मुल्ला नसरुद्दीन और गधे की परछाई का किराया

गर्मियों के दिन थे। सूरज आसमान से जैसे आग बरसा रहा था। मुल्ला नसरुद्दीन को किसी ज़रूरी काम से दूसरे गाँव जाना था, जो वहाँ से कई मीलों दूर एक रेतीले और बंजर रास्ते पर था।
मुल्ला ने सोचा कि इतनी भयंकर गर्मी में पैदल चलना बेवकूफी होगी। वे गाँव के एक आदमी के पास गए, जो अपना 'गधा' किराए पर देता था। मुल्ला ने कुछ पैसों में उस आदमी का गधा एक दिन के लिए किराए पर ले लिया।
गधे का मालिक बहुत ही लालची और झगड़ालू किस्म का इंसान था। उसने सोचा कि गधा तो जा ही रहा है, क्यों न मैं भी मुल्ला के साथ-साथ चल दूँ, ताकि गधे की रखवाली भी हो जाए।
सफर शुरू हुआ। मुल्ला नसरुद्दीन गधे की पीठ पर मज़े से बैठकर सवारी कर रहे थे, और गधे का मालिक पसीने से लथपथ होकर गधे के पीछे-पीछे पैदल चल रहा था।
दोपहर हो गई। सूरज बिल्कुल सिर के ऊपर आ गया। गर्मी इतनी भयानक थी कि ज़मीन तवे की तरह जल रही थी। रास्ते में दूर-दूर तक कोई पेड़-पौधा या छाया नहीं थी।
मुल्ला नसरुद्दीन को गर्मी बर्दाश्त नहीं हुई। उन्होंने गधे को रोका, नीचे उतरे और सूरज की चिलचिलाती धूप से बचने के लिए, वह ज़मीन पर 'गधे की परछाई' के नीचे जाकर आराम से बैठ गए। गधे का शरीर बड़ा था, इसलिए उसकी परछाई में मुल्ला को अच्छी खासी ठंडक मिल रही थी।
यह देखकर गधे के मालिक को बहुत गुस्सा आया। वह खुद धूप में खड़ा पसीना बहा रहा था। वह मुल्ला के पास गया और कड़क आवाज़ में बोला: "ऐ मुल्ला! उठो यहाँ से! यह मेरे गधे की परछाई है। इस परछाई के नीचे मैं बैठूँगा, तुम नहीं!"
मुल्ला नसरुद्दीन ने आराम से लेटते हुए कहा, "अरे भाई! क्यों शोर मचा रहे हो? मैंने यह गधा पूरे दिन के लिए किराए पर लिया है। इसलिए जब तक यह गधा मेरे पास है, इसकी हर चीज़ मेरी है। मैं ही इस परछाई में बैठूँगा।"
गधे का मालिक अपनी ज़िद पर अड़ गया। उसने एक बहुत ही बेतुका तर्क दिया: "अरे मुल्ला! बेईमानी मत करो! तुमने मुझे सिर्फ 'गधे की सवारी' के पैसे दिए हैं, 'गधे की परछाई' के पैसे नहीं दिए हैं! परछाई गधे के साथ मुफ्त में नहीं आती। अगर तुम्हें इस परछाई में बैठना है, तो तुम्हें इसका 'अलग से किराया' देना होगा!"
मुल्ला नसरुद्दीन को भी गुस्सा आ गया। "यह कैसी बेवकूफी है? गधा मेरा किराए का है, तो ज़ाहिर सी बात है कि उसकी परछाई भी मेरी ही हुई। मैं एक भी पैसा फालतू नहीं दूँगा!"
दोनों में ज़ोरदार बहस शुरू हो गई।
"परछाई मेरी है!" मालिक चिल्लाया। "नहीं! परछाई मेरी है!" मुल्ला चिल्लाए।
बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने एक-दूसरे के कॉलर पकड़ लिए। चिलचिलाती धूप के बीच, बंजर रेगिस्तान में दोनों आदमी 'गधे की परछाई' जैसी मामूली और बेतुकी चीज़ के लिए एक-दूसरे को घूँसे और लातें मारने लगे। धूल उड़ने लगी और दोनों ज़मीन पर गिरकर बुरी तरह लड़ने लगे।
इतने ज़ोर का शोर और हाथापाई देखकर बेचारा गधा घबरा गया।
गधे ने सोचा: "ये दोनों बेवकूफ़ इंसान तो पागल हो गए हैं। इससे पहले कि इनकी लड़ाई का गुस्सा मुझ पर उतरे, यहाँ से खिसक लेना ही बेहतर है!"
गधे ने ज़ोर से रेंका, अपने पिछले दोनों पैर हवा में उछाले, और उन दोनों लड़ते हुए इंसानों को वहीं छोड़कर, सरपट दौड़ लगाकर अपने गाँव की तरफ भाग गया!
गधे के भागने की आवाज़ सुनकर मुल्ला नसरुद्दीन और गधे के मालिक ने लड़ाई रोकी और मुड़कर देखा।
रेगिस्तान के उस बंजर रास्ते पर अब सिर्फ चिलचिलाती धूप थी। गधा मीलों दूर भाग चुका था।
मुल्ला नसरुद्दीन ने धूल झाड़ते हुए खड़े होकर गधे के मालिक की तरफ देखा और हँसते हुए कहा: "लो भाई! तुम परछाई का किराया माँग रहे थे और मैं परछाई पर अपना हक जता रहा था। अब जब 'गधा' ही नहीं रहा, तो 'परछाई' कहाँ से बचेगी? हमने अपनी बेवकूफी में दोनों ही चीज़ें गँवा दीं!"
गधे का मालिक अपना सिर पीटकर रह गया। उसे अपनी परछाई के लालच में न केवल किराया गँवाना पड़ा, बल्कि अपना गधा भी खोना पड़ा। और मुल्ला नसरुद्दीन हँसते हुए पैदल ही अपने सफर पर आगे बढ़ गए।
😄 हास्य कहानियाँ की और कहानियाँ
अंधेर नगरी चौपट राजा
भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की अमर व्यंग्य कथा — जहाँ सब कुछ 'टके सेर' मिलता था। एक लालची चेला मिठाई के लालच में रुक गया और जब फाँसी की बारी आई, तो गुरु की चतुराई ने उसे बचाया और उस मूर्ख राजा को उसके अपने जाल में फँसा दिया।
पढ़ें →हर कण में भगवान
हाथी और महावत की मशहूर और गुदगुदाने वाली कथा — एक भोले शिष्य ने गुरु का ज्ञान इतना शाब्दिक रूप से लिया कि पागल हाथी के सामने से हटने से मना कर दिया। काँटों में फेंके जाने के बाद गुरु जी का जवाब सुनकर उसका मुँह खुला का खुला रह गया।
पढ़ें →भोलाराम का जीव
हरिशंकर परसाई जी का सरकारी दफ्तरों पर करारा व्यंग्य — भोलाराम मर गया पर उसका जीव स्वर्ग नहीं पहुँचा। नारद मुनि उसे ढूँढने पृथ्वी पर आए तो पता चला कि आत्मा पेंशन की धूल भरी सरकारी फाइलों में अटकी हुई है!
पढ़ें →इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर
हरिशंकर परसाई जी का पुलिस व्यवस्था पर अद्भुत व्यंग्य — भारत सरकार ने चाँद पर वैज्ञानिक नहीं, इंस्पेक्टर मातादीन को भेजा। मातादीन ने चाँद पर पृथ्वी की पुलिस व्यवस्था लागू की और चाँद वालों ने उन्हें वापस भेजने के लिए भारत से गुहार लगाई।
पढ़ें →बड़े भाई साहब
मुंशी प्रेमचंद की बचपन और पढ़ाई की मीठी नोकझोंक पर आधारित क्लासिक कथा — बड़े भाई साहब दिन-रात पढ़कर भी फेल होते थे और छोटा भाई खेलकर भी पास। फिर भी भाई साहब की डांट में जो प्यार और अनुभव की गहराई थी, वह किताबों में नहीं मिलती।
पढ़ें →निमंत्रण — पंडित मोटेराम शास्त्री का पेटूपन
मुंशी प्रेमचंद का दावत और ब्राह्मणों के पेटूपन पर ज़बरदस्त व्यंग्य — पंडित मोटेराम शास्त्री ने सेठ जी की दावत में इतने रसगुल्ले खा लिए कि झुककर दक्षिणा भी नहीं उठा सके। फिर पैरों के अँगूठों से सोने का सिक्का उठाने की जो तरकीब निकाली, वह देखने वाली थी।
पढ़ें →