जादुई चक्की

बहुत पुरानी बात है। एक गाँव में दो भाई रहते थे। बड़ा भाई बहुत ही अमीर, लेकिन एक नंबर का लालची और क्रूर इंसान था। छोटा भाई बहुत ही गरीब, लेकिन नेक और सीधा-सादा था।
एक बार दीवाली का त्योहार आया। छोटे भाई के घर में खाने को एक दाना भी नहीं था। वह अपने अमीर बड़े भाई के पास गया और गिड़गिड़ाकर बोला, "भैया! आज दीवाली है। मेरे बच्चे भूखे हैं। मुझे थोड़ा सा अनाज उधार दे दो।"
बड़े भाई ने उसे धक्के मारकर घर से निकाल दिया और कहा, "मेरे पास कोई अनाज नहीं है! जा यहाँ से!"
छोटा भाई रोता हुआ जंगल की तरफ चला गया। जंगल में उसकी मुलाकात एक बहुत ही रहस्यमयी 'बौने बाबा' से हुई। छोटे भाई ने अपना सारा खाना (जो उसे कहीं से भिक्षा में मिला था) उस भूखे बौने बाबा को खिला दिया।
बौना बाबा उसकी नेकी से बहुत खुश हुआ। उसने छोटे भाई को पत्थर की एक पुरानी 'चक्की' दी और कहा: "बेटा! यह कोई मामूली चक्की नहीं है, यह एक 'जादुई चक्की' है। तू इससे जो भी माँगेगा, यह पीस-पीस कर बाहर निकाल देगी। बस तुझे इससे कहना होगा— 'चक्की चल जा, फलां चीज़ निकाल!' और जब तुझे चीज़ मिल जाए, तो इस पर यह लाल कपड़ा ढक कर कहना— 'चक्की रुक जा, बहुत हो गया!' तो यह चक्की रुक जाएगी।"
छोटा भाई खुशी-खुशी चक्की लेकर घर आया। उसने चक्की को ज़मीन पर रखा और बोला: "चक्की चल जा, बढ़िया सा खाना निकाल!"
देखते ही देखते चक्की अपने आप घूमने लगी! 'घर्र... घर्र... घर्र...' और चक्की के पाटों के बीच से गरमा-गरम पूड़ियाँ, खीर, हलवा और तरह-तरह के पकवान बाहर निकलने लगे! छोटा भाई और उसका परिवार खुशी से नाच उठे। पेट भरने के बाद उसने लाल कपड़ा ढका और बोला, "चक्की रुक जा, बहुत हो गया!" चक्की तुरंत रुक गई।
अब तो छोटे भाई के दिन फिर गए। वह चक्की से कभी सोने के सिक्के निकालता, कभी रेशमी कपड़े और कभी अनाज। कुछ ही दिनों में वह गाँव का सबसे अमीर आदमी बन गया।
बड़े लालची भाई को यह देखकर बहुत जलन हुई। उसने छुपकर पता लगा लिया कि छोटे भाई की अमीरी का राज़ वह 'पत्थर की चक्की' है।
एक रात, जब छोटा भाई सो रहा था, बड़ा भाई चुपके से उसके घर में घुसा और उस 'जादुई चक्की' को चुरा लिया!
बड़े भाई ने सोचा: "अगर मैं इस चक्की को यहीं रखकर चलाऊँगा, तो मेरा भाई पुलिस बुला लेगा। मैं इस चक्की को लेकर किसी दूसरे देश भाग जाता हूँ।"
बड़ा भाई चक्की को अपने कंधों पर उठाकर भागा और समुद्र के किनारे पहुँचकर एक 'नाव' (Boat) में बैठ गया। नाव समुद्र के बिल्कुल बीचों-बीच पहुँच गई।
बड़े भाई ने सोचा कि दूसरे देश पहुँचने से पहले क्यों न इस चक्की का 'टेस्ट' कर लिया जाए।
उन दिनों बाज़ार में 'नमक' बहुत महँगा बिकता था। लालची भाई ने सोचा कि मैं इससे नमक निकलवाता हूँ और उसे बेचकर करोड़पति बन जाऊँगा।
बड़े भाई ने चक्की को नाव में रखा और बोला: "चक्की चल जा, बहुत सारा नमक निकाल!"
चक्की ने घूमना शुरू किया। 'घर्र... घर्र... घर्र...' चक्की के अंदर से एकदम बढ़िया, सफ़ेद और शुद्ध नमक की धार बहने लगी। बड़ा भाई खुशी से पागल हो गया।
कुछ ही देर में नाव में नमक का एक बड़ा सा ढेर लग गया। बड़े भाई ने सोचा कि अब इतना नमक काफी है। उसने चक्की से कहा, "बस चक्की! अब रुक जा!"
लेकिन चक्की नहीं रुकी! वह घूमती रही— 'घर्र... घर्र... घर्र...' और नमक निकलता रहा। दरअसल, लालची बड़े भाई ने चोरी करते समय चक्की को 'चलाने का मंतर' तो सुन लिया था, लेकिन चक्की को 'रोकने का मंतर' (लाल कपड़ा ढकना और सही शब्द कहना) उसने नहीं सुना था!
नमक का ढेर नाव में बढ़ता जा रहा था। नाव नमक के वज़न से पानी में नीचे धँसने लगी।
बड़ा भाई घबरा गया। वह चक्की के सामने हाथ जोड़ने लगा, "रुक जा मेरी माँ! बस कर! नाव डूब जाएगी!" लेकिन चक्की नमक उगलती रही।
गुस्से में बड़े भाई ने चक्की पर लात मारी, अपने जूते निकालकर चक्की को पीटा, लेकिन जादू तो जादू था। बिना सही मंतर के वह रुकने वाली नहीं थी।
देखते ही देखते पूरी नाव नमक से भर गई। नाव का संतुलन बिगड़ा और वह भारी होकर समुद्र के गहरे पानी में 'छपाक्' से डूब गई!
बड़ा लालची भाई तो किसी तरह अपनी जान बचाकर तैरता हुआ किनारे आ गया, लेकिन उसके हाथ से वह अमूल्य चक्की हमेशा के लिए चली गई।
वह 'जादुई चक्की' समुद्र के बिल्कुल तल में जाकर बैठ गई।
और मज़ेदार बात यह है कि चक्की को 'रोकने का मंतर' कोई नहीं बोल पाया, इसलिए वह चक्की आज भी समुद्र के नीचे चल रही है— 'घर्र... घर्र... घर्र...' और लगातार नमक पीस रही है!
लोककथाओं के अनुसार, यही कारण है कि समुद्र का पानी पहले मीठा हुआ करता था, लेकिन इस 'लालची भाई की चक्की' के नमक उगलने की वजह से ही आज पूरे 'समुद्र का पानी खारा' हो गया है!
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