मुल्ला नसरुद्दीन और डूबता हुआ आदमी

मुल्ला नसरुद्दीन के गाँव में एक 'सेठ जी' रहते थे, जो अपनी कंजूसी के लिए पूरे राज्य में मशहूर थे। वे इतने कंजूस थे कि अगर उनके हाथ से एक सिक्का गिर जाता, तो वे उसे ढूँढने के लिए पूरे घर की मिट्टी खोद डालते थे। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी किसी गरीब को एक पैसा 'दान' नहीं दिया था। उनका मूलमंत्र सिर्फ एक था— दुनिया से जो मिले उसे 'ले लो', लेकिन अपनी जेब से किसी को कुछ 'दो मत'!
एक दिन बरसात के मौसम में सेठ जी गाँव के बाहर एक गहरी और उफनती हुई नदी के किनारे से गुज़र रहे थे। अचानक कीचड़ में उनका पैर फिसला और वे सीधे नदी के तेज़ बहाव में जा गिरे— 'छपाक्!'
सेठ जी को तैरना नहीं आता था। वे पानी में डूबने और गोते खाने लगे। "बचाओ! बचाओ! मैं डूब रहा हूँ!" सेठ जी ने पानी के अंदर से चिल्लाते हुए हाथ-पैर मारे।
आस-पास खेत में काम कर रहे कुछ गाँव वाले उनकी आवाज़ सुनकर नदी किनारे दौड़ कर आए। एक आदमी ने नदी के किनारे ज़मीन पर लेटकर अपना हाथ सेठ जी की तरफ बढ़ाया और ज़ोर से चिल्लाया: "सेठ जी! अपना हाथ दो! जल्दी करो, मुझे अपना हाथ दो!"
लेकिन सेठ जी का दिमाग तो 'कंजूसी' के साँचे में ढला हुआ था। पानी में डूबते हुए और मौत के मुँह में होने के बावजूद, जैसे ही उन्होंने "अपना हाथ दो" शब्द सुना, उनके अवचेतन मन (Subconscious mind) ने उन्हें कुछ भी 'देने' से रोक दिया।
सेठ जी ने अपना हाथ उस आदमी की तरफ नहीं बढ़ाया। वे फिर से पानी के अंदर चले गए।
एक दूसरे आदमी ने एक लकड़ी आगे बढ़ाई और चिल्लाया, "सेठ जी! यह लकड़ी पकड़ो! अपना हाथ मुझे दो!" लेकिन सेठ जी ने फिर से अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया। पानी उनके गले तक आ गया था और वे बस डूबने ही वाले थे।
तभी वहाँ से 'मुल्ला नसरुद्दीन' अपने गधे पर बैठकर गुज़र रहे थे। उन्होंने देखा कि गाँव वाले एक आदमी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वह आदमी अपना हाथ आगे नहीं बढ़ा रहा है।
मुल्ला तुरंत गधे से उतरे और भीड़ के पास पहुँचे। गाँव वालों ने परेशान होकर मुल्ला से कहा, "मुल्ला जी! यह सेठ पागल हो गया है। यह डूब रहा है, हम चिल्ला रहे हैं कि 'अपना हाथ दो', लेकिन यह अपना हाथ हमें दे ही नहीं रहा है!"
मुल्ला नसरुद्दीन ने डूबते हुए सेठ को देखा और मुल्ला के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई।
मुल्ला ने गाँव वालों से कहा, "अरे बेवकूफ़ो! तुम लोग इस इंसान की 'बीमारी' को नहीं समझते। यह शहर का सबसे बड़ा कंजूस है। इसने अपनी पूरी ज़िंदगी में किसी को एक पाई तक नहीं 'दी' है। इसके दिमाग को 'देना' शब्द समझ ही नहीं आता। जब तुम इससे कहते हो कि 'अपना हाथ दो', तो इसका कंजूस दिमाग सोचता है कि यह कुछ गँवा रहा है, इसलिए यह हाथ नहीं बढ़ा रहा।"
गाँव वालों ने पूछा, "तो फिर इसे कैसे बचाएँ? यह तो मर जाएगा!"
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, "पीछे हटो! एक कंजूस से कैसे बात करनी है, यह मैं तुम्हें सिखाता हूँ।"
मुल्ला नसरुद्दीन नदी के किनारे पर बैठे। उन्होंने अपना लंबा हाथ पानी की तरफ, बिल्कुल सेठ जी के चेहरे के पास बढ़ाया।
लेकिन मुल्ला ने यह नहीं कहा कि "अपना हाथ दो।" इसके बजाय, मुल्ला ने बहुत ही ज़ोर से और स्पष्ट आवाज़ में चिल्लाकर कहा:
"सेठ जी! लो... मेरा हाथ ले लो!"
'ले लो' शब्द सुनते ही चमत्कार हो गया! डूबते हुए कंजूस सेठ के कानों में जैसे ही यह आवाज़ पड़ी कि उसे कुछ 'मिल रहा है', उसने बिना एक सेकंड सोचे, पानी के अंदर से बिजली की फुर्ती से अपना हाथ बाहर निकाला और मुल्ला नसरुद्दीन का हाथ कसकर पकड़ लिया!
मुल्ला नसरुद्दीन ने ज़ोर लगाकर सेठ जी को नदी से बाहर खींच लिया और उनकी जान बच गई।
सेठ जी ज़मीन पर पड़े खाँस रहे थे और पानी उगल रहे थे।
मुल्ला नसरुद्दीन ने हैरान खड़े गाँव वालों की तरफ देखा और अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए हँसकर बोले: "देखा तुम लोगों ने? एक कंजूस इंसान मौत के मुँह में जा सकता है, लेकिन किसी को अपना हाथ 'दे' नहीं सकता। उसे बचाने का सिर्फ एक ही तरीका था— उसे यह महसूस कराना कि उसे मुफ्त में किसी का हाथ 'मिल रहा है'!"
पूरी भीड़ मुल्ला नसरुद्दीन की इस अद्भुत मनोवैज्ञानिक समझ और कंजूसी पर उनके इस ज़बरदस्त व्यंग्य पर ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाकर हँसने लगी, और सेठ जी शर्म के मारे सिर झुकाए बैठे रहे।
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