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गधे का भूत — अंधविश्वास और भेड़चाल पर व्यंग्य

लोक परंपरा — भारतीय लोककथा7 मिनट का पठन
गधे का भूत — अंधविश्वास और भेड़चाल पर व्यंग्य

एक गाँव में एक धोबी रहता था। उसके पास एक बहुत ही प्यारा और वफादार गधा था। धोबी ने उस गधे का नाम बहुत ही प्यार से 'गधैया' रखा था। वह गधा धोबी के लिए उसके परिवार के सदस्य जैसा था।

एक दिन अचानक बीमारी की वजह से उस 'गधैया' (गधे) की मौत हो गई। धोबी को इतना गहरा सदमा लगा कि वह फूट-फूट कर रोने लगा। गधे के दुख में धोबी ने अपना मुंडन करवा लिया (सिर के सारे बाल मुंडवा लिए) और नदी के किनारे उदास होकर बैठ गया।

तभी गाँव का एक बनिया (व्यापारी) वहाँ से गुज़रा। उसने देखा कि धोबी ने मुंडन करवाया है और फूट-फूट कर रो रहा है। बनिए ने पास जाकर पूछा, "क्या हुआ भाई धोबी? तू इतना दुखी क्यों है और यह मुंडन क्यों करवाया है? क्या घर में कोई अनहोनी हो गई?"

धोबी ने रोते हुए और अपने आँसू पोंछते हुए कहा: "सेठ जी! क्या बताऊँ, मुझ पर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। 'गधैया महाराज' गुज़र गए हैं! उन्हीं के शोक में मैंने यह मुंडन करवाया है।"

बनिए ने 'गधैया महाराज' नाम पहली बार सुना था। लेकिन उसने सोचा: "धोबी इतना रो रहा है, मुंडन करवा लिया है, तो ज़रूर ये 'गधैया महाराज' कोई बहुत बड़े पहुँचे हुए संत या सिद्ध महात्मा होंगे!" बनिए ने धोबी से ज़्यादा पूछताछ करना अपनी तौहीन समझा और चुपचाप वहाँ से चला गया।

बनिए ने सोचा कि अगर इतने बड़े महात्मा गुज़र गए हैं, तो मुझे भी शोक मनाना चाहिए। उसने तुरंत नाई को बुलाया और अपना भी 'मुंडन' करवा लिया।

बाज़ार में जब गाँव के सरपंच ने बनिए को गंजा देखा, तो पूछा, "सेठ जी! यह मुंडन कैसा?" बनिए ने बहुत ही दुखी मन से कहा, "अरे सरपंच जी! आपको खबर नहीं? 'गधैया महाराज' का स्वर्गवास हो गया है! बहुत बड़े संत थे, उन्हीं के दुख में मैंने बाल मुंडवाए हैं।"

सरपंच ने सोचा: "अगर शहर का सबसे बड़ा बनिया मुंडन करवा सकता है, तो मुझे भी करवाना चाहिए, वरना गाँव वाले सोचेंगे कि सरपंच को धर्म-कर्म की कोई परवाह नहीं है।" सरपंच ने भी तुरंत अपना मुंडन करवा लिया!

बस फिर क्या था! 'गधैया महाराज' के गुज़रने की खबर पूरे राज्य में जंगल की आग की तरह फैल गई। सरपंच को गंजा देखकर गाँव वालों ने मुंडन करवा लिया। गाँव वालों को देखकर पुलिस के 'कोतवाल' ने मुंडन करवा लिया। कोतवाल को देखकर 'सेनापति' ने मुंडन करवा लिया और सेनापति को देखकर राज्य के 'मंत्री' ने भी अपना सिर मुंडवा लिया!

किसी ने यह पूछने की ज़हमत नहीं उठाई कि ये 'गधैया महाराज' आखिर थे कौन?

अगले दिन जब राज्य का मंत्री बिल्कुल 'गंजा' होकर राजा के दरबार में पहुँचा, तो राजा हैरान रह गया। राजा ने पूछा, "मंत्री जी! यह आपके सिर पर क्या चमक रहा है? राज्य में ऐसा क्या हो गया कि आपने मुंडन करवा लिया?"

मंत्री ने रुआँसी आवाज़ में कहा: "महाराज! बहुत ही दुखद समाचार है। हमारे राज्य के सबसे महान और सिद्ध संत 'श्री श्री गधैया महाराज' ब्रह्मलीन हो गए हैं (गुज़र गए हैं)। उन्हीं के शोक में पूरे राज्य ने मुंडन करवाया है। महाराज, आपको भी राजधर्म निभाते हुए अपना मुंडन करवा लेना चाहिए!"

राजा बहुत धार्मिक था। उसने तुरंत नाई को दरबार में बुलवा लिया ताकि वह भी राजा का मुंडन कर सके।

लेकिन राजा का एक बहुत ही चतुर और समझदार सलाहकार भी वहाँ मौजूद था। उसने राजा को रोका। "महाराज! रुकिए। मुंडन तो बाद में भी हो जाएगा। लेकिन पहले यह तो पता लगाइए कि ये 'गधैया महाराज' थे कौन? मैंने तो अपने पूरे जीवन में इस नाम के किसी महात्मा का नाम नहीं सुना।"

राजा को बात सही लगी। उसने मंत्री से पूछा, "मंत्री जी! ज़रा बताइए, ये गधैया महाराज कहाँ रहते थे?" मंत्री घबरा गया। "महाराज, मुझे तो सेनापति ने बताया था।"

सेनापति को बुलाया गया। "मुझे तो कोतवाल ने बताया था।" कोतवाल ने कहा, "मुझे सरपंच ने बताया था।" सरपंच ने कहा, "महाराज, मुझे तो बनिए ने बताया था!"

अंत में उस बनिए को दरबार में पेश किया गया। राजा ने कड़क आवाज़ में पूछा, "सेठ! सच-सच बता, ये गधैया महाराज कौन थे, जिनकी वजह से आज मेरा पूरा राज्य गंजा हो गया है?"

बनिए ने हाथ जोड़कर काँपते हुए कहा: "महाराज! मुझे कुछ नहीं पता। मुझे तो नदी किनारे उस 'धोबी' ने बताया था कि गधैया महाराज गुज़र गए हैं और वह रो रहा था।"

राजा के आदेश पर तुरंत उस धोबी को पकड़ कर लाया गया। धोबी बेचारा डरा-सहमा दरबार में खड़ा था। पूरा दरबार— मंत्री, सेनापति, कोतवाल, बनिया और सरपंच— सब बिल्कुल गंजे होकर उसे घूर रहे थे।

राजा ने धोबी से पूछा: "धोबी! बिना डरे सच-सच बता। ये 'गधैया महाराज' कौन थे जो स्वर्ग सिधार गए?"

धोबी ने मासूमियत से हाथ जोड़कर कहा: "महाराज! वह कोई महात्मा या संत नहीं थे। 'गधैया' तो मेरे उस पालतू 'गधे' का नाम था, जो कपड़े ढोता था! कल उसकी बीमारी से मौत हो गई थी, इसलिए मैंने दुख में अपने बाल मुंडवा लिए थे। लेकिन मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि मेरे गधे के मरने के दुख में, इन मंत्री जी, सेनापति और पूरे राज्य ने अपना सिर क्यों मुंडवा लिया?"

यह सुनते ही पूरे दरबार में एक भयंकर सन्नाटा छा गया!

मंत्री, सेनापति और बनिया मारे शर्म के अपना गंजा सिर छिपाने लगे। राजा ने अपना माथा पकड़ लिया और फिर वह ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाकर हँसने लगा!

राजा ने अपने दरबारियों से कहा: "धिक्कार है तुम सबकी बुद्धि पर! बिना सोचे-समझे, बिना सच जाने 'भेड़चाल' में चलकर तुम सबने एक 'गधे' के शोक में अपना मुंडन करवा लिया!"

उस दिन के बाद से पूरे राज्य में किसी ने कभी बिना सच जाने किसी अफ़वाह पर विश्वास नहीं किया, और यह 'गधैया महाराज' का किस्सा अंधविश्वास और भेड़चाल पर दुनिया का सबसे मज़ेदार व्यंग्य बन गया!

🎉 कहानी समाप्त

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