मुल्ला नसरुद्दीन की उल्टी सवारी

मुल्ला नसरुद्दीन गाँव के एक मदरसे (स्कूल) में पढ़ाते थे। उनके पास कई शागिर्द (विद्यार्थी) थे जो मुल्ला जी का बहुत सम्मान करते थे। मुल्ला नसरुद्दीन का ज्ञान भले ही अजीब था, लेकिन उनके शिष्य हमेशा उनके पीछे-पीछे चलते थे और उनकी हर बात मानते थे।
एक दिन सुबह-सुबह मुल्ला नसरुद्दीन को अपने शिष्यों के साथ किसी दूसरे गाँव में एक दावत में जाना था। सफर थोड़ा लंबा था, इसलिए मुल्ला ने अपने गधे को तैयार किया।
शिष्य इंतज़ार कर रहे थे कि मुल्ला जी गधे पर बैठें तो सफर शुरू हो। मुल्ला नसरुद्दीन गधे के पास आए और एक लंबी छलाँग लगाकर गधे की पीठ पर बैठ गए।
लेकिन यह क्या! मुल्ला नसरुद्दीन गधे पर 'उल्टे' बैठे हुए थे! यानी मुल्ला का मुँह गधे की पूँछ की तरफ था और उनकी पीठ गधे के सिर (मुँह) की तरफ थी।
शिष्यों ने सोचा कि शायद मुल्ला जी गलती से उल्टे बैठ गए हैं। एक शिष्य ने कहा, "मुल्ला जी! आप गलती से गधे पर उल्टे बैठ गए हैं। अपना मुँह आगे की तरफ कर लीजिए।"
मुल्ला नसरुद्दीन ने अपनी दाढ़ी खुजाते हुए बहुत ही गंभीरता से कहा, "अरे नहीं बेटा! मैं बिल्कुल सही बैठा हूँ। तुम लोग बस मेरे पीछे-पीछे पैदल चलना शुरू करो।"
अब सफर शुरू हुआ। गधा आगे-आगे चल रहा था। गधे की पीठ पर मुल्ला नसरुद्दीन 'उल्टे' (पूँछ की तरफ मुँह करके) बैठे हुए थे और उनके पीछे-पीछे उनके सारे शिष्य पैदल चल रहे थे।
रास्ते में जब यह काफिला बाज़ार से गुज़रा, तो जो भी उन्हें देखता, वह हँस-हँस कर लोट-पोट हो जाता। लोग उँगलियाँ दिखा-दिखा कर मज़ाक उड़ाने लगे। "अरे देखो-देखो! मुल्ला पागल हो गया है! इसे गधे पर सीधा बैठना भी नहीं आता।" "लगता है मुल्ला का दिमाग खराब हो गया है। गधा आगे जा रहा है और मुल्ला पीछे देख रहा है!"
शिष्यों को यह देखकर बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। पूरा बाज़ार उनके गुरु जी का मज़ाक उड़ा रहा था।
अंततः एक सबसे होनहार शिष्य से रहा नहीं गया। वह दौड़कर गधे के पास आया और बहुत ही विनती करते हुए बोला: "मुल्ला जी! कृपा करके गधे पर सीधे बैठ जाइए। पूरा बाज़ार हम पर हँस रहा है। लोग आपको बेवकूफ़ समझ रहे हैं। आप इस तरह उल्टे क्यों बैठे हैं?"
मुल्ला नसरुद्दीन ने गधे को रोका। उन्होंने बाज़ार में हँसते हुए लोगों की तरफ देखा और फिर अपने शिष्यों की तरफ देखकर एक ऐसा जवाब दिया, जिसने शिष्टाचार की सारी परिभाषाओं को ही बदलकर रख दिया।
मुल्ला ने बहुत ही दार्शनिक और गंभीर लहज़े में कहा: "मेरे प्यारे बच्चो! ये बाज़ार के मूर्ख लोग क्या जानें कि शिष्टाचार और सम्मान क्या होता है। मैं उल्टे इसलिए बैठा हूँ क्योंकि यह पूरी तरह से 'तर्कसंगत' है!"
शिष्य हैरान रह गए। "इसमें क्या तर्क है मुल्ला जी?"
मुल्ला ने समझाया: "ज़रा सोचो! अगर मैं गधे पर 'सीधा' (आगे की तरफ मुँह करके) बैठता, और तुम सब मेरे पीछे-पीछे पैदल चलते, तो मेरी 'पीठ' तुम्हारी तरफ हो जाती। और किसी उस्ताद (गुरु) का अपने शिष्यों को पीठ दिखाना उनका घोर अपमान है!
अब अगर हम दूसरा तरीका अपनाते— मैं सीधा बैठता और तुम सब मेरे 'आगे-आगे' पैदल चलते। तो तुम्हारी 'पीठ' मेरी तरफ हो जाती! और शिष्यों का गुरु की तरफ पीठ करके चलना भी बहुत बड़ा अनादर है!
इसलिए, मैंने सबसे बेहतरीन तरीका निकाला है। मैं गधे पर 'उल्टा' बैठ गया हूँ और तुम मेरे पीछे चल रहे हो। इससे न तो मेरी पीठ तुम्हारी तरफ है, और न ही तुम्हारी पीठ मेरी तरफ है! हम एक-दूसरे की आँखों में आँखें डालकर इज़्ज़त के साथ सफर कर रहे हैं। अब बताओ, इसमें बेवकूफी कैसी?"
मुल्ला का यह अद्भुत और बेतुका तर्क सुनकर शिष्यों का मुँह खुला का खुला रह गया। उनका गुरु बेवकूफ़ था या दुनिया का सबसे बड़ा दार्शनिक, यह फैसला करना उनके लिए नामुमकिन हो गया। बाज़ार के लोग हँसते रहे और मुल्ला नसरुद्दीन अपनी उसी 'उल्टी सवारी' पर शान से सफर करते रहे!
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