दो नाक वाले लोग

हमारे समाज में 'नाक' का बहुत महत्त्व है। मुहावरों में भी नाक कटना (बेइज़्ज़ती होना) और नाक ऊँची होना (इज़्ज़त बढ़ना) जैसी बातें आम हैं। लेकिन क्या हो जब किसी इंसान के चेहरे पर 'दो नाकें' उग आएँ?
यह कहानी है शहर के एक बहुत ही साधारण से क्लर्क, 'नत्थूराम' की।
एक सुबह नत्थूराम सोकर उठा, तो उसे अपने चेहरे पर कुछ भारीपन महसूस हुआ। उसने आइने में देखा और उसकी चीख निकल गई। उसकी असली नाक के ठीक बगल में, एक फोड़ा निकल आया था, जिसका आकार और रूप बिल्कुल उसकी असली 'नाक' जैसा था!
आइने में देखने पर ऐसा लग रहा था जैसे नत्थूराम के चेहरे पर 'दो नाकें' लगी हुई हैं।
नत्थूराम शर्म के मारे पानी-पानी हो गया। उसने सोचा, "हाय राम! अब मैं दफ्तर कैसे जाऊँगा? लोग मुझे 'दो नाक वाला राक्षस' कहकर मेरा मज़ाक उड़ाएँगे। मेरी तो समाज में नाक कट जाएगी... मेरा मतलब है, दो-दो नाकें कट जाएँगी!"
नत्थूराम ने रुमाल से अपना मुँह बाँधा और चुपचाप एक डॉक्टर के पास जाने के लिए घर से निकला।
रास्ते में उसे शहर के एक बहुत ही चालाक और पहुँच वाले 'नेता जी' मिल गए। नेता जी की नज़र नत्थूराम के चेहरे पर पड़ी।
नेता जी ने पूछा, "अरे नत्थूराम! यह चेहरे पर क्या बाँध रखा है?" नत्थूराम ने रोते हुए रुमाल हटाया और अपनी 'दो नाकें' दिखाते हुए कहा, "देखिए नेता जी, मुझ पर कैसा प्रकोप हुआ है। मैं यह दूसरी नाक कटवाने डॉक्टर के पास जा रहा हूँ।"
नेता जी बहुत ही शातिर इंसान थे। उन्हें हर चीज़ में 'पॉलिटिक्स' और 'स्टेटस' नज़र आता था।
नेता जी ने नत्थूराम का हाथ पकड़ लिया और डांटते हुए कहा: "अरे बेवकूफ़! तू इसे बीमारी समझ रहा है? यह बीमारी नहीं, भगवान का आशीर्वाद है! तू दुनिया का इकलौता ऐसा इंसान है जिसके पास 'दो नाकें' हैं। आम और गरीब आदमियों के पास सिर्फ एक नाक (एक इज़्ज़त) होती है। तेरे पास दो नाकें हैं, इसका मतलब तेरी 'इज़्ज़त' आम लोगों से दोगुनी है! तू तो एक 'वीआईपी' (VIP) बन गया है। इसे छुपा मत, इसे शान से दिखा!"
नेता जी की बात सुनकर नत्थूराम का दिमाग घूम गया। उसे लगा कि बात तो बिल्कुल सही है।
नेता जी ने अगले ही दिन अखबारों में खबर छपवा दी— "शहर में एक महान 'दो नाक वाले' पुरुष का अवतार!"
अब तो नत्थूराम का रुतबा ही बदल गया। वह दफ्तर गया, तो सब लोग उसे सम्मान की नज़रों से देखने लगे। "अरे हटो! दो नाक वाले बाबू आ रहे हैं!" बड़े साहब ने नत्थूराम को अपनी कुर्सी पर बिठाया और चाय पिलाई। बाज़ार में वह जाता, तो दुकानदार उससे पैसे नहीं लेते थे। "आप तो दो नाक वाले वीआईपी हैं, आपसे पैसे कैसे ले सकते हैं!"
नत्थूराम सीना तानकर, अपनी दोनों नाकों को हवा में उठाकर चलने लगा।
अब समाज में एक नई बहस छिड़ गई। जो लोग 'एक नाक' वाले थे, वे खुद को हीन और गरीब महसूस करने लगे। शहर के अमीर सेठों और रईसों ने सोचा: "अरे! एक मामूली क्लर्क के पास दो नाकें हैं और हम करोड़ों के मालिक होकर भी 'एक नाक' वाले साधारण लोग बने हुए हैं? यह तो हमारे स्टेटस की तौहीन है!"
देखते ही देखते शहर में 'दूसरी नाक' लगवाने की होड़ मच गई।
प्लास्टिक सर्जन के पास अमीरों की लाइनें लग गईं। लोग लाखों रुपये देकर अपने चेहरे पर रबड़ या प्लास्टिक की 'दूसरी नाक' चिपकवाने लगे। जिसके पास दो नाकें होतीं, उसे वीआईपी और रईस माना जाता। और जो बेचारे गरीब 'एक नाक' वाले थे, उन्हें समाज में नीची नज़रों से देखा जाने लगा।
"छी! इसके पास तो सिर्फ एक ही नाक है, बिल्कुल पिछड़ा हुआ इंसान है!" लोग आम आदमियों को ताने मारने लगे।
पूरा शहर 'दो नाक वालों' की इस अजीबोगरीब 'भेड़चाल' में अंधा हो गया।
कुछ महीनों बाद, नत्थूराम के चेहरे का वह फोड़ा (दूसरी नाक) पक गया और अचानक एक दिन 'फूट गया'! फूटने के बाद नत्थूराम का चेहरा वापस बिल्कुल सामान्य हो गया और उसकी असली एक नाक ही बच गई।
जैसे ही नत्थूराम 'एक नाक' वाला हुआ, समाज में उसकी सारी इज़्ज़त और वीआईपी स्टेटस खत्म हो गया। लोग फिर से उसे एक मामूली क्लर्क मानने लगे।
नत्थूराम बहुत उदास हो गया। वह वापस उसी 'नेता जी' के पास गया और रोते हुए बोला: "नेता जी! मेरा वीआईपी स्टेटस छिन गया। मेरी दूसरी नाक फूट गई! अब मैं क्या करूँ?"
नेता जी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और अपनी 'दो प्लास्टिक की नाकों' (जो उन्होंने खुद लगवा ली थीं) को सहलाते हुए हिकारत से कहा: "जाओ यहाँ से! हम 'दो नाक वाले' वीआईपी लोग, तुम जैसे 'एक नाक' वाले साधारण और नीच लोगों से बात नहीं करते!"
और नत्थूराम अपना सा मुँह लेकर वापस लौट आया। यह परसाई जी का हमारे समाज के 'दिखावे' और अंधानुकरण पर एक ऐसा तमाचा है, जो हँसाता भी है और सोचने पर भी मजबूर करता है!
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