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🎭 तेनाली राम

असली और नकली फूलों की पहचान — बिना छुए परख और प्रकृति का न्याय

लोक परंपरा — तेनालीराम5 मिनट का पठन
असली और नकली फूलों की पहचान — बिना छुए परख और प्रकृति का न्याय

विजयनगर साम्राज्य की प्रसिद्धि सुनकर एक दिन कलिंग राज्य से एक बहुत ही कुशल और चतुर शिल्पकार दरबार में आया। वह अपने साथ एक सुंदर संदूक लेकर आया था।

उसने महाराज कृष्णदेवराय को प्रणाम किया और संदूक में से दो बेहद खूबसूरत 'फूलों की मालाएं' निकालीं।

शिल्पकार ने कहा: "महाराज! इन दो मालाओं में से एक माला मेरे राज्य के बगीचे के 'असली फूलों' से बनी है। परंतु दूसरी माला मैंने अपने हाथों से रेशम, मोम और कागज़ का उपयोग करके बनाई है। मेरी बनाई हुई नकली माला असली फूलों से इतनी मेल खाती है कि कोई भी इंसान आँखों से देखकर इनमें फर्क नहीं बता सकता!"

शिल्पकार ने विजयनगर के दरबार को चुनौती देते हुए कहा: "मेरी शर्त यह है कि आपके विद्वानों को बिना इन मालाओं को छुए और बिना इन्हें सूंघे, दूर से ही यह बताना होगा कि असली माला कौन सी है और नकली कौन सी?"

विद्वानों की उलझन: दोनों मालाएं महाराज के सामने एक मेज़ पर रख दी गईं। दरबार के सभी विद्वान आगे आए। वे दूर से खड़े होकर मालाओं को घूरने लगे।

शिल्पकार की कला सचमुच अद्भुत थी। दोनों मालाओं के रंग, पंखुड़ियों की बनावट और ताज़गी बिल्कुल एक जैसी लग रही थी। कोई भी सिर्फ देखकर यह नहीं बता पा रहा था कि असली फूल कौन से हैं। अगर कोई गलत जवाब देता, तो विजयनगर की हार होती।

राजगुरु और सेनापति ने हार मान ली। महाराज ने निराश होकर तेनालीरामा की ओर देखा।

तेनालीरामा का प्राकृतिक तरीका: तेनालीरामा अपनी जगह से उठे और मेज़ के पास गए। उन्होंने मालाओं को ध्यान से देखा। सचमुच, आँखों से फर्क करना असंभव था।

तेनालीरामा ने कोई जवाब देने के बजाय दरबार के पहरेदारों को एक अजीब आदेश दिया: "पहरेदारो! राजदरबार की वे सभी बड़ी खिड़कियां खोल दो, जो राजमहल के बगीचे की तरफ खुलती हैं!"

पहरेदार हैरान हुए, परंतु उन्होंने खिड़कियां पूरी तरह खोल दीं। बाहर बगीचे से ताज़ी हवा अंदर आने लगी।

पूरा दरबार शांति से खड़ा देख रहा था कि तेनालीरामा क्या करने वाले हैं। तेनालीरामा चुपचाप अपनी जगह पर खड़े रहे और कुछ मिनटों तक इंतज़ार करने लगे।

अचानक, खिड़की से भिनभिनाने की आवाज़ आने लगी। बगीचे से कुछ मधुमक्खियां और तितलियां उड़ती हुई दरबार के अंदर आ गईं। वे सीधे उस मेज़ की ओर उड़ीं और बिना किसी झिझक के 'दाहिनी तरफ' रखी माला के फूलों पर जाकर बैठ गईं। बाईं तरफ रखी माला के पास एक भी मधुमक्खी नहीं गई।

तेनालीरामा ने मुस्कुराते हुए शिल्पकार की ओर देखा और दाहिनी माला की ओर इशारा करते हुए कहा: "शिल्पकार महोदय! जो माला दाहिनी तरफ रखी है, वही 'असली फूलों' की माला है!"

शिल्पकार हक्का-बक्का रह गया। उसका घमंड टूट चुका था। उसने झुककर कहा: "आप बिल्कुल सही हैं तेनालीरामा जी! परंतु आपने यह कैसे पहचाना?"

तेनालीरामा ने सहजता से समझाया: "इंसान की आँखें धोखा खा सकती हैं, परंतु 'प्रकृति' कभी धोखा नहीं खाती। रेशम और मोम से चाहे कितने भी सुंदर फूल बना लो, उनमें असली फूलों का 'मकरंद' नहीं होता। मधुमक्खियां केवल उसी फूल पर बैठती हैं जिसमें जीवन और रस होता है। मैंने बस प्रकृति को अपना काम करने दिया!"

महाराज कृष्णदेवराय इस सरल लेकिन अत्यंत वैज्ञानिक और प्राकृतिक सूझबूझ पर खुशी से झूम उठे। उन्होंने शिल्पकार को उसकी कला के लिए ईनाम दिया और तेनालीरामा की बुद्धिमत्ता की दिल खोलकर तारीफ की।

🎉 कहानी समाप्त

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