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मुल्ला नसरुद्दीन और काज़ी का फैसला

लोक परंपरा — मुल्ला नसरुद्दीन6 मिनट का पठन
मुल्ला नसरुद्दीन और काज़ी का फैसला

एक समय की बात है, मुल्ला नसरुद्दीन को गाँव का 'काज़ी' (न्यायाधीश) बना दिया गया था। लोग अपने झगड़े लेकर उनके पास आते थे और मुल्ला अपने अजीब लेकिन बिल्कुल सटीक तर्कों से उनका फैसला करते थे।

एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन की अदालत में एक बहुत ही अजीबोगरीब मुक़दमा आया।

गाँव का एक बहुत ही अमीर और लालची 'होटल का मालिक' (भोजनालय चलाने वाला) एक गरीब और फटेहाल मज़दूर की कॉलर पकड़कर उसे अदालत में खींचता हुआ लाया।

होटल मालिक ने गुस्से में कहा: "काज़ी साहब! यह गरीब आदमी एक नंबर का चोर और बेईमान है! इसे कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए और मुझे मेरा पैसा मिलना चाहिए।"

मुल्ला नसरुद्दीन ने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए पूछा, "शांत हो जाओ भाई। बताओ, इस गरीब आदमी ने तुम्हारा क्या चुराया है? क्या इसने तुम्हारे होटल से खाना चुराया है?"

होटल मालिक ने कहा: "नहीं काज़ी साहब! इसने खाना नहीं चुराया। आज दोपहर को मैं अपने होटल के बाहर बड़े से पतीले में 'मुर्ग का कोरमा' बना रहा था। कोरमे में से बहुत ही शानदार और लज़ीज़ खुशबू उठ रही थी। तभी यह गरीब आदमी वहाँ आया। इसके हाथ में अपनी घर की सूखी रोटियाँ थीं।"

होटल मालिक ने गरीब आदमी की तरफ घूरते हुए आगे कहा: "काज़ी साहब! इस आदमी ने क्या किया कि यह मेरे कोरमे के पतीले के बिल्कुल पास खड़ा हो गया। जैसे-जैसे कोरमे की 'खुशबू' हवा में उड़कर आती, यह अपनी सूखी रोटी का एक टुकड़ा तोड़ता, उस खुशबू को सूँघता और फिर उस रोटी को मज़े से खा लेता! इस तरह इसने मेरे कोरमे की 'खुशबू' के साथ अपनी सारी सूखी रोटियाँ खा लीं। जब मैंने इससे अपनी खुशबू के पैसे माँगे, तो यह मना कर रहा है!"

पूरी अदालत इस बेतुके मुक़दमे को सुनकर हैरान रह गई। क्या कोई खाने की 'खुशबू' के पैसे भी माँग सकता है?

मुल्ला नसरुद्दीन ने उस गरीब मज़दूर से पूछा, "क्या यह सच है जो होटल मालिक कह रहा है?" मज़दूर ने रोते हुए हाथ जोड़कर कहा, "जी काज़ी साहब! मैं बहुत गरीब हूँ। मेरे पास गोश्त खरीदने के पैसे नहीं थे। जब कोरमे की खुशबू आई, तो मैंने बस हवा में सूँघकर अपनी सूखी रोटी खा ली। लेकिन मैंने इसके कोरमे को हाथ तक नहीं लगाया। मैं इसके पैसे कहाँ से दूँ?"

होटल मालिक अड़ गया। "काज़ी साहब! खुशबू भी तो मेरे ही कोरमे की थी! इसने बिना पैसे दिए मेरी खुशबू का मज़ा लिया है। मुझे न्याय चाहिए!"

मुल्ला नसरुद्दीन ने बहुत ही गंभीरता से अपना सिर हिलाया। "हम्म... बात तो तुम्हारी बिल्कुल सही है। न्याय तो होना ही चाहिए। तुमने जो कोरमा बनाया, उसकी खुशबू का मज़ा इस आदमी ने लिया है, तो कीमत तो इसे चुकानी ही पड़ेगी।"

यह सुनते ही गरीब मज़दूर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई और होटल मालिक के चेहरे पर लालची मुस्कान आ गई।

मुल्ला नसरुद्दीन ने गरीब मज़दूर से कहा, "तुम्हारी जेब में जो कुछ भी है, वह मुझे दे दो।" मज़दूर ने रोते हुए अपनी जेब से कुछ 'ताँबे के सिक्के' निकाले और मुल्ला के हाथ में रख दिए।

मुल्ला नसरुद्दीन ने उन सिक्कों को अपनी मुट्ठी में बंद किया। फिर मुल्ला होटल मालिक के बिल्कुल पास गए।

मुल्ला ने अपनी मुट्ठी को होटल मालिक के 'कानों' के बिल्कुल पास रखा और मुट्ठी को ज़ोर-ज़ोर से हिलाना शुरू किया।

सिक्कों के आपस में टकराने की तेज़ आवाज़ आने लगी— 'छन-छन! खन-खन-खन!'

मुल्ला ने सिक्कों को खूब ज़ोर से खनकाया और फिर होटल मालिक से पूछा, "क्या तुमने यह आवाज़ सुनी?" होटल मालिक ने खुशी-खुशी कहा, "जी काज़ी साहब! मैंने सिक्कों की खनक बहुत अच्छे से सुनी है।"

मुल्ला नसरुद्दीन ने वे सारे सिक्के वापस उस गरीब मज़दूर को लौटा दिए और होटल मालिक की आँखों में आँखें डालकर बहुत ही ज़ोरदार आवाज़ में अपना 'ऐतिहासिक फैसला' सुनाया:

"तो फिर ठीक है! मुक़दमा खत्म हुआ और हिसाब बराबर हो गया!"

होटल मालिक हैरान रह गया। "हिसाब बराबर? लेकिन मुझे मेरे पैसे तो मिले ही नहीं!"

मुल्ला नसरुद्दीन ने मुस्कुराते हुए कहा: "अरे बेवकूफ़! जब इस गरीब आदमी ने तुम्हारे कोरमे को खाया नहीं, सिर्फ उसकी 'खुशबू' सूँघी थी... तो फिर तुम भी इन सिक्कों को ले नहीं सकते, तुम सिर्फ इन सिक्कों की 'खनक (आवाज़)' सुन सकते हो! खाने की खुशबू की कीमत, सिक्कों की आवाज़ से चुका दी गई है! अब यहाँ से दफा हो जाओ, वरना तुम्हें झूठे मुक़दमे के लिए जेल में डाल दूँगा!"

होटल मालिक का सिर शर्म और बेइज़्ज़ती से झुक गया। पूरी अदालत मुल्ला नसरुद्दीन के इस अद्भुत, तार्किक और हास्यपूर्ण न्याय पर तालियाँ बजाने लगी और ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी।

🎉 कहानी समाप्त

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