सच्चा मित्र और छिपा हुआ खज़ाना — चापलूसों की पहचान

तेनालीरामा के पास धन, दौलत और शोहरत सब कुछ था। इस वजह से शहर के बहुत सारे अमीर लोग और दरबारी उनके 'दोस्त' बन गए थे। वे लोग हमेशा तेनालीरामा के आगे-पीछे घूमते और कहते, "तेनाली जी! हम आपके सच्चे मित्र हैं। आपके लिए तो हम अपनी जान भी दे सकते हैं।"
एक दिन महाराज ने तेनालीरामा से कहा: "तेनाली! तुम बहुत भाग्यशाली हो कि पूरे शहर में तुम्हारे इतने सारे 'सच्चे' दोस्त हैं।"
तेनालीरामा ने मुस्कुराते हुए कहा: "महाराज! अच्छे समय में तो सभी दोस्त होते हैं। परंतु मेरा मानना है कि मेरा केवल एक ही सच्चा दोस्त है, और वह है 'रामदास' (एक गरीब लेकिन ईमानदार व्यक्ति)। बाकी सब केवल मेरी हैसियत के दोस्त हैं।"
महाराज को यकीन नहीं हुआ। तेनालीरामा ने कहा कि वे इसे साबित कर सकते हैं।
आधी रात की परीक्षा: उस रात बहुत तेज़ बारिश हो रही थी और घुप अंधेरा था। तेनालीरामा ने अपने नौकरों से एक बड़ा सा भारी संदूक उठवाया और बारी-बारी से अपने उन सभी 'अमीर दोस्तों' के दरवाज़े पर गए, जो उनके लिए जान देने की कसमें खाते थे।
तेनालीरामा ने पहले दोस्त का दरवाज़ा खटखटाया और घबराई हुई आवाज़ में कहा: "दोस्त! मैं बहुत बड़ी मुसीबत में हूँ। मैंने गलती से किसी का खून कर दिया है और उसकी लाश इस संदूक में है। मुझे इसे रात के अंधेरे में जंगल में दफनाने के लिए तुम्हारी मदद चाहिए!"
यह सुनते ही उस 'सच्चे दोस्त' के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने तुरंत दरवाज़ा बंद करते हुए कहा: "अरे बाप रे! मैं किसी हत्या के मामले में नहीं पड़ना चाहता। तुम यहाँ से चले जाओ, मैं तुम्हें नहीं जानता।"
तेनालीरामा ऐसे ही अपने पांच-छह सबसे करीबी और अमीर दोस्तों के पास गए। किसी ने बीमारी का बहाना बनाया, तो किसी ने अपनी पत्नी का डर दिखाकर उन्हें अपने घर से भगा दिया। कोई भी उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया।
गरीब रामदास की सच्ची दोस्ती: अंत में, तेनालीरामा उसी भारी संदूक को लेकर अपने उस गरीब दोस्त 'रामदास' की झोपड़ी पर पहुँचे।
तेनालीरामा ने उसे भी वही कहानी सुनाई कि संदूक में लाश है और उन्हें मदद चाहिए।
रामदास ने एक पल भी नहीं सोचा। उसने तुरंत अपनी कुदाल उठाई, एक बरसाती ओढ़ी और बोला: "तुम मेरे सच्चे मित्र हो तेनाली। तुमने मेरे बुरे वक्त में मेरी मदद की थी। आज चाहे मुझे फांसी ही क्यों न हो जाए, मैं तुम्हारा साथ नहीं छोडूँगा। चलो, इस संदूक को जंगल में गाड़ कर आते हैं।"
संदूक का रहस्य: अगले दिन सुबह, तेनालीरामा रामदास को लेकर सीधे महाराज कृष्णदेवराय के दरबार में पहुँचे। दरबार में वे सभी अमीर दोस्त भी मौजूद थे, जिन्होंने रात को तेनाली को भगा दिया था। वे सब डरे हुए थे कि कहीं तेनालीरामा हत्या के जुर्म में पकड़े न जाएं।
तेनालीरामा ने दरबार के बीचों-बीच वह बड़ा संदूक रखवाया और महाराज से कहा: "महाराज! आप स्वयं इस संदूक को खोलकर देखिए कि इसमें क्या है।"
जैसे ही महाराज ने संदूक खोला, पूरा दरबार चौंक गया!
उस संदूक में कोई लाश नहीं थी, बल्कि उसमें ताज़े और मीठे 'खरबूजे और तरबूज' भरे हुए थे, जो भारी लग रहे थे!
तेनालीरामा ने उन अमीर दोस्तों की ओर देखते हुए कहा: "महाराज! जो लोग दावत और जश्न के समय मेरे साथ बैठकर खरबूजे खाते हैं, कल रात 'मुसीबत' का नाम सुनते ही उन्होंने मेरे लिए अपने दरवाज़े बंद कर लिए। परंतु यह गरीब रामदास, मेरे लिए मौत के फंदे तक जाने को तैयार हो गया। सच्चा मित्र वह नहीं जो धन देखकर पास आए, बल्कि वह है जो संकट देखकर भी साथ न छोड़े!"
वे सभी अमीर दरबारी शर्म के मारे ज़मीन में गड़ गए। महाराज कृष्णदेवराय ने खड़े होकर तालियां बजाईं। उन्होंने रामदास की सच्ची दोस्ती को सलाम किया और उसे राज्य की ओर से ढेरों इनाम दिए।
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