एक मुट्ठी राई का पहाड़ — छोटी बात का बतंगड़ और तेनाली का व्यंग्य

विजयनगर के राजदरबार में दो मंत्री, रामनाथ और सोमनाथ, हमेशा एक-दूसरे से लड़ते रहते थे। उनके घर भी आस-पास ही थे। एक दिन दोनों के बीच एक बहुत ही छोटी सी बात पर झगड़ा हो गया। रामनाथ के घर के आंगन में लगे एक पेड़ का एक सूखा पत्ता उड़कर सोमनाथ के आंगन में गिर गया था।
बस इसी बात पर दोनों में बहस शुरू हो गई। बात इतनी बढ़ गई कि दोनों गालियां देने लगे, फिर हाथापाई पर उतर आए, और अंततः दोनों तलवारें निकालकर एक-दूसरे को मारने के लिए तैयार हो गए।
मामला महाराज कृष्णदेवराय के दरबार में पहुँचा। दोनों मंत्री गुस्से में लाल थे और एक-दूसरे पर बड़े-बड़े इल्ज़ाम लगा रहे थे। महाराज इस छोटी सी बात पर इतना बड़ा हंगामा देखकर बहुत परेशान और झुंझलाए हुए थे। उन्होंने दोनों को शांत करने की कोशिश की, परंतु वे दोनों सुनने को तैयार ही नहीं थे।
तेनालीरामा का अजीब व्यवहार: तभी तेनालीरामा दरबार में पहुँचे। उनके हाथ में एक छोटी सी कटोरी थी, जिसमें 'राई' भरी हुई थी।
तेनालीरामा ने महाराज को प्रणाम किया और फिर बिना कुछ कहे दरबार के ठीक बीचों-बीच फर्श पर बैठ गए। उन्होंने कटोरी में से एक मुट्ठी राई निकाली और उसे ज़मीन पर रखकर उसे हाथों से ऐसे थपथपाने लगे, जैसे बच्चे मिट्टी का घर बनाते हैं।
रामनाथ और सोमनाथ ने अपनी बहस रोक दी और हैरानी से तेनालीरामा को देखने लगे।
महाराज ने पूछा: "तेनालीरामा! तुम ये बीच दरबार में ज़मीन पर बैठकर क्या कर रहे हो? यह क्या बचपना है?"
राई का पहाड़: तेनालीरामा ने बहुत ही गंभीरता से अपना पसीना पोंछते हुए कहा: "महाराज! मैं एक बहुत ही मुश्किल और ऐतिहासिक काम कर रहा हूँ। मैं इन 'राई के दानों' को जोड़-जोड़ कर एक 'विशाल पहाड़' बनाने की कोशिश कर रहा हूँ!"
यह सुनकर पूरे दरबार में हंसी की लहर दौड़ गई। रामनाथ ने व्यंग्य कसते हुए कहा: "तेनालीरामा, तुम्हारी अक्ल तो सचमुच घास चरने गई है! कहीं राई के छोटे-छोटे दानों से भी पहाड़ बन सकता है? यह तो असंभव है!"
तेनालीरामा ने तुरंत खड़े होकर रामनाथ और सोमनाथ की आँखों में आँखें डालीं और करारी आवाज़ में कहा: "बिल्कुल सही कहा मंत्री जी! राई के दानों से पहाड़ बनाना असंभव है और बेवकूफी भी। परंतु... एक सूखे पत्ते के गिरने जैसी 'राई भर की छोटी सी बात' पर तलवारें निकालकर 'झगड़े का पहाड़' बना देना कौन सी समझदारी है?"
तेनालीरामा ने महाराज की ओर मुड़कर कहा: "महाराज! ये दोनों समझदार मंत्री वही कर रहे हैं जो मैं कर रहा था। ये बिना बात के 'राई का पहाड़' बना रहे हैं। जब ये अपनी छोटी सी बात का बतंगड़ बनाकर दरबार का समय बर्बाद कर सकते हैं, तो मैं राई का पहाड़ क्यों नहीं बना सकता?"
यह तीखा और सटीक व्यंग्य सुनकर रामनाथ और सोमनाथ शर्म से पानी-पानी हो गए। उन्हें अपनी मूर्खता का एहसास हो गया कि वे कितनी छोटी सी बात पर एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू थे। महाराज कृष्णदेवराय तेनालीरामा की इस अद्भुत व्यावहारिक सीख पर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने दोनों मंत्रियों को एक-दूसरे से गले मिलकर माफ़ी मांगने का आदेश दिया।
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