टाँग दी गई। तस्वीर इतनी टेढ़ी थी कि उसे देखने के लिए गर्दन भी टेढ़ी करनी पड़ती थी।

चाचा जी सीढ़ी से उतरे, पसीना पोंछा, और अपनी उस टेढ़ी-मेढ़ी 'कलाकृति' को बहुत ही गर्व से देखते हुए बोले:

"देखा! इसे कहते हैं काम! कुछ लोग तो ऐसे मामूली से काम के लिए भी 'मिस्त्री' को बुला लेते हैं। मेरे लिए तो यह बाएँ हाथ का खेल था!"

पूरा घर थक कर चूर हो चुका था, लेकिन चाचा जी के चेहरे पर ऐसा गर्व था जैसे उन्होंने कोई नया ताजमहल बना दिया हो!

🎉 कहानी समाप्त

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