मुफ़्त की खिचड़ी

किसी शहर में एक आदमी था, जिसका नाम था मंगलू। मंगलू का एक ही शौक़ था — मुफ़्त का खाना। जहाँ भी शादी-ब्याह, भंडारा या जलसा सुनता, बिना बुलाए वहाँ पहुँच जाता और डटकर खाना खा आता। उसने सालों की मेहनत से यह हुनर सीख लिया था कि किसी भी बड़ी भीड़ में कैसे घुस जाना है, जैसे वह भी परिवार का ही कोई सदस्य हो।
एक दिन उसे पता चला कि शहर के सबसे बड़े सेठ के बेटे की शादी है, और बारात में हज़ारों लोग आने वाले हैं। ऐसे बड़े जलसे में तो घुसना मंगलू के लिए बाएँ हाथ का खेल था। उसने अच्छे कपड़े पहने, सिर पर पगड़ी बाँधी, और सीधा शादी वाले घर जा पहुँचा।
गेट पर खड़े दरबान ने पूछा — "आप किधर से आए हैं?"
मंगलू ने बिना रुके जवाब दिया — "मैं दूल्हे के मामा की तरफ़ से हूँ, दूसरे शहर से आया हूँ।" दरबान ने कोई सवाल नहीं किया और उसे अंदर जाने दिया।
अंदर पहुँचकर मंगलू सीधा पंगत में जा बैठा। खाना परोसा जाने लगा — पूड़ी, सब्ज़ी, मिठाई, रायता। मंगलू ने मन ही मन सोचा, "आज तो मज़ा आ गया," और उसने पहली थाली फटाफट साफ़ कर दी।
तभी बगल में बैठे एक बुज़ुर्ग ने उससे पूछा — "आप दूल्हे पक्ष से हैं या दुल्हन पक्ष से?"
मंगलू, जो अब तक इस खेल में माहिर हो चुका था, तुरंत बोला — "जी, मैं दुल्हन के फूफा का साला हूँ।"
बुज़ुर्ग ने सिर हिलाया और आगे कोई सवाल नहीं किया। मंगलू ने राहत की साँस ली और दूसरी थाली मँगवा ली।
थोड़ी देर बाद, दूल्हे के असली मामा वहाँ आ पहुँचे, जो सच में दूसरे शहर से आए थे। वे भी उसी पंगत में मंगलू के पास ही बैठ गए। बातचीत शुरू हुई तो मामा ने पूछा — "भाई साहब, आप किधर से हैं?"
मंगलू ने बिना घबराए वही पुराना जवाब दोहराया — "जी, मैं दूल्हे के मामा की तरफ़ से हूँ।"
असली मामा चौंके — "अरे, मैं ही तो दूल्हे का मामा हूँ! आप कौन?"
मंगलू का दिमाग़ तेज़ी से घूमा। उसने फ़ौरन बात बदली — "अरे नहीं नहीं, मेरा मतलब था कि मैं आपके ही मोहल्ले से हूँ, आपकी पहचान के एक सज्जन ने मुझे भी बुला लिया था।"
मामा को कुछ शक तो हुआ, पर उन्होंने ज़्यादा तूल न देते हुए बात टाल दी। मंगलू ने राहत की साँस ली और तीसरी बार मिठाई का दौर शुरू किया।
पर उसकी क़िस्मत आज ख़राब थी। उसी वक़्त सेठ खुद पंगत का जायज़ा लेने निकले। उन्होंने हर मेहमान से हाथ मिलाना और हालचाल पूछना शुरू किया। जब सेठ मंगलू के पास पहुँचे, तो पूछा — "आप किसके साथ आए हैं भाई?"
अब तक मंगलू तीन अलग-अलग कहानियाँ बता चुका था — कभी मामा की तरफ़ से, कभी फूफा के साले के रूप में, कभी मोहल्ले वाले के रूप में। घबराहट में उसने चौथी कहानी गढ़नी शुरू की — "जी, मैं तो बस यूँ ही..."
तभी बगल में बैठे बुज़ुर्ग और असली मामा दोनों एक साथ बोल पड़े — "अरे, यह तो अभी-अभी कह रहा था कि दुल्हन के फूफा का साला है, और उससे पहले कह रहा था कि दूल्हे का मामा है!"
पूरी पंगत में हलचल मच गई। आस-पास बैठे लोग हँसने लगे। सेठ ने मंगलू को ग़ौर से देखा और मुस्कुराते हुए कहा — "भाई साहब, आपने तो एक ही शाम में हमारे आधे परिवार से रिश्ता जोड़ लिया! सच बताइए, आप हैं कौन?"
मंगलू को कोई रास्ता नहीं सूझा। शर्म से उसका चेहरा लाल पड़ गया। आख़िर उसने सिर झुकाकर धीरे से कहा — "सेठजी, मैं... मैं तो बस खाने की ख़ुशबू खींच लाई मुझे यहाँ तक।"
यह सुनकर सेठ ज़ोर से हँस पड़े, और उनके साथ पूरी पंगत भी हँसने लगी। सेठ ने कहा — "कोई बात नहीं भाई, आज खुशी का दिन है, बैठकर पेट भर खाना खाओ। पर अगली बार सीधे दरवाज़े से आना, नक़ली रिश्ते जोड़ने की ज़रूरत नहीं।"
मंगलू शर्मिंदा तो बहुत हुआ, पर मन ही मन उसने ठान लिया कि अगली बार से किसी भी दावत में जाने से पहले कम-से-कम एक जैसी कहानी याद रखनी ज़रूरी है — वरना मुफ़्त की खिचड़ी खाना पड़ सकता है थोड़ा महँगा।
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