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🏹 रामायण

भाग 8: कैकेयी के दो वरदान, दशरथ का विलाप और श्रीराम का संकल्प

महर्षि वाल्मीकि — रामायण7 मिनट का पठन
भाग 8: कैकेयी के दो वरदान, दशरथ का विलाप और श्रीराम का संकल्प

महाराज दशरथ अत्यंत हर्षित मन से रानी कैकेयी के महल में पहुँचे। वे उसे श्रीराम के राज्याभिषेक का शुभ समाचार देना चाहते थे। किंतु जब दासियों ने बताया कि रानी कोपभवन में हैं, तो दशरथ के पांव ठिठक गए। वे घबराए हुए अंदर गए और देखा कि उनकी सबसे प्रिय और सुंदर रानी कैकेयी मैले वस्त्र पहने, आभूषण त्याग कर जमीन पर पड़ी रो रही है।

दशरथ ने अत्यंत स्नेह से कैकेयी के आंसू पोंछे और पूछा, "हे प्रिये! तुम्हें किसने दुख दिया है? यदि किसी ने तुम्हारा अपमान किया है, तो मैं उसे मृत्युदंड दे सकता हूँ। तुम जो चाहोगी, मैं वही करूँगा। राम की सौगंध खाकर कहता हूँ, तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूँगा।"

राम की सौगंध सुनते ही कैकेयी उठ बैठी। मंथरा की सिखाई हुई बातें उसके मन में विष की तरह फैल चुकी थीं। उसने कठोर स्वर में कहा, "महाराज! मुझे कोई नई वस्तु नहीं चाहिए। क्या आपको याद है कि देवासुर संग्राम में जब आपके रथ का पहिया टूट गया था, तब मैंने आपकी जान बचाई थी? उस समय आपने मुझे दो वरदान दिए थे, जिन्हें मैंने धरोहर के रूप में आपके पास रख छोड़ा था। आज मैं अपने वे दोनों वरदान मांगती हूँ।"

दशरथ ने प्रसन्न होकर कहा, "मांगो प्रिये! आज राम का राज्याभिषेक होने वाला है, इस खुशी में तुम जो मांगोगी, मैं दूँगा।"

कैकेयी की आंखें ईर्ष्या से चमक उठीं। उसने कहा, "तो सुनिए महाराज! मेरे पहले वरदान के अनुसार, राम के लिए की गई सारी तैयारियों के साथ मेरे पुत्र भरत का राज्याभिषेक किया जाए। और दूसरे वरदान के अनुसार, राम को तपस्वियों के वेश में चौदह वर्ष के लिए दंडक वन में निर्वासित कर दिया जाए।"

ये शब्द दशरथ के कानों में वज्र के समान गिरे। उनका हृदय कांप उठा और वे "हे राम!" कहते हुए मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़े। कुछ देर बाद जब उन्हें होश आया, तो वे कैकेयी के पैरों में गिर पड़े और गिड़गिड़ाते हुए बोले, "कैकेयी! राम ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? वह तो तुम्हारी सबसे अधिक सेवा करता है। तुम चाहो तो मेरा सारा राज्य ले लो, अयोध्या का खजाना ले लो, लेकिन मेरे राम को वन में मत भेजो। वह मेरा प्राण है, उसके बिना मैं जीवित नहीं रह सकूँगा।"

परंतु कैकेयी पत्थर के समान कठोर हो चुकी थी। उसने ताना मारते हुए कहा, "रघुकुल की रीति है कि प्राण जाएं पर वचन न जाए। यदि आप अपने वचन से मुकरेंगे, तो मैं आज ही विष पीकर अपने प्राण दे दूँगी और कलंक आपके माथे पर लगेगा।"

पूरी रात महाराज दशरथ विलाप करते रहे। सुबह हो गई। अयोध्या में उत्सव का शोर शुरू हो गया, मंगल वाद्य बजने लगे। महर्षि वशिष्ठ ने सुमंत्र को महाराज को बुलाने भेजा। सुमंत्र जब कैकेयी के कक्ष में आए, तो दशरथ की दयनीय दशा देखकर सन्न रह गए। कैकेयी ने सुमंत्र को आदेश दिया, "महाराज राम से मिलना चाहते हैं, तुरंत राम को यहाँ बुला लाओ।"

सुमंत्र के बुलावे पर श्रीराम तत्काल वहां पहुँचे। उन्होंने देखा कि पिता धरती पर पड़े आंसू बहा रहे हैं और उनकी दृष्टि राम से बच रही है। श्रीराम ने चिंतित होकर कैकेयी से पूछा, "माता! पिताजी की इस दशा का क्या कारण है? क्या मुझसे कोई अपराध हो गया है?"

कैकेयी ने निर्दयता से कहा, "राम! तुम्हारे पिता ने मुझे दो वरदान दिए थे—भरत को राज और तुम्हें चौदह वर्ष का वनवास। अब अपने पुत्र-मोह में ये अपने वचन से पीछे हट रहे हैं। यदि तुम सच्चे और पितृभक्त हो, तो अपने पिता के वचन की लाज रखो।"

पिता के वचन और कैकेयी की कठोर मांग सुनकर भी श्रीराम के मुख पर तनिक भी दुख या क्रोध नहीं आया। उनके चेहरे की शांति ज्यों की त्यों बनी रही। उन्होंने अत्यंत मधुर मुस्कान के साथ हाथ जोड़कर कहा, "बस इतनी सी बात माता? इसके लिए पिताजी इतना संताप क्यों कर रहे हैं? पिता की आज्ञा और आपका आदेश मेरे लिए सर्वोपरि है। भरत को राज्य मिले, इससे बड़ा सुख मेरे लिए और क्या हो सकता है? मैं आज ही मुनियों का वेश धारण करके वन को प्रस्थान करूँगा, ताकि पिताजी का वचन झूठा न पड़े।"

श्रीराम ने अपने पिता के चरण छुए, जो अब भी शोक में सुध-बुध खोए हुए थे। इसके पश्चात, श्रीराम अत्यंत शांत भाव से अपनी माता कौशल्या को यह समाचार देने और उनसे वन जाने की आज्ञा लेने के लिए उनके महल की ओर चल दिए। कल जहाँ राज्याभिषेक की तैयारियां थीं, वहाँ अब वनवास का मार्ग प्रशस्त हो रहा था।

🎉 कहानी समाप्त

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