हिन्दी कहानियाँ
😄 हास्य कहानियाँ

चोरी और प्रायश्चित

मुंशी प्रेमचंद7 मिनट का पठन
चोरी और प्रायश्चित

बाबू रामचरण एक बहुत ही सीधे-सादे, ईमानदार और आदर्शवादी क्लर्क थे। उन्होंने ज़िंदगी में कभी किसी का एक पैसा नहीं मारा था। वे हमेशा दुनिया को ईमानदारी का पाठ पढ़ाते रहते थे।

एक दिन रविवार की छुट्टी थी। बाबू रामचरण घर में अकेले थे। उनकी पत्नी 'सुमित्रा' पड़ोस में किसी काम से गई हुई थी।

रामचरण पानी पीने के लिए रसोई में गए। अचानक उनकी नज़र सुमित्रा के मसाले वाले डिब्बे के पास पड़ी। वहाँ एक बहुत ही नया, चमचमाता हुआ 'दस रुपये का कड़क नोट' रखा हुआ था।

रामचरण की आँखें उस नोट पर टिक गईं। बाहर गली में चाट वाला आवाज़ लगा रहा था— "गरमा-गरम आलू टिक्की और जलेबी!"

रामचरण का मन ललचा गया। उन्होंने सोचा, "मैं दिन-रात गधों की तरह दफ्तर में खटता हूँ। मेरी ही कमाई है। अगर मैं अपनी ही पत्नी के दस रुपये ले लूँ, तो यह 'चोरी' थोड़ी कहलाएगी! यह तो मेरा अपना पैसा है।"

मन के इस लालच ने रामचरण की ईमानदारी पर पर्दा डाल दिया। उन्होंने दबे पाँव जाकर वह दस का नोट उठाया, जेब में डाला और गली में जाकर मज़े से गरमा-गरम टिक्की और जलेबियाँ खा लीं।

जलेबियाँ खाते समय तो बहुत मज़ा आया, लेकिन जैसे ही रामचरण वापस घर में घुसे, उनके अंदर का 'ईमानदार इंसान' जाग उठा।

अपराधबोध (Guilt) ने उनके दिल पर कब्ज़ा कर लिया। "हाय राम! यह मैंने क्या कर दिया? मैंने अपनी ही पत्नी की चोरी कर ली! मैं तो चोर हो गया।"

थोड़ी देर में सुमित्रा घर वापस आई। उसने रसोई में जाकर डिब्बा खोला। रामचरण बाहर चारपाई पर बैठे अख़बार पढ़ने का 'नाटक' कर रहे थे, लेकिन उनका दिल किसी इंजन की तरह धड़क रहा था— धक्-धक्... धक्-धक्!

सुमित्रा ने बाहर आकर पूछा, "सुनिए जी! मैंने रसोई में दस रुपये का नोट रखा था। क्या आपने देखा है?"

रामचरण के पसीने छूट गए। उनके गले की आवाज़ काँपने लगी। उन्होंने नज़रें चुराते हुए हकलाकर कहा, "न... नहीं तो! म-मैंने कोई नोट नहीं देखा। म-मैं क्यों देखूँगा? मैं तो अख़बार पढ़ रहा हूँ!"

सुमित्रा ने सामान्य भाव से कहा, "पता नहीं कहाँ रख दिया मैंने, भूलने की आदत हो गई है।" और वह वापस काम में लग गई।

लेकिन रामचरण का दिमाग खराब हो चुका था। उन्हें लगने लगा कि सुमित्रा जान गई है कि उन्होंने चोरी की है और वह बस उनके कबूल करने का इंतज़ार कर रही है।

मनोविज्ञान का खेल शुरू हो गया।

शाम को घर की 'बिल्ली' रामचरण के पास आई और म्याऊँ-म्याऊँ करने लगी। रामचरण को लगा कि बिल्ली भी उन्हें चिढ़ाते हुए कह रही है— "चोर! चोर!" उन्होंने घबराकर बिल्ली को डंडे से भगा दिया।

रात को खाना खाते समय सुमित्रा ने रामचरण की तरफ बड़े प्यार से देखा। रामचरण को लगा कि वह उन्हें 'शक' की नज़रों से देख रही है। उनके गले से रोटी का निवाला नीचे नहीं उतर रहा था।

रात को रामचरण सो नहीं पाए। उन्हें भयानक सपने आने लगे। सपने में उन्होंने देखा कि पुलिस की जीप उनके दरवाज़े पर आकर रुकी है। इंस्पेक्टर ने उनके हाथों में हथकड़ियाँ पहना दी हैं और पूरा मोहल्ला उन पर थू-थू कर रहा है कि— "रामचरण बाबू ने अपनी पत्नी के दस रुपये चुरा लिए!"

रामचरण आधी रात को पसीने से भीगे हुए उठकर बैठ गए। अब उनसे यह मानसिक दबाव और 'प्रायश्चित' का बोझ और नहीं सहा जा रहा था।

उन्होंने तय किया कि वे यह पाप कबूल कर लेंगे, चाहे सुमित्रा उन्हें कितना ही क्यों न डांटे।

रामचरण रोते हुए सुमित्रा के बिस्तर के पास गए। उन्होंने सुमित्रा को जगाया और सीधे उसके पैरों में गिर पड़े!

"सुमित्रा! मुझे माफ़ कर दो! मैं एक बहुत बड़ा पापी हूँ! मैं चोर हूँ!" रामचरण दहाड़ें मार-मार कर रोने लगे।

सुमित्रा नींद से हड़बड़ा कर उठी। "अरे! क्या हो गया? आप मेरे पैरों में क्यों गिरे हैं? आपने क्या चोरी कर ली?"

रामचरण ने रोते-सुबकते हुए कहा, "वह रसोई में जो 'दस का नोट' रखा था... वह किसी बिल्ली ने नहीं, मैंने चुराया था! मैंने उसकी टिक्की और जलेबियाँ खा लीं। तुम पुलिस को मत बुलाना सुमित्रा! मैं कल ही तुम्हें अपनी तनख्वाह से दस रुपये लौटा दूँगा। मुझे जेल मत भेजना!"

रामचरण की यह बात सुनकर सुमित्रा का मुँह खुला का खुला रह गया। और फिर अगले ही पल, सुमित्रा अपना माथा पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से और ठहाके लगाकर हँसने लगी! वह इतना हँसी कि उसकी आँखों से पानी आ गया।

रामचरण हैरान होकर बोले, "मैं यहाँ अपने पाप का प्रायश्चित कर रहा हूँ और तुम हँस रही हो?"

सुमित्रा ने हँसते-हँसते अपने आँसू पोंछे और कहा: "अरे दुनिया के सबसे बड़े पागल इंसान! वह दस रुपये मैंने वहाँ भूल से नहीं छोड़े थे! मुझे पता था कि आज रविवार है और आपको टिक्की-जलेबी खाने का मन करता है, लेकिन आप अपनी कंजूसी के मारे पैसे नहीं माँगेंगे। इसलिए मैंने जानबूझकर वह दस का नोट वहाँ रखा था, ताकि आप उसे उठाकर बाज़ार चले जाएँ और कुछ खा आएँ!"

रामचरण का रोना एकदम से रुक गया। "क्या? तुमने जानबूझकर रखे थे?"

सुमित्रा ने हँसते हुए कहा, "हाँ! और आप पूरे दिन 'चोर-चोर' सोचकर अपने ही दिमाग की पुलिस से डरते रहे!"

रामचरण को अपनी बेवकूफी और उस फालतू के 'प्रायश्चित' पर इतनी ज़ोर की शर्मिंदगी महसूस हुई कि वे बिना कुछ बोले, अपना सिर खुजाते हुए वापस जाकर चुपचाप रज़ाई ओढ़कर सो गए। और सुमित्रा की हँसी अगले दिन सुबह तक नहीं रुकी!

🎉 कहानी समाप्त

😄 हास्य कहानियाँ की और कहानियाँ

😄 हास्य कहानियाँ10 मिनट

अंधेर नगरी चौपट राजा

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की अमर व्यंग्य कथा — जहाँ सब कुछ 'टके सेर' मिलता था। एक लालची चेला मिठाई के लालच में रुक गया और जब फाँसी की बारी आई, तो गुरु की चतुराई ने उसे बचाया और उस मूर्ख राजा को उसके अपने जाल में फँसा दिया।

पढ़ें →
😄 हास्य कहानियाँ7 मिनट

हर कण में भगवान

हाथी और महावत की मशहूर और गुदगुदाने वाली कथा — एक भोले शिष्य ने गुरु का ज्ञान इतना शाब्दिक रूप से लिया कि पागल हाथी के सामने से हटने से मना कर दिया। काँटों में फेंके जाने के बाद गुरु जी का जवाब सुनकर उसका मुँह खुला का खुला रह गया।

पढ़ें →
😄 हास्य कहानियाँ8 मिनट

भोलाराम का जीव

हरिशंकर परसाई जी का सरकारी दफ्तरों पर करारा व्यंग्य — भोलाराम मर गया पर उसका जीव स्वर्ग नहीं पहुँचा। नारद मुनि उसे ढूँढने पृथ्वी पर आए तो पता चला कि आत्मा पेंशन की धूल भरी सरकारी फाइलों में अटकी हुई है!

पढ़ें →
😄 हास्य कहानियाँ8 मिनट

इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर

हरिशंकर परसाई जी का पुलिस व्यवस्था पर अद्भुत व्यंग्य — भारत सरकार ने चाँद पर वैज्ञानिक नहीं, इंस्पेक्टर मातादीन को भेजा। मातादीन ने चाँद पर पृथ्वी की पुलिस व्यवस्था लागू की और चाँद वालों ने उन्हें वापस भेजने के लिए भारत से गुहार लगाई।

पढ़ें →
😄 हास्य कहानियाँ9 मिनट

बड़े भाई साहब

मुंशी प्रेमचंद की बचपन और पढ़ाई की मीठी नोकझोंक पर आधारित क्लासिक कथा — बड़े भाई साहब दिन-रात पढ़कर भी फेल होते थे और छोटा भाई खेलकर भी पास। फिर भी भाई साहब की डांट में जो प्यार और अनुभव की गहराई थी, वह किताबों में नहीं मिलती।

पढ़ें →
😄 हास्य कहानियाँ7 मिनट

निमंत्रण — पंडित मोटेराम शास्त्री का पेटूपन

मुंशी प्रेमचंद का दावत और ब्राह्मणों के पेटूपन पर ज़बरदस्त व्यंग्य — पंडित मोटेराम शास्त्री ने सेठ जी की दावत में इतने रसगुल्ले खा लिए कि झुककर दक्षिणा भी नहीं उठा सके। फिर पैरों के अँगूठों से सोने का सिक्का उठाने की जो तरकीब निकाली, वह देखने वाली थी।

पढ़ें →