यमराज का निमंत्रण और चालाक बुढ़िया

एक गाँव में 'पार्वती दादी' नाम की एक बुढ़िया रहती थी। पार्वती दादी की उम्र 95 साल हो चुकी थी। उनके बाल बिल्कुल सफेद थे, चेहरे पर झुर्रियाँ थीं और दाँत टूट चुके थे, लेकिन उनका दिमाग कंप्यूटर से भी तेज़ चलता था। दादी को ज़िंदगी से बहुत प्यार था और वे अभी बिल्कुल नहीं मरना चाहती थीं।
एक दिन दोपहर के समय, दादी अपने आँगन में खटिया पर बैठी धूप सेंक रही थीं। अचानक उनके सामने एक बहुत ही भयंकर और विशालकाय परछाई उभरी।
दादी ने आँखें उठाकर देखा। सामने भैंसे पर सवार, हाथ में बड़ा सा गदा लिए साक्षात 'यमराज' खड़े थे!
यमराज ने अपनी भारी और गूँजती हुई आवाज़ में कहा: "पार्वती! तुम्हारा समय पूरा हो गया है। अपना झोला उठाओ और मेरे साथ परलोक चलने की तैयारी करो।"
पार्वती दादी के तो पहले पसीने छूट गए, लेकिन फिर उनका खुराफाती दिमाग दौड़ने लगा। उन्होंने सोचा कि अगर मैं रोऊँगी-गिड़गिड़ाऊँगी, तो यमराज नहीं मानेंगे। इन्हें बेवकूफ़ बनाना पड़ेगा।
दादी ने बहुत ही प्यार और मीठी आवाज़ में हाथ जोड़कर कहा: "यमराज जी! आप तो साक्षात भगवान हैं। मैं चलने को बिल्कुल तैयार हूँ। लेकिन आप इतनी दूर से चलकर आए हैं, बहुत थक गए होंगे। मेरी पोती ने अभी-अभी रसोई में गरमा-गरम 'गाजर का हलवा' बनाया है। बस एक बार मेरे हाथ से वह हलवा खा लीजिए, फिर मैं खुशी-खुशी आपके साथ चल पड़ूँगी।"
यमराज को पृथ्वी लोक का खाना बहुत पसंद था। हलवे का नाम सुनकर उनके मुँह में पानी आ गया। यमराज ने कहा, "ठीक है! लेकिन मेरे पास सिर्फ 'आधे घंटे' का समय है। मैं भैंसे को पानी पिलाकर आता हूँ, तब तक तुम हलवा तैयार रखो।"
यमराज जैसे ही भैंसे को लेकर बाहर गए, दादी ने अपना 'मास्टर प्लान' शुरू कर दिया।
दादी फुर्ती से उठीं और अपनी दस साल की पोती के कमरे में घुस गईं। दादी ने अपनी वह सूती साड़ी उतारी। उन्होंने अपनी पोती की एक चमकीली लाल रंग की 'छोटी सी फ्रॉक' बड़ी मुश्किल से अपने ऊपर पहन ली।
अपने सफेद बालों में उन्होंने पोती के दो लाल 'रिबन' लगाकर दो छोटी-छोटी 'चोटियाँ' बाँध लीं। गालों पर ढेर सारा पाउडर थोप लिया और होंठों पर लाल रंग की लिपस्टिक लगा ली।
इसके बाद दादी ने अपनी पोती का एक छोटा सा 'खिलौना' एक हाथ में लिया और दूसरे हाथ में एक 'लॉलीपॉप' पकड़ लिया।
पूरा 'गेटअप' बदलने के बाद, 95 साल की पार्वती दादी ज़मीन पर एक छोटी सी 'चटाई' बिछाकर बैठ गईं और एक 'पाँच साल की छोटी बच्ची' की तरह लॉलीपॉप चूसने का नाटक करने लगीं।
आधे घंटे बाद, यमराज अपना गदा लेकर वापस कमरे में घुसे।
"पार्वती! चलो मेरा हलवा कहाँ है? और तुम तैयार हो गई क्या?" यमराज ने आवाज़ लगाई।
यमराज ने कमरे में चारों तरफ देखा। उन्हें वह 95 साल की झुर्रियों वाली सफेद बालों वाली बुढ़िया कहीं नज़र नहीं आई।
तभी यमराज की नज़र ज़मीन पर बैठी उस 'लाल फ्रॉक और दो चोटियों वाली अजीब सी बच्ची' पर पड़ी, जो खिलौने से खेल रही थी और लॉलीपॉप चूस रही थी।
यमराज उस 'बच्ची' (पार्वती दादी) के पास गए और बहुत ही प्यार से झुककर पूछा: "अरे बेटा! यहाँ अभी एक 95 साल की बुढ़िया बैठी थी, जिसका नाम पार्वती है। वह तुम्हारी दादी है क्या? वह कहाँ गई?"
पार्वती दादी ने लॉलीपॉप मुँह से निकाला और बिल्कुल एक 'छोटी और तोतली बच्ची' की आवाज़ निकालते हुए मुँह बनाकर कहा:
"अंकल जी! दा-दी... दा-दी तो मेला देखने गई हैं! मैं तो अभी बहुत छौटी (छोटी) बच्ची हूँ। क्या आप मेरे छाथ (साथ) खिलौने से खेलेंगे?"
यमराज का दिमाग चकरा गया। उन्होंने अपना सिर खुजाया।
यमराज ने मन ही मन सोचा: "हे भगवान! लगता है मैं गलती से किसी गलत घर में घुस आया हूँ। यहाँ तो कोई बुढ़िया है ही नहीं, सिर्फ एक छोटी सी पाँच साल की बच्ची है, जिसके बेचारी के दाँत भी अभी तक नहीं आए हैं! अगर मैं बिना बुढ़िया के वापस गया, तो चित्रगुप्त (यमराज के मुंशी) बहुत गुस्सा करेंगे।"
यमराज ने उस 'बच्ची' के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और कहा: "नहीं बेटा! तुम अपने खिलौने से खेलो। अंकल गलत पते पर आ गए हैं। मैं तुम्हारी दादी को ढूँढने मेले में जाता हूँ। और हाँ... तुम ज़्यादा लॉलीपॉप मत चूसना, वरना तुम्हारे भी दाँत तुम्हारी दादी की तरह टूट जाएँगे!"
यह कहकर यमराज अपना गदा उठाकर वहाँ से उलटे पाँव लौट गए और मेले में बुढ़िया को ढूँढने लगे!
जैसे ही यमराज घर से बाहर निकले, पार्वती दादी ने लॉलीपॉप फेंका, ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाकर हँसने लगीं और अपनी चतुराई से उन्होंने 'साक्षात मौत' को भी बेवकूफ़ बना दिया!
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