मौत की सज़ा और जादुई गड्ढा — तेनालीरामा की चतुराई

एक बार किसी गंभीर राजनीतिक मुद्दे पर चर्चा करते समय, तेनालीरामा ने महाराज कृष्णदेवराय के सामने कोई ऐसी बात कह दी जो महाराज के अहंकार को बुरी तरह चुभ गई। महाराज उस दिन बहुत गुस्से में थे। उन्होंने बिना सोचे-समझे तेनालीरामा को एक भयंकर सज़ा सुना दी।
महाराज ने अपने सैनिकों को आदेश दिया: "इस गुस्ताख तेनालीरामा को शहर के बाहर ले जाओ और ज़मीन में एक गहरा गड्ढा खोदकर इसे गर्दन तक मिट्टी में गाड़ दो! इसे पूरी रात वहीं गड़ा रहने दो। कल सुबह एक पागल हाथी को इसके सिर पर चढ़ाकर इसे कुचल दिया जाएगा!"
सैनिकों ने महाराज के आदेश का पालन किया। वे तेनालीरामा को एक सुनसान मैदान में ले गए, गड्ढा खोदा और उन्हें गर्दन तक मिट्टी में गाड़कर वहाँ से चले गए। तेनालीरामा का केवल सिर ज़मीन के बाहर था।
कुबड़े धोबी का आगमन: रात का समय था। तेनालीरामा सोच रहे थे कि इस मुसीबत से कैसे निकला जाए। तभी उन्होंने देखा कि उस रास्ते से एक धोबी भारी गठरी लेकर गुज़र रहा है। उस धोबी की पीठ पर एक बहुत बड़ा 'कुबड़' (Hunchback) निकला हुआ था, जिसकी वजह से वह सीधा खड़ा नहीं हो पाता था।
धोबी ने जब ज़मीन से केवल एक सिर बाहर निकला हुआ देखा, तो वह डर गया। उसने पास आकर पूछा: "अरे भाई! तुम कौन हो? और इस कड़ाके की ठंड में ज़मीन के अंदर गर्दन तक क्यों गड़े हुए हो?"
तेनालीरामा का मास्टरस्ट्रोक: तेनालीरामा के दिमाग की बत्ती जल गई। उन्होंने अत्यंत शांत और सुखद आवाज़ में कहा: "अरे भाई! मैं विजयनगर का एक बहुत बड़ा वैद्य हूँ। मुझे पीठ और रीढ़ की हड्डी की एक बहुत गंभीर बीमारी थी, जिससे मेरी पीठ टेढ़ी हो गई थी। दुनिया के सबसे महान वैद्यों ने मुझे यह 'जादुई मिट्टी का इलाज' बताया है। उन्होंने कहा है कि जो भी व्यक्ति रात भर इस गड्ढे में सीधा खड़ा रहेगा, सुबह तक उसकी रीढ़ की हड्डी और उसका कुबड़ बिल्कुल सीधा हो जाएगा!"
तेनालीरामा ने धोबी के कुबड़ की ओर देखकर कहा: "देखो! मेरी पीठ तो अब बिल्कुल सीधी हो गई है, मैं बस सुबह होने का इंतज़ार कर रहा हूँ।"
धोबी का लालच और सौदेबाज़ी: अपनी पीठ का कुबड़ ठीक होने की बात सुनकर धोबी खुशी से पागल हो गया। उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा: "वैद्य जी! मेरी पीठ के कुबड़ के कारण मुझे बहुत ताने सुनने पड़ते हैं। क्या आप कुछ देर के लिए मुझे इस जादुई गड्ढे में खड़ा होने देंगे? मैं आपको बहुत सारे पैसे दूँगा।"
तेनालीरामा ने झिझकने का नाटक करते हुए कहा: "नहीं भाई, यह मेरा गड्ढा है। परंतु... तुम्हारी हालत देखकर मुझे दया आ रही है। जल्दी से मिट्टी हटाकर मुझे बाहर निकालो और तुम अंदर घुस जाओ।"
धोबी ने तुरंत मिट्टी खोदी, तेनालीरामा को बाहर निकाला और खुद गड्ढे में गर्दन तक गड़ कर खड़ा हो गया! तेनालीरामा ने मिट्टी अच्छी तरह से दबा दी, धोबी के कपड़े पहने, उसकी कपड़ों की गठरी उठाई और आराम से अपने घर जाकर सो गए।
सुबह का नज़ारा और राजा की हैरानी: अगली सुबह, महाराज कृष्णदेवराय अपने सेनापतियों और एक विशाल हाथी के साथ उस मैदान में पहुँचे। महाराज को लग रहा था कि तेनालीरामा मौत के डर से रो रहा होगा।
परंतु जब महाराज ने गड्ढे के पास आकर देखा, तो वहाँ तेनालीरामा की जगह एक अनजान आदमी (धोबी) मजे से आँखें बंद किए खड़ा था।
महाराज ने हैरानी से पूछा: "तुम कौन हो? और तेनालीरामा कहाँ गया?"
धोबी ने आँखें खोलीं और राजा को देखकर घबरा गया। उसने कांपते हुए कहा: "महाराज! मैं तो एक धोबी हूँ। मेरी पीठ का कुबड़ ठीक करने के लिए एक वैद्य जी मुझे अपना यह गड्ढा बेचकर चले गए!"
महाराज को सारी बात समझते देर नहीं लगी। उनका सारा गुस्सा पल भर में हवा हो गया और वे ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाकर हंसने लगे। तेनालीरामा मौत के मुंह से भी अपनी अक्ल के बल पर वापस लौट आए थे।
तभी दूर से तेनालीरामा मुस्कुराते हुए आते दिखाई दिए। महाराज ने दौड़कर तेनालीरामा को गले लगा लिया और कहा: "तेनाली! सचमुच इस पूरी दुनिया में मौत भी तुम्हारी चतुराई को मात नहीं दे सकती। मैंने तुम्हें माफ किया!
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