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🎭 तेनाली राम

दो महारानियाँ और एक सिंदूरपट्ट — घमंड का इलाज और पड़ोसी राजा का षड्यंत्र

लोक परंपरा — तेनालीराम5 मिनट का पठन
दो महारानियाँ और एक सिंदूरपट्ट — घमंड का इलाज और पड़ोसी राजा का षड्यंत्र

एक बार विजयनगर के राजदरबार में पड़ोसी राज्य से एक व्यापारी आया। उसने महाराजा कृष्णदेवराय को एक बेहद कीमती और अद्भुत आभूषण भेंट किया। यह एक 'सिंदूरपट्ट' था— सुहागिन स्त्रियों द्वारा सिर की मांग में पहना जाने वाला एक गहना, जिसमें बेशकीमती लाल माणिक्य और हीरे जड़े हुए थे। इसकी चमक से पूरा दरबार जगमगा उठा।

जब यह बात रनिवास (महल) में पहुँची, तो महाराज की दोनों रानियों— तिरुमलाम्बा और चिन्नाम्बा— ने उसे देखा। दोनों ही रानियाँ उस अद्वितीय आभूषण पर मोहित हो गईं।

अब एक बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो गया। सिंदूरपट्ट केवल एक था, और रानियाँ दो। बड़ी रानी अड़ गई कि यह आभूषण उसे चाहिए, और छोटी रानी ने ज़िद पकड़ ली कि यह उसे ही मिलेगा। रनिवास में भयंकर कलह शुरू हो गई। महाराज परेशान हो गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। उन्होंने तुरंत अपने संकटमोचक, तेनालीरामा को बुलाया।

तेनालीरामा की योजना: तेनालीरामा ने उस व्यापारी और सिंदूरपट्ट को ध्यान से देखा। उनकी पैनी नज़रें समझ गईं कि दाल में कुछ काला है।

तेनालीरामा ने महाराज से कहा: "महाराज, आप चिंता न करें। मुझे बस दो-तीन दिन का समय दीजिए। एक विशेष अनुष्ठान के बाद यह तय हो जाएगा कि यह सिंदूरपट्ट किस महारानी को मिलेगा।"

तेनालीरामा ने वह सिंदूरपट्ट अपने पास रख लिया। उन्होंने उसी रात विजयनगर के सबसे कुशल सुनारों को अपने घर बुलाया और उस सिंदूरपट्ट के हूबहू दिखने वाले दर्जनों 'नकली सिंदूरपट्ट' रातों-रात तैयार करवा लिए। ये नकली सिंदूरपट्ट पीतल और रंगीन कांच से बने थे, परंतु दूर से देखने पर बिल्कुल असली लगते थे।

तेनालीरामा ने शहर की नर्तकियों, राजमहल की दासियों और शहर की कुछ आम महिलाओं को वे नकली सिंदूरपट्ट बांट दिए और उन्हें एक विशेष निर्देश दिया।

राजदरबार का उत्सव और महारानियों का घमंड: दो दिन बाद राजमहल में एक भव्य उत्सव का आयोजन हुआ। दोनों महारानियाँ अपने पूरे शृंगार के साथ इस इंतज़ार में बैठी थीं कि आज महाराज वह कीमती सिंदूरपट्ट किसे पहनाएंगे।

उत्सव शुरू हुआ। सबसे पहले राजदरबार की 'मुख्य नर्तकी' नृत्य करने के लिए सभा में आई। जैसे ही रानियों की नज़र उस नर्तकी पर पड़ी, उनके होश उड़ गए! नर्तकी ने अपनी मांग में बिल्कुल वैसा ही 'सिंदूरपट्ट' पहना हुआ था!

रानियाँ अभी इस सदमे से उबरी भी नहीं थीं कि महाराज को पान और पानी परोसने वाली 'दासियाँ' अंदर आईं। अरे! उन सभी दासियों ने भी अपनी मांग में बिल्कुल वही सिंदूरपट्ट पहना हुआ था!

हद तो तब हो गई जब रानियों ने देखा कि उत्सव देखने आई शहर की कुछ साधारण महिलाओं ने भी सिर पर वैसा ही सिंदूरपट्ट सजा रखा है!

रानियों का सारा उत्साह और घमंड पल भर में चूर-चूर हो गया। शाही परिवारों का नियम होता है कि जो आभूषण दासियाँ या आम लोग पहन लें, उसे रानियाँ कभी नहीं पहनतीं, क्योंकि उसमें कोई 'विशिष्टता' नहीं रह जाती।

दोनों रानियों ने मुँह बनाते हुए महाराज से कहा: "महाराज! हमें यह सिंदूरपट्ट बिल्कुल नहीं चाहिए। जो गहना शहर की दासियाँ और नर्तकियाँ पहन कर घूम रही हैं, उसे पहनकर हम अपना अपमान नहीं कराएंगे!"

षड्यंत्र का पर्दाफाश: महाराज कृष्णदेवराय यह पूरा तमाशा देखकर हैरान थे। रानियों का झगड़ा तो खत्म हो गया था, परंतु यह सब क्या था? उन्होंने तेनालीरामा से पूछा: "तेनाली! यह क्या चमत्कार है? रातों-रात इतने सारे सिंदूरपट्ट कहाँ से आ गए?"

तेनालीरामा ने मुस्कुराते हुए उस व्यापारी को आगे खड़ा किया और महाराज से कहा: "महाराज! यह कोई व्यापारी नहीं, बल्कि हमारे पड़ोसी शत्रु राजा का भेजा हुआ एक गुप्तचर है! पड़ोसी राजा भली-भांति जानता है कि रनिवास का झगड़ा किसी भी राज्य की शांति भंग कर सकता है। उसने जानबूझकर केवल 'एक' बेशकीमती सिंदूरपट्ट भेजा था, ताकि हमारी दोनों रानियों में भयंकर कलह हो और आपका मानसिक संतुलन बिगड़ जाए!"

तेनालीरामा ने आगे बताया: "मैंने सुनारों से इसके जैसे नकली गहने बनवाकर दासियों को पहना दिए, ताकि रानियों को यह आभूषण 'आम' लगने लगे और उनका मोह भंग हो जाए।"

महाराज यह सुनकर दंग रह गए। उन्हें समझ आ गया कि तेनालीरामा ने न केवल रनिवास के उस बड़े झगड़े को अपनी 'मनोवैज्ञानिक चाल' से शांत कर दिया था, बल्कि एक बहुत बड़े राजनीतिक षड्यंत्र को भी नाकाम कर दिया था। उस गुप्तचर को तुरंत बंदी बना लिया गया और दोनों रानियों ने भी अपनी ज़िद के लिए महाराज से क्षमा मांगी।

🎉 कहानी समाप्त

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