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भाग 11: भरत का आगमन, चित्रकूट में 'भरत मिलाप' और चरण पादुका

महर्षि वाल्मीकि — रामायण7 मिनट का पठन
भाग 11: भरत का आगमन, चित्रकूट में 'भरत मिलाप' और चरण पादुका

तीव्र गति वाले दूत जब कैकेय देश पहुँचे, तो उन्होंने भरत को अयोध्या में हुए अनर्थ के बारे में कुछ नहीं बताया, केवल इतना कहा कि गुरु वशिष्ठ ने उन्हें तुरंत अयोध्या बुलाया है। भरत ने रात में कई बुरे सपने देखे थे, जिससे उनका मन पहले ही आशंकित था। वे शत्रुघ्न के साथ तुरंत अयोध्या के लिए निकल पड़े।

जब भरत अयोध्या पहुँचे, तो नगर का सन्नाटा देखकर उनका हृदय कांप गया। सड़कें सूनी थीं, बाज़ारों में रौनक नहीं थी और लोगों के चेहरों पर गहरी उदासी थी। भरत सीधे राजमहल गए और पिता को न पाकर अपनी माता कैकेयी के कक्ष में पहुँचे।

भरत ने व्यग्रता से पूछा, "माता! पिताजी कहाँ हैं? भ्राता राम, लक्ष्मण और भाभी सीता कहाँ हैं? नगर में ऐसा शोक क्यों छाया है?"

कैकेयी ने अत्यंत प्रसन्नता से कहा, "पुत्र! जो तुम्हारे लिए सबसे उत्तम था, वह मैंने कर दिया है। तुम्हारे पिता अब स्वर्ग सिधार चुके हैं। मैंने महाराज से अपने दो वरदान मांगकर तुम्हें अयोध्या का राजा बना दिया है और राम को चौदह वर्ष के लिए वन भेज दिया है।"

यह सुनते ही भरत पर मानो बिजली गिर पड़ी। पिता की मृत्यु और बड़े भाई के वनवास का कारण अपनी ही माता को जानकर उनका दुख भयंकर क्रोध में बदल गया। उन्होंने कैकेयी को धिक्कारते हुए कहा, "हे कुलघातिनी! तूने यह क्या अनर्थ कर दिया? तू मेरे पिता की हत्यारी है! राम तो तुझे अपनी माता से भी अधिक प्रेम करते थे। तूने यह कैसे सोच लिया कि राम के बिना मैं इस सिंहासन पर बैठूंगा? मैं आज ही तेरा त्याग करता हूँ!"

भरत रोते हुए माता कौशल्या के पास दौड़े और उनके चरणों में गिर पड़े। उन्होंने शपथ लेकर कहा कि इस षड्यंत्र में उनका कोई हाथ नहीं है। कौशल्या ने भरत को गले लगा लिया और कहा, "पुत्र! मैं जानती हूँ, राम के प्रति तुम्हारा प्रेम निश्छल है।"

गुरु वशिष्ठ के आदेश पर भरत ने भारी हृदय से महाराज दशरथ का अंतिम संस्कार संपन्न किया। जब मंत्रियों ने भरत से राजसिंहासन ग्रहण करने का आग्रह किया, तो भरत ने दृढ़ता से मना कर दिया। उन्होंने घोषणा की, "अयोध्या के राजा केवल श्रीराम हैं। मैं स्वयं वन जाकर उनके चरण पकड़कर उन्हें वापस लाऊँगा। यदि वे नहीं माने, तो मैं भी उनके साथ वन में ही रहूँगा।"

अगले ही दिन भरत ने मुनियों के समान वल्कल वस्त्र धारण किए। शत्रुघ्न, तीनों माताएं, गुरु वशिष्ठ और अयोध्या की भारी प्रजा तथा सेना के साथ भरत चित्रकूट की ओर निकल पड़े।

मार्ग में श्रृंगवेरपुर पहुँचने पर जब निषादराज गुह ने इतनी बड़ी सेना देखी, तो उन्हें लगा कि भरत श्रीराम पर आक्रमण करने जा रहे हैं। परंतु जब उन्होंने भरत को तपस्वी वेश में नंगे पैर, राम के वियोग में रोते हुए देखा, तो निषादराज का संदेह दूर हो गया और उन्होंने भरत को राम तक पहुँचने का मार्ग बताया।

जब भरत और शत्रुघ्न चित्रकूट पहुँचे, तो लक्ष्मण ने दूर से अयोध्या की सेना की धूल उड़ती देखी। लक्ष्मण को भी भरत की नीयत पर शक हुआ और वे क्रोधित होकर धनुष-बाण उठाने लगे। परंतु श्रीराम ने उन्हें शांत किया और कहा, "लक्ष्मण! भरत त्रिलोकी का राज्य पाकर भी कभी धर्म के मार्ग से नहीं भटक सकता।"

कुछ ही देर बाद, भरत दौड़ते हुए आए और "त्राहिमाम, त्राहिमाम" (मेरी रक्षा करें) कहते हुए श्रीराम के चरणों में गिर पड़े। श्रीराम ने उन्हें उठाकर छाती से लगा लिया। यह 'भरत मिलाप' इतना मार्मिक था कि वहां उपस्थित पशु-पक्षी भी रोने लगे। भरत ने जब पिता दशरथ के स्वर्गवास का समाचार दिया, तो श्रीराम और लक्ष्मण फूट-फूट कर रो पड़े।

अगले दिन सभा जुड़ी। भरत ने श्रीराम से हाथ जोड़कर प्रार्थना की, "भैया! अयोध्या अनाथ हो गई है। आप बड़े हैं, राज्य आपका है। माता की भूल को क्षमा करें और अयोध्या लौट चलें।" माता कैकेयी ने भी अपने कृत्य पर पश्चाताप किया और राम से लौटने की विनती की।

परंतु श्रीराम अपने निश्चय पर अडिग थे। उन्होंने समझाया, "भरत! पिताजी ने जो वचन दिया था, उसे निभाना हमारा धर्म है। मैं चौदह वर्ष का वनवास पूरा किए बिना अयोध्या वापस नहीं लौट सकता।"

भरत किसी भी तरह लौटने को तैयार नहीं थे। अंततः गुरु वशिष्ठ के समझाने पर एक बीच का मार्ग निकाला गया। भरत ने कहा, "ठीक है प्रभु! मैं चौदह वर्ष तक आपके प्रतिनिधि के रूप में राज्य संभालूंगा। लेकिन मुझे अपनी 'चरण पादुकाएं' (लकड़ी की खड़ाऊं) दे दीजिए। ये पादुकाएं ही अयोध्या के सिंहासन पर बैठेंगी। और सुन लीजिए, यदि चौदह वर्ष पूरे होने के अगले ही दिन आप अयोध्या नहीं लौटे, तो मैं अग्नि में प्रवेश करके अपने प्राण दे दूंगा।"

श्रीराम ने भरत को अपनी पादुकाएं सौंप दीं। भरत ने उन पादुकाओं को अपने सिर पर रखा और भारी मन से अयोध्या लौट आए।

भरत ने राजमहल में प्रवेश नहीं किया। वे अयोध्या के बाहर 'नंदीग्राम' नामक स्थान पर एक कुटिया बनाकर रहने लगे। उन्होंने राजसी सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया, ज़मीन पर सोते और जटाएं बढ़ाकर एक तपस्वी का जीवन जीते हुए, श्रीराम की पादुकाओं की आज्ञा से अयोध्या का राजकाज चलाने लगे।

उधर चित्रकूट में, अयोध्या वासियों के आने-जाने और पिता की स्मृतियों के कारण श्रीराम का मन उचट गया। उन्होंने सोचा कि अब यहाँ रहना उचित नहीं है। इसलिए श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने चित्रकूट छोड़ दिया और महर्षि अत्रि तथा माता अनुसूया का आशीर्वाद लेते हुए, दक्षिण की ओर दंडकारण्य (दंडक वन) के और अधिक घने तथा भयंकर जंगलों में प्रवेश कर गए।

🎉 कहानी समाप्त

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