मोम का शेर — लोहे का पिंजरा और एक पिघलता हुआ कूटनीतिक रहस्य

मुग़ल सल्तनत की शक्ति और शहंशाह अकबर के नवरत्नों की बुद्धिमत्ता के चर्चे समंदर पार तक फैले हुए थे। कई विदेशी सुल्तान अक्सर अकबर के दरबार में ऐसी चुनौतियां भेजते थे, जिनसे वे मुग़ल सल्तनत की अक्ल और ताक़त का अंदाज़ा लगा सकें।
एक सुबह, रोम के एक शक्तिशाली सम्राट का दूत आगरा के दीवान-ए-खास में पहुँचा। उसके साथ उसके कई हट्टे-कट्टे सैनिक थे, जो एक बहुत भारी और विशाल 'लोहे का पिंजरा' उठा कर लाए थे। पिंजरे पर एक बड़ा सा ताला लगा हुआ था।
दूत ने शहंशाह को सलाम किया और पिंजरे पर पड़ा कपड़ा हटा दिया। कपड़ा हटते ही पूरे दरबार में खौफ की लहर दौड़ गई। उस मजबूत लोहे के पिंजरे के भीतर एक अत्यंत भयानक और विशालकाय शेर बैठा हुआ था। उसकी आंखें खूंखार थीं और उसके बाल बिल्कुल असली लग रहे थे।
दूत की असंभव चुनौती: दूत ने सीना तानकर शहंशाह से कहा: "जहाँपनाह! हमारे महान सम्राट ने आपके दरबार की बुद्धिमत्ता को परखने के लिए यह तोहफा भेजा है। चुनौती यह है कि आपको इस शेर को इस पिंजरे से 'बाहर' निकालना है! परंतु हमारी दो अत्यंत कड़ी शर्तें हैं—"
दूत ने पूरे दरबार की ओर घूरते हुए कहा: "पहली शर्त: आप इस पिंजरे का ताला नहीं खोल सकते और न ही पिंजरे की लोहे की सलाखों को तोड़ या मोड़ सकते हैं। दूसरी शर्त: शेर को बाहर निकालते समय शेर को किसी प्रकार की चोट नहीं लगनी चाहिए, यानी आप उसे काट या तोड़ कर बाहर नहीं निकाल सकते!"
दरबारियों की घबराहट: शर्तें सुनकर दरबार में सन्नाटा छा गया। भला किसी बंद पिंजरे से, बिना ताला खोले और बिना पिंजरा तोड़े, एक इतने बड़े शेर को साबुत बाहर कैसे निकाला जा सकता है? यह तो जादू या किसी चमत्कार से ही संभव था।
अकबर ने अपने विद्वान दरबारियों की ओर देखा। मुल्ला दो प्याज़ा ने कहा, "हुज़ूर! यह तो सरासर बेवकूफी है। यह भौतिक विज्ञान के नियमों के खिलाफ है। एक ठोस चीज़, बिना दरवाज़ा खोले बाहर कैसे आ सकती है? विदेशी दूत हमारा मज़ाक उड़ा रहा है।" राजा टोडरमल और अन्य वज़ीरों ने भी हार मान ली। विदेशी दूत मुस्कुराने लगा कि आज उसने मुग़ल सल्तनत को हरा दिया है।
अकबर का माथा ठनक गया। उन्होंने तुरंत अपनी आखिरी उम्मीद की ओर देखा— "बीरबल! क्या तुम इस रोम के दूत की चुनौती का सामना कर सकते हो?"
बीरबल का सूक्ष्म अवलोकन: बीरबल अपनी जगह से उठे। वे बिल्कुल शांत थे। उन्होंने जाकर उस पिंजरे के चारों ओर चक्कर लगाया। शेर बिल्कुल असली लग रहा था, परंतु बीरबल की पारखी नज़रों ने कुछ ऐसा देख लिया जो किसी और ने नहीं देखा था।
बीरबल ने गौर किया कि शेर की आंखें बिल्कुल स्थिर थीं, उसके पेट में सांसों का कोई उतार-चढ़ाव नहीं था, और इतने शोर-शराबे में भी वह शेर बिल्कुल बेजान मूर्ति की तरह बैठा था। बीरबल समझ गए कि यह कोई असली शेर नहीं, बल्कि रोम के महान कारीगरों द्वारा 'मोम' से बनाया गया एक अत्यंत सजीव दिखने वाला 'मोम का शेर' है!
बीरबल ने मुस्कुराते हुए अकबर से कहा, "जहाँपनाह! यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। मैं अभी इस शेर को बिना ताला खोले पिंजरे से आज़ाद कर देता हूँ।"
पिघलता हुआ रहस्य: बीरबल ने तुरंत शाही पहरेदारों को आदेश दिया: "जाओ! और आग में तपाकर दो 'लोहे की लंबी सलाखें' लेकर आओ, जो बिल्कुल आग की तरह लाल और गर्म हों!"
पूरा दरबार हैरान था कि बीरबल गर्म लोहे की छड़ों से क्या करने वाले हैं। कुछ ही देर में सैनिक दो धधकती हुई लोहे की छड़ें ले आए।
बीरबल ने एक गर्म छड़ को पिंजरे की सलाखों के बीच से अंदर डाला और उसे सीधे उस खूंखार दिखने वाले 'शेर' के सिर पर छुआ दिया।
जैसे ही वह लाल-गर्म लोहा शेर के सिर से टकराया, दूत के चेहरे का रंग उड़ गया। लोहे की भयंकर गर्मी से वह 'मोम का शेर' तेज़ी से पिघलने लगा। मोम पिघल-पिघल कर तरल रूप में बदलने लगा और पिंजरे के फर्श से होता हुआ, लोहे की सलाखों के नीचे से बहकर दरबार के फर्श पर आ गिरा।
कुछ ही पलों में, वह पूरा का पूरा खूंखार शेर पिघलकर एक तरल पदार्थ में बदल गया और पिंजरे की सलाखों के बीच से बहकर पूरी तरह 'बाहर' आ गया! खाली पिंजरा अब भी बंद था और उसका ताला अपनी जगह पर जड़ा हुआ था।
बीरबल का तर्क और दूत की हार: बीरबल ने दूत की ओर मुड़कर अत्यंत गर्व से कहा: "दूत महोदय! देखिए, मैंने आपके सम्राट की दोनों शर्तें पूरी कर दीं। मैंने न तो पिंजरे का ताला खोला, न पिंजरा तोड़ा, और न ही इस 'मोम के शेर' को कोई चोट पहुँचाई (काटा या तोड़ा)। शेर पिघलकर अपने आप बाहर आ गया है!"
दूत हक्का-बक्का रह गया। उसे यकीन नहीं हुआ कि बीरबल ने इतनी जल्दी उस मोम के शेर की हकीकत को पहचान लिया और इतनी चतुराई से उसे बाहर भी निकाल दिया। उसने अपना सिर झुका लिया और कहा, "जहाँपनाह! आपके वज़ीर की अक्ल के आगे रोम के कारीगरों की कला हार गई। मैं अपनी पराजय स्वीकार करता हूँ।"
शहंशाह अकबर खुशी से अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए। पूरा दीवान-ए-खास तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अकबर ने बीरबल को गले लगाया और अपना कीमती जड़ाऊ हार इनाम में दिया।
(यह कहानी सिखाती है कि समस्या जितनी भी बड़ी या असंभव लगे, यदि उसे ध्यान से देखा जाए, तो उसका हल अक्सर उसी समस्या के भीतर छिपा होता है।
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