भाग 10: केवट प्रसंग, चित्रकूट निवास और महाराज दशरथ का प्राण-त्याग

अगली सुबह सूर्योदय होते ही श्रीराम, लक्ष्मण और सीता ने गंगा पार करने का निश्चय किया। निषादराज गुह ने एक नाव मंगवाई। परंतु नाव का मल्लाह (केवट) श्रीराम को अपनी नाव पर चढ़ाने से हिचकिचाने लगा।
केवट अत्यंत भोला और भगवान का अनन्य भक्त था। उसने हाथ जोड़कर श्रीराम से कहा, "प्रभु! मैंने सुना है कि आपके पैरों की धूल में कोई ऐसा जादू है जिससे पत्थर भी एक सुंदर स्त्री बन जाता है (अहिल्या का संदर्भ)। मेरी नाव तो काठ (लकड़ी) की है। यदि आपके चरण स्पर्श से मेरी नाव भी स्त्री बन गई, तो मेरा रोज़गार छिन जाएगा और मेरा परिवार भूखा मर जाएगा। इसलिए, जब तक मैं आपके चरण धोकर यह तसल्ली नहीं कर लेता कि उनमें कोई जादू नहीं है, मैं आपको नाव पर नहीं चढ़ने दूँगा।"
श्रीराम केवट की इस भोली और प्रेमपूर्ण बात पर मुस्कुरा दिए और उसे चरण धोने की अनुमति दे दी। केवट ने एक कठौती में गंगाजल भरकर अत्यंत श्रद्धा से श्रीराम के चरण धोए, और फिर उन्हें आदरपूर्वक नाव में बैठाकर गंगा के उस पार उतार दिया।
पार उतरने के बाद उतराई (किराया) देने के लिए श्रीराम के पास कुछ नहीं था। सीता जी ने अपने पति की संकोचपूर्ण स्थिति को समझा और अपनी उंगली से अपनी मुद्रिका (अंगूठी) निकालकर श्रीराम को दे दी। जब श्रीराम ने वह अंगूठी केवट को दी, तो केवट ने रोते हुए उनके चरण पकड़ लिए।
केवट ने कहा, "प्रभु! आज मैंने आपको इस नदी के पार उतारा है, जब मेरा अंत समय आए, तो आप मुझे भवसागर (संसार रूपी सागर) के पार उतार दीजिएगा। यही मेरी उतराई है। हम दोनों एक ही पेशे के हैं, मैं नदी पार कराता हूँ और आप जीवन पार कराते हैं, भला एक मल्लाह दूसरे मल्लाह से उतराई कैसे ले सकता है?" केवट की इस निस्वार्थ भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीराम ने उसे अमूल्य आशीर्वाद दिया और आगे बढ़ गए।
चलते-चलते वे प्रयाग पहुँचे, जहाँ गंगा और यमुना का संगम होता है। वहाँ उन्होंने महर्षि भरद्वाज के आश्रम में दर्शन किए। महर्षि भरद्वाज के मार्गदर्शन पर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण यमुना पार करके 'चित्रकूट' पर्वत की ओर चल दिए। चित्रकूट अत्यंत मनोरम, शांत और पवित्र स्थान था। मंदाकिनी नदी के तट पर लक्ष्मण ने बांस और पत्तों से एक अत्यंत सुंदर कुटिया (पर्णकुटी) का निर्माण किया। उस कुटिया में रहते हुए श्रीराम और सीता को वनवास का कोई दुख नहीं था, वे प्रकृति की गोद में अत्यंत शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे।
किंतु उधर अयोध्या में प्रलय आ चुकी थी। जब मंत्री सुमंत्र खाली रथ लेकर अयोध्या लौटे, तो रथ को देखकर पूरी नगरी में हाहाकार मच गया। सुमंत्र भारी कदमों से राजमहल पहुँचे। महाराज दशरथ की आंखें राम की राह देखते-देखते पथरा गई थीं। सुमंत्र को अकेला देखकर दशरथ समझ गए कि राम अब लौटकर नहीं आएंगे।
दशरथ का हृदय विदीर्ण हो गया। पुत्र-शोक (राम वियोग) की इस असहनीय पीड़ा में उन्हें अपने युवावस्था की एक भूल याद आ गई। उन्होंने रोते हुए माता कौशल्या को बताया, "कौशल्या! जवानी में जब मैं शब्दभेदी बाण चलाने का अभ्यास कर रहा था, तब मैंने अनजाने में नदी में पानी भर रहे एक युवा संन्यासी 'श्रवण कुमार' का वध कर दिया था। श्रवण अपने अंधे और बूढ़े माता-पिता का एकमात्र सहारा था। जब मैंने उन अंधे माता-पिता को उनके पुत्र की मृत्यु का समाचार दिया, तो उन्होंने तड़पते हुए मुझे श्राप दिया था— 'जिस प्रकार आज हम पुत्र-वियोग में तड़प-तड़प कर अपने प्राण त्याग रहे हैं, एक दिन तू भी ऐसे ही अपने प्रिय पुत्र के वियोग में तड़पकर मरेगा।' आज वह श्राप सत्य हो रहा है।"
राम का स्मरण करते हुए राजा दशरथ की पीड़ा बढ़ती गई। आधी रात के समय, "हा राम! हा लक्ष्मण! हा जानकी!" पुकारते हुए, चक्रवर्ती सम्राट दशरथ ने तड़पते हुए अपने प्राण त्याग दिए।
पूरे राजमहल में रुदन और चीत्कार मच गया। माता कौशल्या और सुमित्रा शोक में डूब गईं। चूंकि उस समय राम और लक्ष्मण वन में थे, और भरत तथा शत्रुघ्न अपने ननिहाल कैकेय देश में थे, इसलिए दशरथ का अंतिम संस्कार करने के लिए अयोध्या में कोई पुत्र उपस्थित नहीं था।
महर्षि वशिष्ठ ने शोक संतप्त अयोध्या को संभाला और राजा दशरथ के शरीर को एक विशेष तेल से भरे हुए विशाल कड़ाहे में सुरक्षित रखवा दिया, ताकि शरीर खराब न हो। इसके पश्चात, अत्यंत तीव्र गति वाले दूतों को तुरंत कैकेय देश भेजा गया, ताकि वे भरत को अविलंब अयोध्या ला सकें।
🏹 रामायण की और कहानियाँ
भाग 1: सरयू तट की अयोध्या और राजा दशरथ की व्यथा
सृष्टि के आरंभ में इक्ष्वाकु वंश की स्थापना हुई और सरयू तट पर अयोध्या नगरी बसी। चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के पास सब कुछ था, किंतु संतानहीनता की पीड़ा उन्हें अंदर से खोखला कर रही थी।
पढ़ें →भाग 2: पुत्रकामेष्टि यज्ञ, अग्निदेव का प्राकट्य और दिव्य पायस का वितरण
श्रृंगी ऋषि के नेतृत्व में पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न हुआ। यज्ञ कुंड से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए और स्वर्ण पात्र में पायस लेकर आए। राजा दशरथ ने वह दिव्य खीर तीनों रानियों में बांटी।
पढ़ें →भाग 3: श्री राम एवं भाइयों का जन्म, नामकरण और बाल्यकाल
चैत्र मास की नवमी तिथि को पांच ग्रहों के शुभ संयोग में महारानी कौशल्या ने श्री राम को जन्म दिया। इसके बाद भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी जन्म हुआ। महर्षि वशिष्ठ ने चारों बालकों का नामकरण किया।
पढ़ें →भाग 4: महर्षि विश्वामित्र का आगमन, ताड़का वध और यज्ञ रक्षा
महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आए और राम-लक्ष्मण को यज्ञ रक्षा के लिए मांगा। दशरथ के मोह के बाद वशिष्ठ ने समझाया। वन में राम ने ताड़का का वध किया और मारीच-सुबाहु को परास्त कर यज्ञ सम्पन्न करवाया।
पढ़ें →भाग 5: अहिल्या उद्धार, शिव धनुष भंग और सीता स्वयंवर
मार्ग में श्रीराम के चरण स्पर्श से अहिल्या का उद्धार हुआ। मिथिला में शिव धनुष भंग कर राम ने सीता स्वयंवर जीता। परशुराम के क्रोध को राम ने अपनी शांति और बल से शांत किया।
पढ़ें →भाग 6: अयोध्या से बारात का प्रस्थान, चारों भाइयों का विवाह और विदाई
राजा दशरथ विशाल बारात लेकर मिथिला पहुँचे। वेदमंत्रों के बीच चारों भाइयों का विवाह संपन्न हुआ — राम-सीता, लक्ष्मण-उर्मिला, भरत-मांडवी और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति।
पढ़ें →