मुल्ला नसरुद्दीन का गुमशुदा गधा

एक बार मुल्ला नसरुद्दीन शहर के सबसे बड़े पशु बाज़ार में गए। उन्हें अपने व्यापार के लिए कुछ गधों की ज़रूरत थी। मुल्ला ने बहुत ही मोल-भाव करके पूरे 'दस गधे' खरीद लिए।
मुल्ला बहुत खुश थे। उन्होंने दसों गधों को एक कतार में खड़ा किया। मुल्ला नसरुद्दीन खुद सबसे 'पहले वाले गधे' की पीठ पर शान से बैठ गए और बाकी नौ गधों को अपने पीछे-पीछे हाँकते हुए अपने गाँव की तरफ चल दिए।
रास्ता लंबा और सुनसान था। मुल्ला गधे की पीठ पर बैठे-बैठे ऊँघने लगे। थोड़ी दूर जाने के बाद, मुल्ला के दिमाग में अचानक एक शक पैदा हुआ। "रास्ता सुनसान है, कहीं पीछे से कोई चोर मेरा एक-आध गधा चुरा कर तो नहीं ले गया? मुझे गिनती कर लेनी चाहिए।"
मुल्ला ने अपने गधे की पीठ पर बैठे-बैठे ही पीछे मुड़कर देखा और अपनी उँगली से पीछे चल रहे गधों को गिनना शुरू किया: "एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात, आठ... और नौ!"
"नौ गधे?" मुल्ला के पसीने छूट गए। "मैंने तो पूरे दस गधे खरीदे थे! यह नौ कैसे रह गए? मेरा एक गधा कहाँ गया? हाय अल्लाह, मैं लुट गया!" मुल्ला नसरुद्दीन दरअसल उस गधे को गिनना 'भूल' गए थे, जिस पर वे खुद बैठे हुए थे!
मुल्ला घबराहट में तुरंत अपने गधे की पीठ से नीचे कूदे। वे पागलों की तरह झाड़ियों के पीछे और आस-पास देखने लगे कि कहीं उनका खोया हुआ गधा वहाँ तो नहीं चर रहा है। जब आस-पास कोई गधा नहीं मिला, तो मुल्ला ने ज़मीन पर खड़े होकर सभी गधों को एक साथ एक लाइन में खड़ा किया।
अब मुल्ला ने फिर से अपनी उँगली से गिनती शुरू की: "एक, दो, तीन... सात, आठ, नौ... और यह रहा दस!"
"अरे वाह! पूरे दस गधे हैं!" मुल्ला नसरुद्दीन ने राहत की एक बहुत लंबी साँस ली। "अल्लाह का लाख-लाख शुक्र है, मेरा दसवाँ गधा वापस आ गया। शायद वह कहीं पीछे घास खाने रुक गया होगा।"
मुल्ला बहुत खुश हुए। वे वापस अपने उसी पहले गधे की पीठ पर बैठे और सफर आगे बढ़ाया।
आधे घंटे बाद, मुल्ला के दिमाग में 'गिनती' का कीड़ा फिर से कुलबुलाने लगा। "क्या पता वह गधा फिर से घास खाने पीछे रह गया हो। एक बार और गिन लेना बेहतर है।"
मुल्ला ने गधे की पीठ पर बैठे-बैठे ही दोबारा पीछे मुड़कर अपनी उँगली से गधों को गिना: "एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात, आठ... नौ!"
"या खुदा! फिर से नौ!" मुल्ला नसरुद्दीन ने अपना सिर पीट लिया। "यह क्या जादू-टोना हो रहा है मेरे साथ? अभी तो पूरे दस थे, फिर से एक गधा गायब हो गया!"
मुल्ला फिर से रोते हुए अपने गधे से नीचे उतरे। उन्होंने फिर से सब गधों को ज़मीन पर खड़े होकर गिना। "एक, दो, तीन... नौ... और दस!"
ज़मीन पर खड़े होकर गिनती करते ही गधे पूरे 'दस' हो गए!
अब मुल्ला नसरुद्दीन का दिमाग बुरी तरह से चकरा गया। उन्होंने अपने उस 'पहले गधे' (जिस पर वे बैठते थे) को बहुत गौर से और शक्की नज़रों से देखा।
मुल्ला ने अपने दिमाग में एक बहुत ही 'महान' निष्कर्ष निकाला। मुल्ला ने खुद से कहा: "यह गधा ज़रूर कोई जादुई गधा या जिन्न है! जब मैं ज़मीन पर पैदल चलता हूँ, तो मेरे पास पूरे 'दस' गधे होते हैं। लेकिन जैसे ही मैं इस गधे की पीठ पर बैठता हूँ, तो यह मेरा 'एक गधा' खा जाता है और गधे 'नौ' रह जाते हैं! जब मैं नीचे उतरता हूँ, तो यह उस दसवें गधे को वापस उगल देता है!"
मुल्ला नसरुद्दीन को उस 'गधे पर बैठने' से बहुत डर लगने लगा।
उन्होंने अपना सिर हिलाते हुए कहा: "नहीं-नहीं! गधे की पीठ पर बैठकर सवारी करने के लालच में, मैं अपना एक महँगा गधा नहीं खो सकता। सवारी से बेहतर है कि मैं 'पैदल' ही घर जाऊँ, कम से कम मेरे पास पूरे दस गधे तो रहेंगे!"
और इस तरह, मुल्ला नसरुद्दीन ने सवारी करना छोड़ दिया। वे अपने पूरे दस गधों को आगे हाँकते हुए, मीलों का सफर पैदल और पसीना बहाते हुए तय करके अपने गाँव पहुँचे। लेकिन उनके मन में इस बात की बहुत बड़ी शांति थी कि उनकी 'अक्लमंदी' और 'पैदल चलने' के कारण उनका दसवाँ गधा चोरी होने से बच गया!
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