कुएं की शादी का निमंत्रण — बेतुकी मांग का बेतुका जवाब

विजयनगर साम्राज्य की समृद्धि से आस-पास के कई छोटे राजा जलते थे। वे अक्सर महाराज कृष्णदेवराय का मज़ाक उड़ाने या उन्हें नीचा दिखाने के लिए अजीबोगरीब चालें चलते रहते थे।
एक बार पड़ोसी राज्य के एक बहुत ही ईर्ष्यालु और घमंडी राजा ने महाराज कृष्णदेवराय को एक शाही दूत के हाथों एक पत्र भेजा। पत्र के साथ कुछ मिठाइयां और महंगे उपहार भी थे।
महाराज ने जब वह पत्र पढ़ा, तो उनका माथा ठनक गया। उस पत्र में लिखा था: "महाराजा कृष्णदेवराय जी! आपको यह जानकर अति प्रसन्नता होगी कि आगामी पूर्णिमा के दिन हमारे राज्य के सबसे बड़े और पुराने 'शाही कुएं' की शादी तय हुई है। चूँकि हमारे राज्य के संबंध बहुत अच्छे हैं, इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप विजयनगर के सभी 'शाही कुओं' को बारात में शामिल होने के लिए हमारे राज्य भेज दें। हमें आपके कुओं का इंतज़ार रहेगा!"
महाराज की उलझन: पूरे दरबार में यह बात फैल गई। सब लोग इस निमंत्रण को सुनकर हैरान और क्रोधित थे। यह साफ तौर पर विजयनगर का अपमान था।
महाराज ने गुस्से से कहा, "यह कैसा बेवकूफाना मज़ाक है? कोई कुआँ कैसे शादी कर सकता है? और उससे भी बड़ी बात, हम अपने कुओं को उखाड़कर बारात में कैसे भेज सकते हैं? यदि हम कुएं नहीं भेजेंगे, तो वह घमंडी राजा पूरे जंबूद्वीप में यह ढिंढोरा पीटेगा कि विजयनगर ने उसके निमंत्रण का अपमान किया है।"
सभी दरबारी इस उलझन में थे कि इस मूर्खतापूर्ण पत्र का क्या जवाब दिया जाए। तब तेनालीरामा आगे आए और बोले, "महाराज! आप शांत रहें। मूर्खता का जवाब समझदारी से नहीं, बल्कि उससे भी बड़ी मूर्खता से ही दिया जा सकता है। आप इस निमंत्रण का जवाब लिखने का काम मुझ पर छोड़ दें।"
तेनालीरामा का पलटवार (जवाबी निमंत्रण): तेनालीरामा ने एक शाही पत्र तैयार किया और विजयनगर के दूत को देकर उस पड़ोसी राजा के पास भेज दिया।
जब घमंडी राजा ने विजयनगर का वह पत्र पढ़ा, तो उसके पसीने छूट गए। तेनालीरामा ने पत्र में लिखा था: "मित्र नरेश! आपके 'शाही कुएं' की शादी का निमंत्रण पाकर विजयनगर अत्यंत हर्षित है। हमारे सभी शाही कुओं ने बारात में आने का निमंत्रण सहर्ष स्वीकार कर लिया है।
परंतु, एक छोटी सी समस्या है। हमारे विजयनगर के कुएं बहुत ही संस्कारी और पुराने ख्यालात के हैं। उन्होंने आज तक कभी अकेले राज्य की सीमा पार नहीं की है। वे थोड़े शर्मीले भी हैं। इसलिए, हमारी आपसे विनती है कि आप अपने राज्य के कुछ बड़े और समझदार कुओं को यहाँ विजयनगर भेज दें, ताकि वे हमारे शर्मीले कुओं का मार्गदर्शन कर सकें और उन्हें ससम्मान अगवा कर बारात तक ले जा सकें! जैसे ही आपके कुएं यहाँ पहुँचेंगे, हमारे कुएं उनके साथ पीछे-पीछे बारात में आ जाएंगे।"
घमंडी राजा की हार: यह पत्र पढ़ते ही उस ईर्ष्यालु राजा को अपनी मूर्खता का एहसास हो गया। वह समझ गया कि विजयनगर के दरबार में ऐसा वज़ीर मौजूद है जो शब्दों के बाण से किसी भी चाल को पलटना जानता है।
कुएं भेजना तो दूर की बात थी, वह राजा अपनी बेइज़्ज़ती से इतना शर्मिंदा हुआ कि उसने तुरंत महाराज कृष्णदेवराय को एक क्षमा-पत्र भेजा और भविष्य में कभी ऐसी बेतुकी हरकत न करने का वचन दिया। तेनालीरामा की हाज़िरजवाबी ने एक बार फिर बिना किसी युद्ध के विजयनगर का सम्मान बचा लिया।
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