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कंजूस मक्खीचूस और उसके तीन बेटे

लोक परंपरा — भारतीय लोककथा7 मिनट का पठन
कंजूस मक्खीचूस और उसके तीन बेटे

एक गाँव में 'सेठ करोड़ीमल' नाम के एक बहुत ही मशहूर कंजूस रहते थे। वे इतने बड़े कंजूस थे कि अगर उनकी चाय में मक्खी गिर जाती, तो वे चाय फेंकने के बजाय, उस मक्खी को निकालकर उसे चूसते थे ताकि मक्खी के साथ चिपकी हुई चाय की एक बूँद भी बेकार न जाए! इसी वजह से पूरे गाँव में उनका नाम 'कंजूस मक्खीचूस' पड़ गया था।

सेठ जी के तीन बेटे थे— रामू, शामू और मोनू। तीनों अपने पिता के ही नक़्शे-कदम पर चलते थे।

जब सेठ करोड़ीमल बहुत बूढ़े हो गए और अपने मृत्यु-शय्या पर लेटे हुए थे, तो उन्होंने सोचा कि अपनी तिजोरी की चाबी उसी बेटे को दूँगा, जो कंजूसी में मुझसे भी दो कदम आगे होगा।

सेठ जी ने खाँसते हुए अपने तीनों बेटों को बिस्तर के पास बुलाया। "मेरे बच्चो! मेरा आखिरी समय आ गया है। मैं अपनी सारी दौलत और तिजोरी की चाबी अपने सबसे 'लायक' (सबसे बड़े कंजूस) बेटे को देना चाहता हूँ। मुझे बताओ कि आज तुम तीनों ने पैसे बचाने के लिए क्या-क्या किया?"

सबसे बड़ा बेटा 'रामू' आगे आया और गर्व से बोला: "पिता जी! आज मुझे बाज़ार जाना था। मैंने जूतों के तलवे घिसने से बचाने के लिए एक बहुत ही शानदार तरकीब निकाली। मैं पूरे रास्ते तीन-तीन फुट के 'लंबे-लंबे कदम' रखकर चला। इससे मेरे जूतों का बहुत कम हिस्सा ज़मीन पर रगड़ाया और मैंने जूतों की आधी उम्र बचा ली!"

सेठ जी ने थोड़ी खुशी से सिर हिलाया, "शाबाश बेटे! तूने अच्छा किया।"

तभी मँझला बेटा 'शामू' हँसते हुए आगे आया: "पिता जी! रामू तो बेवकूफ़ है। लंबे कदम रखने से जूते तो बच जाते हैं, लेकिन पैंट (पाजामा) बीच में से फटने का डर रहता है! दर्ज़ी का खर्चा कौन देगा? मैंने आज इससे भी बड़ी कंजूसी की। मैंने अपने नए जूते पैरों से उतारे, उन्हें अपनी 'बगल' में दबाया और बाज़ार के पूरे कंकर-पत्थर वाले रास्ते पर 'नंगे पैर' चला! मेरे पैरों में कांटे चुभे, खून निकला, लेकिन मैंने अपने जूतों पर खरोंच तक नहीं आने दी!"

सेठ जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। "वाह मेरे शेर! तू तो मुझसे भी बड़ा कंजूस निकला। तिजोरी की चाबी तेरी हुई।"

तभी सबसे छोटा बेटा 'मोनू' ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। "पिता जी! मेरे दोनों बड़े भाई एक नंबर के बेवकूफ़ हैं! जूते खरीदकर उन्हें बगल में दबाने का क्या फायदा? पैसे तो खर्च हो ही गए ना!"

सेठ जी ने हैरानी से पूछा, "तो फिर तूने आज क्या किया मोनू?"

मोनू ने अपनी कॉलर ठीक करते हुए सीना तानकर कहा: "पिता जी! मैंने तो जूते खरीदे ही नहीं! आज मुझे बाज़ार जाना था, तो मैंने 'पड़ोसी के जूते' यह कहकर उधार माँग लिए कि मैं शादी में जा रहा हूँ। और फिर मैं पूरे बाज़ार में उन जूतों को ज़मीन पर ज़ोर-ज़ोर से 'रगड़-रगड़ कर' चला! मैंने पड़ोसी के जूतों के तलवे पूरी तरह घिस डाले और अपना एक भी पैसा खर्च नहीं किया!"

यह सुनकर सेठ करोड़ीमल की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने काँपते हाथों से तिजोरी की चाबी निकाली और मोनू की तरफ बढ़ाते हुए कहा: "तू... तू ही मेरा असली वारिस है! तूने तो कंजूसी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए!"

मोनू ने खुशी-खुशी चाबी ले ली।

अचानक सेठ करोड़ीमल की नज़र कमरे के दरवाज़े की तरफ गई। उनकी आँखों में अचानक बहुत ज़ोर का 'गुस्सा' आ गया।

सेठ जी ने अपनी आखिरी टूटती हुई साँसों के साथ चिल्लाकर अपने तीनों बेटों से पूछा: "अरे! रामू यहाँ है? शामू यहाँ है? मोनू भी यहाँ बिस्तर के पास खड़ा है?"

तीनों बेटों ने एक साथ कहा, "जी पिता जी! हम तीनों आपके पास ही खड़े हैं।"

यह सुनते ही सेठ करोड़ीमल ने अपना सिर पीट लिया और अपनी आखिरी साँस छोड़ते हुए चीखे: "हे भगवान! मैं लुट गया! अगर तुम तीनों यहाँ मेरे बिस्तर के पास खड़े हो... तो फिर बाहर दालान में 'लालटेन' किसके बाप के लिए जल रही है? जाकर उसे बुझाओ, मिट्टी का तेल मुफ्त में नहीं आता...!"

और इतना कहते ही 'लालटेन का तेल बचाने के दुख में' सेठ करोड़ीमल के प्राण पखेरू उड़ गए! यह किस्सा कंजूसी की दुनिया का सबसे बड़ा और हास्यपूर्ण 'मास्टरपीस' माना जाता है।

🎉 कहानी समाप्त

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