मुल्ला नसरुद्दीन और कपड़ों की दावत

(नोट: यह किस्सा दुनिया भर के लोक-साहित्य में इतना मशहूर हुआ कि बाद में इसे अलग-अलग देशों में वहाँ के पात्रों के साथ जोड़ा गया, लेकिन इसकी असल शुरुआत मुल्ला नसरुद्दीन के तुर्की/ईरानी किस्सों से ही मानी जाती है।)
एक बार शहर के सबसे अमीर और रसूखदार व्यापारी, 'अमीर-ए-शहर' ने अपने महल में एक बहुत ही भव्य दावत का आयोजन किया। शहर के सभी बड़े लोगों और मुल्ला नसरुद्दीन को भी न्योता भेजा गया।
दावत वाले दिन मुल्ला नसरुद्दीन अपने खेत में काम कर रहे थे। काम करते-करते शाम हो गई। मुल्ला ने सोचा कि अगर वे पहले घर जाकर नहाएँगे और कपड़े बदलेंगे, तो दावत में पहुँचने में बहुत देर हो जाएगी। इसलिए वे अपने उन्हीं 'खेत वाले पुराने, गंदे और पैबंद लगे (फटे हुए) कपड़ों' में ही व्यापारी के महल की तरफ चल दिए।
जब मुल्ला महल में पहुँचे, तो वहाँ हर कोई रेशमी कपड़ों, कीमती शॉल और शानदार पगड़ियों में सजा हुआ था। मुल्ला को उन फटे-पुराने और धूल भरे कपड़ों में देखकर, दरवाज़े पर खड़े पहरेदारों ने उन्हें एक भिखारी समझकर बुरी तरह झिड़क दिया।
"चल पीछे हट! यह दावत है, कोई लंगर नहीं बँट रहा यहाँ!" पहरेदार ने धक्का देते हुए कहा।
मुल्ला ने किसी तरह अंदर प्रवेश तो कर लिया, लेकिन अंदर का नज़ारा और भी अपमानजनक था। किसी भी मेहमान ने मुल्ला से बात नहीं की। जब खाना परोसने की बारी आई, तो मेज़बान (व्यापारी) ने मुल्ला को सबसे पीछे, एक अंधेरे कोने में बिठा दिया। नौकरों ने भी उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया और उनके सामने रूखी-सूखी रोटियाँ रख दीं।
मुल्ला नसरुद्दीन को यह अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ। वे बिना कुछ खाए चुपचाप वहाँ से उठे और अपने घर वापस आ गए।
घर पहुँचकर मुल्ला ने नहा-धोकर अपना सबसे महँगा और शानदार 'जुब्बा' (Jubba - एक भारी और मखमली तुर्की कोट) निकाला, जिसके किनारों पर सोने के तार की कढ़ाई हो रखी थी। उन्होंने सिर पर एक कीमती पगड़ी बाँधी, पैरों में चमकदार जूतियाँ पहनीं और इत्र लगाकर वापस उसी दावत में पहुँच गए।
इस बार नज़ारा बिल्कुल बदल चुका था!
मुल्ला को उस शानदार मखमली 'जुब्बे' में देखते ही, दरवाज़े के पहरेदार झुककर सलाम करने लगे। मेज़बान व्यापारी ने जैसे ही मुल्ला को देखा, वह दौड़ता हुआ आया और मुल्ला के गले लग गया।
"आइए मुल्ला जी! आइए! दावत की शान तो आपके आने से ही बढ़ी है।" व्यापारी ने मुल्ला को सबसे आगे, सम्माननीय मेहमानों के बीच मसनद (तकिए) के सहारे बिठाया।
नौकर तुरंत सोने-चाँदी के बर्तनों में कोरमा, बिरयानी, कबाब और तरह-तरह की मिठाइयाँ लेकर मुल्ला के सामने हाज़िर हो गए।
मुल्ला नसरुद्दीन ने एक गहरी साँस ली। उन्होंने कोरमे की प्याली उठाई, लेकिन उसे अपने मुँह में डालने के बजाय, मुल्ला ने उस कोरमे को अपने 'मखमली जुब्बे (कोट) की आस्तीन' पर उड़ेल दिया!
फिर मुल्ला ने बिरयानी की एक मुट्ठी भरी और उसे अपनी 'पगड़ी' में ठूँसने लगे। इसके बाद उन्होंने एक कबाब उठाया और उसे अपने 'कोट की जेब' में डाल दिया।
मुल्ला अपने कपड़ों पर खाना मलते जा रहे थे और ज़ोर-ज़ोर से बोल रहे थे: "खाओ मेरे जुब्बे! खाओ! यह बिरयानी तुम्हारे लिए है। पियो मेरी पगड़ी पियो! यह ज़ायकेदार सूप तुम्हारे लिए ही बना है! खूब मज़े से खाओ मेरे कपड़ों!"
मुल्ला की इस अजीबोगरीब हरकत को देखकर पूरे महल में सन्नाटा छा गया। सब मेहमान खाना छोड़कर उन्हें हैरानी से देखने लगे।
मेज़बान व्यापारी घबराकर भागता हुआ आया और बोला, "मुल्ला जी! यह आप क्या कर रहे हैं? आपका दिमाग तो ठीक है? खाना मुँह से खाया जाता है, आप अपने इतने महँगे कपड़ों को खाना क्यों खिला रहे हैं?"
मुल्ला नसरुद्दीन ने बहुत ही शांत और तीखी आँखों से व्यापारी की तरफ देखा और एक ऐसा जवाब दिया, जिसने उस दावत में मौजूद हर अमीर आदमी का सिर शर्म से झुका दिया।
मुल्ला ने कहा: "व्यापारी साहब! मैं बिल्कुल ठीक कर रहा हूँ। अभी कुछ घंटे पहले जब मैं इसी दावत में 'मुल्ला नसरुद्दीन' बनकर अपने पुराने कपड़ों में आया था, तो आपने और आपके नौकरों ने मुझे धक्के मारकर एक कोने में फेंक दिया था। किसी ने मुझे पानी तक नहीं पूछा।
लेकिन अब जब मैं इस 'मखमली जुब्बे' को पहन कर आया हूँ, तो आपने मुझे सिर आँखों पर बिठा लिया और मेरे सामने छप्पन भोग रख दिए।
इसका सीधा सा मतलब है कि यह इज़्ज़त, यह स्वागत और यह शानदार खाना 'मुल्ला नसरुद्दीन' के लिए नहीं, बल्कि इस 'मखमली कोट और पगड़ी' के लिए है! और जब दावत इन कपड़ों को मिली है, तो खाना भी तो इन्हीं कपड़ों को खाना चाहिए ना! इसलिए मैं अपने कपड़ों को खाना खिला रहा हूँ।"
मुल्ला का यह गहरा और व्यंग्यात्मक तमाचा सुनकर व्यापारी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसने मुल्ला से हाथ जोड़कर माफ़ी माँगी। मुल्ला नसरुद्दीन ने समाज को यह बहुत बड़ा सबक दिया कि इंसान की पहचान उसके ज्ञान और चरित्र से होती है, उसके बाहरी कपड़ों से नहीं।
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