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🏹 रामायण

भाग 52: हनुमान-भरत मिलाप, नंदीग्राम में पुष्पक विमान का अवतरण और रामराज्य की ओर

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 52: हनुमान-भरत मिलाप, नंदीग्राम में पुष्पक विमान का अवतरण और रामराज्य की ओर

शृंगवेरपुर में निषादराज को समाचार देने के बाद, हनुमान जी पहले ही अयोध्या के बाहर 'नंदीग्राम' पहुँच चुके थे।

नंदीग्राम में भरत जी एक छोटी सी कुटिया में कुश (घास) के आसन पर बैठे थे। उनका शरीर तपस्या और राम के वियोग में सूखकर कांटा हो चुका था। उनके बाल जटाओं में बदल चुके थे। 14 वर्ष की अवधि का अंतिम दिन आ चुका था। भरत जी सोच रहे थे, "यदि कल प्रातः काल तक मेरे राम नहीं आए, तो मैं इस शरीर को धधकती हुई अग्नि में भस्म कर दूँगा। राम के बिना अब यह जीवन एक क्षण भी स्वीकार नहीं।"

हनुमान जी और भरत का मिलन: उसी समय एक ब्राह्मण (हनुमान जी) वहां प्रकट हुए और उन्होंने अत्यंत मधुर और अमृत के समान स्वर में कहा: "हे भरत! जिन राम के वियोग में तुम रात-दिन तपस्या कर रहे हो, वे रावण का वध करके, माता सीता और लक्ष्मण को साथ लेकर अयोध्या लौट रहे हैं!"

यह समाचार सुनते ही भरत जी को ऐसा लगा मानो उनके निर्जीव शरीर में प्राण लौट आए हों। वे खुशी से रो पड़े। भरत जी ने उस ब्राह्मण (हनुमान) को कसकर गले से लगा लिया और कहा, "हे विप्र! तुमने मुझे ऐसा समाचार दिया है कि मैं इसके बदले तुम्हें अपना प्राण भी दे दूँ, तो कम है। तुम कौन हो?" हनुमान जी ने अपना वास्तविक वानर रूप धारण किया और अपना परिचय दिया। भरत जी हनुमान जी से मिलकर अत्यंत गदगद हुए। हनुमान जी ने ध्यान से देखा—भरत के मुख पर राज्य छिन जाने का कोई मोह नहीं था, बल्कि राम के आने की असीम तड़प थी।

अयोध्या में राम का आगमन: यह शुभ समाचार वायु की गति से पूरी अयोध्या में फैल गया। पूरा नगर खुशी से झूम उठा। माता कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी (जो अपने किए पर अत्यंत पछता रही थीं) रोती हुई गुरु वशिष्ठ के साथ नंदीग्राम के बाहर आ गईं।

तभी आकाश में वह विशाल और दिव्य पुष्पक विमान दिखाई दिया। जैसे ही विमान नीचे उतरा, सबसे पहले मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम विमान से बाहर आए।

भरत मिलाप: भरत दौड़ते हुए गए और श्रीराम के चरणों में गिर पड़े। वे इतने भावुक थे कि उनके मुख से एक भी शब्द नहीं निकल रहा था, केवल अश्रु बह रहे थे। श्रीराम ने भरत को उठाया और अपने सीने से लगा लिया।

यह 'भरत मिलाप' रामायण का वह सर्वोच्च क्षण है जहाँ त्याग की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। 14 वर्ष बाद दो भाई मिल रहे थे—एक जिसने धर्म के लिए चक्रवर्ती राज्य छोड़कर वनवास भोगा, और दूसरा जिसने उसी राज्य को पाकर भी एक संन्यासी का जीवन जिया।

श्रीराम ने अपनी माताओं के चरण छुए। माता कौशल्या ने अपने पुत्र का तपस्वी और कठोर शरीर देखा तो वे रो पड़ीं। जब श्रीराम ने माता कैकेयी के चरण छुए, तो कैकेयी लज्जा से अपना सिर नहीं उठा पा रही थीं। परंतु श्रीराम ने उन्हें उतना ही आदर और प्रेम दिया जितना कौशल्या माता को दिया, और कहा, "माता, इसमें आपका कोई दोष नहीं, यह सब काल और विधाता का खेल था।"

शत्रुघ्न ने लक्ष्मण को गले लगाया। सीता जी ने सभी माताओं और गुरु वशिष्ठ का आशीर्वाद लिया। सुग्रीव, विभीषण और वानर सेना यह दृश्य देखकर भावविभोर हो रही थी।

चरण पादुकाओं की वापसी: भरत जी ने अपने सिर पर रखी हुई श्रीराम की वह 'चरण पादुकाएं' (खड़ाऊँ), जिन्हें वे 14 वर्षों से राजसिंहासन पर रखकर अयोध्या का शासन चला रहे थे, अत्यंत आदर के साथ श्रीराम के चरणों में रख दीं।

भरत ने हाथ जोड़कर कहा, "भैया! आपका यह राज्य जो आपने मुझे धरोहर (अमानत) के रूप में दिया था, वह आज मैं आपको वापस सौंपता हूँ। आज मेरे सिर से यह महान भार उतर गया और मेरा जन्म सफल हो गया।"

14 वर्षों का वनवास, सीता हरण का कष्ट, रावण के वध का महासंकल्प और राम के प्रति भरत की वह असीम तपस्या—सब कुछ आज पूर्ण हो चुका था। राम अयोध्या लौट आए थे।

अब अयोध्या में वह महान और दिव्य उत्सव होने वाला था, जिसकी प्रतीक्षा देवता भी कर रहे थे—मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का राज्याभिषेक। यह उस स्वर्णिम युग की शुरुआत थी, जिसे आज भी पूरी दुनिया 'रामराज्य' के नाम से जानती है, जहाँ धर्म, सत्य, न्याय और समानता का शासन था।

(रामायण की यह विस्तृत कथा यात्रा यहीं अपने सबसे शुभ और आनंदमयी पड़ाव पर पूर्ण होती है।)

🎉 कहानी समाप्त

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