कंजूस सेठ का मेहमान

किसी गाँव में एक सेठ रहता था, जो अपनी बेइंतहा कंजूसी के लिए पूरे इलाक़े में मशहूर था। उसके घर में घी-दूध की कमी नहीं थी, पर वह एक फूटी कौड़ी भी किसी और पर ख़र्च करना पाप समझता था। मेहमान तो उसके लिए किसी आफ़त से कम नहीं थे — जैसे ही कोई उसके दरवाज़े पर आता दिखता, सेठ का दिल धड़कने लगता कि कहीं उसे खाना न खिलाना पड़ जाए।
एक दिन शाम ढलते समय सेठ के दूर के रिश्ते का एक भांजा उसके घर आ पहुँचा। रास्ते की थकान से चूर, भूखा-प्यासा। सेठ ने उसे देखते ही मन ही मन सोचा — "आज तो मुसीबत आ गई। इसे किसी तरह टालना पड़ेगा।"
ऊपर से मुस्कुराते हुए सेठ बोला — "अरे भांजे! कितने दिनों बाद आए! बैठो, बैठो।"
भांजा बैठ गया और थोड़ी देर बाद बोला — "मामाजी, रास्ते में कुछ खाया नहीं, बड़ी भूख लगी है।"
सेठ ने माथे पर हाथ मारते हुए कहा — "अरे भांजे, तुम्हारी बड़ी बदकिस्मती है! आज ही की तो बात है, आज सुबह ही हमारे घर में एक अनोखा नियम शुरू हुआ है — हमारे पंडितजी ने बताया है कि इस महीने की इस तिथि पर घर में चूल्हा जलाना अशुभ होता है। इसलिए आज खाना बना ही नहीं है।"
भांजा हैरान होकर बोला — "अच्छा? तो कुछ ठंडा-सूखा ही दे दीजिए, रोटी-अचार जो भी हो।"
सेठ बोला — "वो भी नहीं भांजे। रात होते ही घर के सारे बर्तन धोकर रख दिए जाते हैं, नहीं तो घर में चूहे आ जाते हैं। अब बर्तन खोलना मतलब फिर से वही झंझट।"
भांजा सोचने लगा कि चलो पानी ही पी लूँ। उसने कहा — "ठीक है मामाजी, कम से कम पानी तो पिला दीजिए।"
सेठ का चेहरा और गंभीर हो गया — "यह भी नहीं हो सकता भांजे। हमारे कुएँ का पानी शाम ढलने के बाद निकालना मना है — दादाजी के ज़माने से यही रिवाज़ चला आ रहा है। कहते हैं शाम को कुएँ में पितरों की आत्माएँ पानी पीने आती हैं।"
भांजा अब पूरी तरह समझ चुका था कि मामाजी उसे टरकाने की कोशिश कर रहे हैं, पर उसने भी ठान लिया कि आज मामाजी से कुछ-न-कुछ निकलवा कर ही रहूँगा। वह मुस्कुराते हुए बोला — "कोई बात नहीं मामाजी, जब खाना-पानी कुछ नहीं है, तो चलिए मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ, इसी बहाने वक़्त कट जाएगा।"
सेठ को लगा चलो अच्छा है, कम-से-कम कुछ ख़र्च तो नहीं होगा। वह बोला — "हाँ हाँ, ज़रूर सुनाओ।"
भांजा बोलने लगा — "एक बार की बात है, एक गाँव में एक सेठ रहता था। वह इतना कंजूस था कि..." — कहते-कहते वह रुक गया और सेठ के मुँह की तरफ़ देखने लगा।
सेठ बेचैन होकर बोला — "आगे बोलो, आगे बोलो, फिर क्या हुआ?"
भांजा बोला — "मामाजी, आगे की कहानी सुनाने से पहले मुझे थोड़ा गुड़ खाना पड़ेगा, वरना गला सूख जाता है और आवाज़ नहीं निकलती। है तो नहीं आपके यहाँ खाने-पीने का इंतज़ाम, पर अगर कहीं से थोड़ा गुड़ मिल जाए तो..."
सेठ फँस चुका था। कहानी सुनने की उत्सुकता में वह उठा और अंदर से चुपके से एक छोटी-सी गुड़ की डली ले आया। भांजे ने गुड़ खाया और फिर कहानी आगे बढ़ाई — "तो वह सेठ इतना कंजूस था कि एक दिन उसके घर एक मेहमान आया..." — फिर रुक गया — "मामाजी, गला फिर सूख गया, अगर एक कटोरी छाछ मिल जाती तो..."
सेठ अब पूरी तरह कहानी में उलझ चुका था। वह फिर अंदर गया और छाछ ले आया। इसी तरह भांजा हर थोड़ी देर बाद कहानी को बीच में रोककर कभी रोटी, कभी अचार, कभी थोड़ी सब्ज़ी माँगता रहा, और सेठ, कहानी का अंत जानने की बेचैनी में, हर बार चुपचाप उठकर चीज़ें लाता रहा।
आख़िरकार जब भांजे का पेट भर गया, तो उसने कहानी ख़त्म करते हुए कहा — "मामाजी, फिर उस कहानी के सेठ ने मेहमान को इतने बहाने बना-बनाकर टाला कि आख़िर मेहमान ने अपनी अक्ल से ही उसे पूरा खाना खिलवा लिया — बिल्कुल वैसे ही जैसे अभी-अभी हुआ!"
सेठ को एक पल के लिए कुछ समझ नहीं आया, फिर अचानक उसे एहसास हुआ कि यह "कहानी" तो असल में उसी के साथ अभी घटी है। वह मुँह ताकता रह गया।
अगली सुबह जब यह क़िस्सा गाँव में फैला, तो हर कोई सेठ की कंजूसी और उसके भांजे की चतुराई पर खूब हँसा। तभी से गाँव में यह कहावत मशहूर हो गई — "कंजूसी चाहे जितनी बड़ी हो, चतुराई के आगे टिक नहीं पाती।"
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