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भाग 51: पुष्पक विमान की उड़ान, भरद्वाज आश्रम और निषादराज गुह से वह ऐतिहासिक भेंट

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 51: पुष्पक विमान की उड़ान, भरद्वाज आश्रम और निषादराज गुह से वह ऐतिहासिक भेंट

लंका युद्ध समाप्त हो चुका था और 14 वर्ष के वनवास की अवधि पूर्ण होने में अब केवल एक दिन शेष था। श्रीराम ने लंकापति विभीषण से कहा, "हे मित्र! मेरा वनवास कल समाप्त हो रहा है। यदि मैं कल सूर्योदय से पूर्व अयोध्या नहीं पहुँचा, तो मेरा भाई भरत धधकती हुई अग्नि में जलकर प्राण त्याग देगा।"

विभीषण के निवेदन पर श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण उस अलौकिक 'पुष्पक विमान' में सवार हुए। सुग्रीव, हनुमान, अंगद, जाम्बवंत और विभीषण सहित पूरी वानर सेना भी अपने आराध्य के साथ अयोध्या चलने के लिए उस जादुई विमान में बैठ गई, जो मन की गति से उड़ता था।

आसमान से युद्ध भूमि और दंडकारण्य के दर्शन: पुष्पक विमान अपनी अलौकिक गति से आकाश में उड़ चला। विमान में बैठी माता सीता को श्रीराम नीचे के वे सभी स्थान दिखाने लगे जहाँ भयंकर संग्राम हुआ था और जहाँ उन्होंने वियोग के दिन काटे थे।

श्रीराम ने बताया: "सीते! देखो, वह 'राम सेतु' है जो वानरों ने समुद्र पर बनाया था। देखो, यह किष्किंधा नगरी है, जहाँ मेरी सुग्रीव से मित्रता हुई थी।" सीता जी के अनुरोध पर विमान किष्किंधा में रुका और सुग्रीव तथा बालि की पत्नियों (तारा, रूमा आदि) को भी अयोध्या के उत्सव में शामिल होने के लिए विमान में बैठा लिया गया। इसके बाद विमान दंडकारण्य, पंचवटी और गोदावरी नदी को पार करता हुआ उत्तर भारत की ओर बढ़ने लगा।

भरद्वाज मुनि का आश्रम और हनुमान जी को भेजना: विमान अत्यंत तीव्र गति से उड़ता हुआ प्रयागराज (प्रयाग) में 'गंगा-यमुना' के संगम पर महर्षि 'भरद्वाज' के आश्रम पर उतरा। श्रीराम ने मुनिराज को प्रणाम किया। 14 वर्ष पूर्व जब राम वनवास जा रहे थे, तब भी वे इसी आश्रम में रुके थे। मुनि भरद्वाज ने राम को विजयी देखकर उन्हें हृदय से लगा लिया।

यहाँ से अयोध्या अधिक दूर नहीं थी। श्रीराम ने हनुमान जी को बुलाया और उन्हें दो अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य सौंपे। श्रीराम ने कहा, "हे हनुमान! तुम मानव रूप धारण करके अयोध्या की ओर जाओ। परंतु मार्ग में सबसे पहले 'शृंगवेरपुर' (गंगा तट) पर रुकना। वहां मेरा परम सखा, भीलों का राजा 'निषादराज गुह' रहता है। उसे मेरे लौटने का समाचार देना। उसके बाद तुम नंदीग्राम जाना और भरत को मेरे आने की सूचना देना।"

निषादराज गुह का वह असीम प्रेम और प्रतीक्षा: हनुमान जी वायु के वेग से शृंगवेरपुर पहुँचे। वहां उन्होंने देखा कि निषादराज गुह गंगा के तट पर उदास बैठे हैं। उनकी आंखें अयोध्या की दिशा में टकटकी लगाए हुए थीं और वे दिन गिन रहे थे कि कब उनके राम लौटेंगे।

हनुमान जी ने पास जाकर कहा, "हे निषादराज! आपके सखा श्रीराम, रावण का वध करके और माता सीता को साथ लेकर लौट रहे हैं।" यह सुनते ही निषादराज गुह खुशी से उछल पड़े। उनके नेत्रों से आंसुओं की धारा बह निकली। वे उसी समय अपनी प्रजा को लेकर उस दिशा की ओर दौड़ पड़े जहाँ से राम का विमान आने वाला था।

श्रीराम और निषादराज गुह का मिलन (गंगा तट पर): कुछ ही समय पश्चात, वह सूर्य के समान चमकता हुआ पुष्पक विमान गंगा के तट पर उतरा। निषादराज गुह दौड़ते हुए आए, परंतु संकोचवश वे राम से दूर ही धरती पर साष्टांग दंडवत होकर गिर पड़े। उन्हें लगा कि 'मैं तो एक तुच्छ वनवासी भील हूँ, और राम अब चक्रवर्ती सम्राट और त्रिलोक के विजेता हैं, मैं उनके पास कैसे जाऊँ?'

परंतु मर्यादा पुरुषोत्तम राम के लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं था। श्रीराम ने जैसे ही अपने सखा गुह को धरती पर गिरे देखा, वे दौड़कर उनके पास गए। श्रीराम ने निषादराज को दोनों हाथों से उठाया और उन्हें अत्यंत कसकर अपने हृदय (सीने) से लगा लिया! गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस दृश्य का अत्यंत अद्भुत वर्णन किया है: "भेंटत हृदयँ जुड़ाइ जनु ताते। मिलेउ रामु गुह निषादहिं राते॥" (अर्थात: श्रीराम निषादराज गुह से इस प्रकार अत्यंत प्रेम और आत्मीयता से मिले, जैसे कोई अपने सगे भाई से मिलता है।)

श्रीराम ने निषादराज और भरत में कोई अंतर नहीं रखा। राम ने सीता जी और लक्ष्मण से कहा, "यही वह मेरा सच्चा सखा है, जिसने वनवास की पहली रात हमें गंगा पार कराई थी और पत्तों की शय्या पर हमारे पहरेदार की तरह रात भर जागता रहा था।" निषादराज गुह सीता जी और लक्ष्मण के चरणों में गिरे। वानर सेना यह दृश्य देखकर चकित थी कि देवताओं को दुर्लभ साक्षात नारायण एक वनवासी भील को गले लगाकर रो रहे हैं। यही श्रीराम की वास्तविक मर्यादा और सामाजिक समरसता थी।

निषादराज से भेंट करने के पश्चात, श्रीराम ने उन्हें भी विमान में अपने साथ बैठा लिया। अब पुष्पक विमान अपनी अंतिम मंजिल—नंदीग्राम और अयोध्या—की ओर उड़ चला, जहाँ एक तपस्वी भाई (भरत) 14 वर्षों से अग्नि के समान जल रहा था।

🎉 कहानी समाप्त

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