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मुल्ला नसरुद्दीन और चोरों का डर

लोक परंपरा — मुल्ला नसरुद्दीन6 मिनट का पठन
मुल्ला नसरुद्दीन और चोरों का डर

मुल्ला नसरुद्दीन का घर गाँव के एक किनारे पर था। वे कोई बहुत अमीर आदमी नहीं थे। उनके घर में गिने-चुने टूटे-फूटे बर्तन, एक पुरानी चारपाई और कुछ पुराने कपड़ों के अलावा कोई कीमती सामान नहीं था। अगर कोई उनके घर से कुछ चुराना भी चाहता, तो उसे सिर्फ 'धूल' ही मिलती।

एक रात मुल्ला नसरुद्दीन और उनकी बेगम गहरी नींद में सो रहे थे। आधी रात का समय था।

अचानक घर के पिछले दरवाज़े से कुछ खटपट की आवाज़ आई। मुल्ला नसरुद्दीन की नींद खुल गई। मुल्ला ने ध्यान से सुना। कोई उनके घर का ताला तोड़ने की कोशिश कर रहा था।

मुल्ला समझ गए कि घर में 'चोर' घुस आए हैं।

उनकी बेगम भी जाग गई और घबराकर फुसफुसाते हुए बोली, "सुनिए जी! घर में चोर घुस आए हैं! जल्दी से उठिए और अपनी लाठी निकालिए। उन्हें पकड़िए!"

मुल्ला नसरुद्दीन ने अपनी बेगम को शांत रहने का इशारा किया और बहुत ही आराम से बोले: "अरी चुप रह! तू इतनी परेशान क्यों हो रही है? उन्हें अंदर आने दे और आराम से ढूँढने दे। अगर उन्हें अँधेरे में हमारे इस कबाड़ घर से कुछ भी 'कीमती' मिल गया, तो हम दोनों झट से उन पर कूद पड़ेंगे और वह कीमती चीज़ उनसे छीन लेंगे! हमारा ही फायदा है।"

बेगम ने अपना सिर पीट लिया। "आप भी कैसे पागल इंसान हैं! उठिए और कुछ कीजिए!"

मुल्ला अपनी चारपाई से उठे, लेकिन चोरों से लड़ने के लिए नहीं। वे चुपचाप दबे पाँव कमरे के कोने में रखी एक बहुत बड़ी और पुरानी 'लकड़ी की अलमारी' के पास गए। मुल्ला ने अलमारी का दरवाज़ा खोला, उसके अंदर घुस गए और दरवाज़ा अंदर से बंद करके छिप गए!

इतने में चोरों ने दरवाज़ा तोड़ लिया और वे कमरे के अंदर घुस आए। चोरों के हाथ में एक लालटेन थी।

चोरों ने पूरे घर का चप्पा-चप्पा छान मारा। उन्होंने रसोई देखी, वहाँ सिर्फ टूटे बर्तन थे। उन्होंने संदूक खोला, वहाँ सिर्फ फटे कपड़े थे। चोरों को बहुत गुस्सा आ रहा था।

"यह कैसा फकीर का घर है? यहाँ तो चुराने लायक एक सुई भी नहीं है!" चोरों के सरदार ने गुस्से में कहा।

तभी एक चोर की नज़र उस बड़ी सी 'लकड़ी की अलमारी' पर पड़ी। उसने सरदार से कहा, "सरदार! देखो, वह एक बहुत बड़ी अलमारी है। यह घर का मालिक बहुत चालाक लगता है। इसने अपना सारा सोना, चाँदी और कीमती खज़ाना ज़रूर इसी अलमारी के अंदर छिपा कर रखा होगा!"

चोरों की आँखों में लालच चमक उठा। वे धीरे-धीरे उस अलमारी के पास पहुँचे और एक ही झटके में अलमारी का दरवाज़ा खोल दिया।

लेकिन अलमारी के अंदर का नज़ारा देखकर चोरों के होश उड़ गए और उनकी चीख निकल गई!

अलमारी के अंदर कोई खज़ाना या सोना-चाँदी नहीं था। बल्कि अलमारी के बिल्कुल अंदर वाले कोने में, घुटनों के बल सिकुड़ कर 'मुल्ला नसरुद्दीन' खुद बैठे हुए थे और डर के मारे काँप रहे थे!

चोरों ने लालटेन की रोशनी मुल्ला के चेहरे पर डाली। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि घर का मालिक अपने ही घर की अलमारी में ऐसे क्यों छिपा हुआ है?

चोरों के सरदार ने अपनी तलवार निकाली और मुल्ला की तरफ इशारा करते हुए बहुत ही कड़क आवाज़ में पूछा: "ऐ आदमी! तू कौन है? और आधी रात को अपने ही घर की इस बंद अलमारी के अंदर छिप कर क्या कर रहा है?"

मुल्ला नसरुद्दीन को लगा कि अब उनकी जान नहीं बचेगी। लेकिन मुल्ला की हाज़िरजवाबी ऐसे ही मौकों पर सबसे तेज़ काम करती थी।

मुल्ला नसरुद्दीन ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। उन्होंने बहुत ही मासूमियत से और शर्मिंदगी भरी आवाज़ में उन चोरों की तरफ देखकर कहा:

"हुज़ूर! मैं ही इस घर का अभागा मालिक हूँ। आप लोग इतनी रात गए, इतनी मेहनत करके मेरे घर में चोरी करने आए हैं... लेकिन मेरे इस गरीब और कंगाल घर में आपके चुराने लायक एक भी चीज़ नहीं है! मुझे इस बात की इतनी ज़्यादा 'शर्म' आ रही थी कि मैं आप लोगों को अपना मुँह नहीं दिखा पा रहा था। इसलिए मैं शर्म के मारे इस अलमारी में आकर छिप गया! कृपा करके मेरी इस गरीबी के लिए मुझे माफ़ कर दीजिए!"

चोरों ने अपनी ज़िंदगी में ऐसे-ऐसे लोगों को लूटा था जो अपनी जान बचाने के लिए गिड़गिड़ाते थे, लेकिन ऐसा अजीबोगरीब इंसान उन्होंने पहली बार देखा था जो 'चोरी करने लायक सामान न होने पर' शर्म से अलमारी में छिपा था!

चोरों का सारा गुस्सा हवा हो गया। वे मुल्ला का यह करारा और हास्यपूर्ण व्यंग्य समझ गए। चोरों के सरदार ने हँसते हुए अपनी तलवार वापस रखी और बोले, "तुझसे तो खुदा ही बचाए मुल्ला!" और वे चोर खाली हाथ हँसते हुए मुल्ला के घर से बाहर चले गए!

🎉 कहानी समाप्त

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