गोनू झा और घमंडी पहलवान

एक बार मिथिला राज्य में एक बहुत ही विशालकाय, हट्टा-कट्टा और नामी पहलवान आया। उसका शरीर किसी लोहे की चट्टान जैसा था। उसकी गर्दन साँड जैसी मोटी थी और डोलों में इतनी ताक़त थी कि वह भारी से भारी पत्थर को भी एक हाथ से उठा लेता था।
उस पहलवान को अपनी ताक़त पर बहुत ज़्यादा 'घमंड' था। उसने मिथिला के राजा के दरबार में आकर चुनौती दे दी: "महाराज! मैंने सुना है कि आपके राज्य में बहुत वीर और चतुर लोग रहते हैं। मैं आपके राज्य के सभी पहलवानों को कुश्ती की चुनौती देता हूँ। अगर कोई मुझे हरा दे, तो मैं ज़िंदगी भर के लिए कुश्ती छोड़ दूँगा, और अगर कोई मुझे न हरा पाया, तो मिथिला राज्य को मेरी गुलामी स्वीकार करनी पड़ेगी!"
राजा ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली। अगले दिन राजमहल के मैदान में एक बहुत बड़ा दंगल (कुश्ती का अखाड़ा) आयोजित किया गया।
मिथिला के एक-से-एक धुरंधर और ताक़तवर पहलवान अखाड़े में उतरे। लेकिन वह घमंडी पहलवान इतना फुर्तीला और ताक़तवर था कि उसने राज्य के सभी बड़े पहलवानों को कुछ ही मिनटों में ज़मीन पर चटा दिया। कोई भी उसके सामने दो मिनट से ज़्यादा नहीं टिक पाया।
राजा बहुत निराश और दुखी हुए। उनके राज्य की इज़्ज़त दाँव पर लग गई थी। घमंडी पहलवान अखाड़े के बीचों-बीच खड़े होकर अपनी मूँछों पर ताव देते हुए ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा: "हा-हा-हा! क्या मिथिला में कोई 'मर्द' नहीं बचा? क्या अब मुझे इस राज्य का राजा मान लिया जाए?"
तभी दरबार की भीड़ में से एक बहुत ही दुबला-पतला, कमज़ोर सा आदमी अपनी धोती सँभालता हुआ आगे आया। यह कोई और नहीं, बल्कि मिथिला के सबसे चतुर इंसान 'गोनू झा' थे।
गोनू झा ने खाँसते हुए कहा, "अरे ओ पहलवान भाई! ज़रा शांत हो जाओ। अभी मिथिला का सबसे बड़ा शूरवीर यानी कि 'मैं' ज़िंदा हूँ। मैं तुमसे मुकाबला करूँगा!"
गोनू झा के दुबले-पतले शरीर को देखकर वह भारी-भरकम पहलवान पेट पकड़कर हँसने लगा। "अरे ओ सींक-सलाई! मेरी एक फूँक से तू उड़ जाएगा। तू मुझसे कुश्ती लड़ेगा?"
गोनू झा ने मुस्कुराते हुए कहा, "कुश्ती में सिर्फ 'शरीर' की ताक़त नहीं, 'दिमाग' की ताक़त भी देखी जाती है। मैं तुमसे कुश्ती ज़रूर लूँगा, लेकिन उससे पहले तुम्हें मेरी एक बहुत ही छोटी और मामूली सी 'शर्त' पार करनी होगी। अगर तुमने वह शर्त पूरी कर दी, तो मैं अपनी हार मान लूँगा।"
पहलवान ने अकड़ते हुए कहा, "शर्त? तू क्या शर्त रखेगा? बता, क्या कोई भारी चट्टान उठानी है? या किसी हाथी को पछाड़ना है?"
गोनू झा ने अपनी जेब से रुई का एक बहुत ही छोटा और हल्का सा 'फुरहा' (टुकड़ा) निकाला। गोनू झा ने उस रुई के टुकड़े को हवा में दिखाते हुए कहा: "हाथी या चट्टान उठाने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुम बस अपनी इस महान ताक़त का इस्तेमाल करके, इस 'रुई के टुकड़े' को राजमहल की उस ऊँची 'दीवार के पार' फेंक कर दिखा दो। बस इतनी सी शर्त है!"
पहलवान ज़ोर से हँसा। "बस इतनी सी बात? इस मामूली सी रुई को दीवार के पार फेंकना कौन सा मुश्किल काम है? ला इधर!"
पहलवान ने गोनू झा के हाथ से वह रुई का टुकड़ा ले लिया। उसने पीछे हटकर एक लंबी दौड़ लगाई, अपने डोलों की पूरी ताक़त बाहों में इकट्ठा की और ज़ोर से 'हईशा' कहते हुए उस रुई के टुकड़े को राजमहल की दीवार की तरफ पूरी ताक़त से फेंक दिया!
लेकिन यह क्या? रुई में तो कोई 'वज़न' ही नहीं था। वह पहलवान के हाथ से छूटते ही थोड़ी सी हवा में उड़ी और फिर तैरती हुई वहीं उसके पैरों के पास ज़मीन पर गिर पड़ी।
पहलवान हैरान रह गया। उसने फिर से रुई उठाई, इस बार और ज़्यादा ताक़त लगाई और फेंकी। लेकिन रुई फिर से हवा में उड़कर वहीं गिर गई। दीवार के पार जाना तो दूर, वह रुई दस कदम भी आगे नहीं जा पा रही थी।
पहलवान पसीने से लथपथ हो गया। उसने अपनी पूरी ताक़त लगा दी, लेकिन विज्ञान के नियम के आगे उसकी शारीरिक ताक़त धरी की धरी रह गई। बिना वज़न की चीज़ को ताक़त से नहीं फेंका जा सकता था।
पहलवान हाँफते हुए ज़मीन पर बैठ गया और बोला, "यह कोई जादू है! इस रुई को कोई भी इंसान इतनी दूर उस ऊँची दीवार के पार नहीं फेंक सकता!"
गोनू झा मुस्कुराए। वे आगे आए, उन्होंने ज़मीन से उस रुई के टुकड़े को उठाया। फिर उन्होंने पास ही ज़मीन पर पड़ा हुआ एक छोटा सा, लेकिन भारी 'पत्थर' उठाया।
गोनू झा ने उस भारी पत्थर को रुई के अंदर लपेटा, और बिना कोई ज़ोर लगाए, बहुत ही आराम से उसे राजमहल की दीवार के पार उछाल दिया! पत्थर के वज़न के साथ-साथ वह रुई का टुकड़ा भी आसानी से दीवार के पार चला गया।
गोनू झा ने पहलवान की तरफ देखकर कहा, "देखा पहलवान जी! जहाँ ताक़त काम नहीं आती, वहाँ 'अक्ल' काम आती है। तुम शरीर से तो बहुत मज़बूत हो, लेकिन तुम्हारा दिमाग इस रुई से भी ज़्यादा हल्का है!"
पहलवान का घमंड चूर-चूर हो गया। उसे समझ आ गया कि मिथिला के लोगों को हराना इतना आसान नहीं है। वह शर्म से सिर झुकाए बिना कोई कुश्ती लड़े मिथिला छोड़कर अपने देश वापस लौट गया, और गोनू झा की जय-जयकार होने लगी।
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