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"ऊँट के मुँह में ज़ीरा"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"ऊँट के मुँह में ज़ीरा"

पहलवानपुर गाँव में एक बहुत ही मशहूर और विशालकाय पहलवान रहता था, जिसका नाम था 'भीमा पहलवान'।

भीमा का शरीर किसी छोटे पहाड़ जैसा था। उसकी छाती चौड़ी, भुजाएँ पेड़ के तने जैसी और उसका पेट एक बहुत बड़े मटके जैसा था। भीमा अखाड़े में बड़े-बड़े पहलवानों को पलक झपकते ही धूल चटा देता था।

जितना बड़ा भीमा का शरीर था, उतनी ही बड़ी उसकी 'खुराक' भी थी। भीमा जब नाश्ता करने बैठता, तो वह अकेले ही दो किलो दूध पी जाता, चार दर्ज़न केले खा लेता और कम से कम बीस रोटियाँ तो उसके लिए आम बात थी। दोपहर के खाने में उसे चावल की पूरी परात चाहिए होती थी।

कंजूस सेठ की दावत: उसी गाँव में एक बहुत ही 'कंजूस सेठ' रहता था। एक दिन सेठ ने अपने घर पर एक 'भंडारे' का आयोजन किया। उसने पूरे गाँव को दावत पर बुलाया। भीमा पहलवान को भी न्योता मिला।

भीमा बहुत खुश हुआ। उसने सोचा: "वाह! आज तो सेठ जी के घर दावत है। खूब पूड़ियाँ, कचौड़ियाँ और जलेबियाँ खाने को मिलेंगी। आज तो मैं अपना पेट छक कर भरूँगा!" दावत के लालच में भीमा ने सुबह से कुछ नहीं खाया था, ताकि वह भंडारे में ज़्यादा खा सके। उसके पेट में चूहे कूद रहे थे।

शाम को भीमा अपने सबसे बड़े बर्तन और खाली पेट के साथ सेठ की हवेली पर पहुँच गया। वह पंगत (Line) में सबसे आगे जाकर बैठ गया। उसकी आँखों में चमक थी और वह खाना परोसे जाने का इंतज़ार कर रहा था।

दावत का मज़ाक: कंजूस सेठ ने खाना परोसने वालों को सख्त हिदायत दी थी कि किसी को भी ज़्यादा खाना मत देना, ताकि पैसे बच सकें।

खाना परोसने वाला आदमी एक छोटी सी टोकरी लेकर भीमा के पास आया। उसने भीमा के विशाल पत्तल पर केवल 'दो बहुत ही छोटी और पतली पूड़ियाँ' और एक चम्मच आलू की सब्ज़ी रख दी, और आगे बढ़ गया।

भीमा पहलवान ने आँखें फाड़कर अपने पत्तल की तरफ देखा। उसे लगा कि शायद यह केवल स्वाद चखने के लिए दिया गया है। उसने वह दोनों पूड़ियाँ उठाईं और एक ही बार में अपने बड़े से मुँह में डाल लीं। वह पूड़ियाँ भीमा के विशाल गले के नीचे कहाँ गायब हो गईं, उसे खुद भी पता नहीं चला।

भीमा ने परोसने वाले को आवाज़ दी: "अरे भाई! यह क्या मज़ाक है? असल खाना कब लाओगे? मेरे पेट में तो आग लगी है।"

सेठ जी ने दूर से सुना और पास आकर कंजूसी से मुस्कुराते हुए बोले: "अरे भीमा भाई! दावत तो यही थी। आपने अपना हिस्सा खा लिया, अब आप उठ सकते हैं।"

भीमा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने अपना बड़ा सा पेट पकड़कर ज़ोर से दहाड़ते हुए कहा: "सेठ जी! मेरी खुराक रोज़ाना सौ रोटियों की है, और आपने मुझे सुबह से भूखा रखकर केवल यह 'दो छोटी पूड़ियाँ' थमा दीं? यह कोई दावत है? यह दो पूड़ियाँ तो मेरे पेट के एक कोने तक भी नहीं पहुँचीं। मेरी इस विशाल भूख के सामने आपकी यह दावत तो बिल्कुल 'ऊँट के मुँह में ज़ीरा' डालने जैसी है!" (जैसे एक विशाल ऊँट को खाने के लिए केवल एक छोटा सा ज़ीरे का दाना दे दिया जाए, जिससे उसकी भूख का कोई इलाज नहीं हो सकता)।

भीमा पहलवान गुस्से में अपना खाली बर्तन उठाकर हवेली से बाहर चला गया, और कंजूस सेठ की इस हरकत पर पूरा गाँव ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।

🎉 कहानी समाप्त

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