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🎭 तेनाली राम

मूर्ख चोर और तेनाली की चारपाई — 'हूँ' की आवाज़ और रात भर की कहानी

लोक परंपरा — तेनालीराम5 मिनट का पठन
मूर्ख चोर और तेनाली की चारपाई — 'हूँ' की आवाज़ और रात भर की कहानी

गर्मियों के दिन थे। विजयनगर में बहुत तेज़ गर्मी पड़ रही थी। इसलिए तेनालीरामा और उनकी पत्नी रात के समय अपने घर के खुले आंगन में 'चारपाई' बिछाकर सो रहे थे।

आधी रात का समय था। शहर के चार कुख्यात चोरों ने तेनालीरामा के घर में चोरी करने की योजना बनाई। वे चुपके से दीवार फांदकर आंगन में घुसे। परंतु इससे पहले कि वे घर के अंदर जाते, तेनालीरामा की नींद खुल गई। उन्होंने चोरों की आहट सुन ली थी।

चोर घबराकर तुरंत तेनालीरामा की चारपाई के ठीक नीचे छिप गए। वे इंतज़ार करने लगे कि कब तेनालीरामा गहरी नींद में सोएं और वे अपना काम शुरू करें।

तेनालीरामा की चाल: तेनालीरामा समझ गए कि चोर चारपाई के नीचे हैं। अगर वे शोर मचाते, तो चोर उन पर हमला कर सकते थे। इसलिए उन्होंने अपनी पत्नी को जगाया और ज़ोर से बोले: "अजी सुनती हो! मुझे नींद नहीं आ रही है। क्या मैं तुम्हें एक बहुत ही रोमांचक कहानी सुनाऊँ? यह कहानी हमारे उस 'गुप्त खज़ाने' के बारे में है, जिसे मैंने जवानी में एक बहुत ही सुरक्षित जगह पर गाड़ कर रखा था।"

'खज़ाना' शब्द सुनते ही चारपाई के नीचे छिपे चोरों के कान खड़े हो गए। उन्होंने सोचा, "वाह! आज तो बिना मेहनत किए ही खज़ाने का पता चल जाएगा।"

तेनालीरामा ने अपनी पत्नी से आगे कहा: "परंतु मेरी एक शर्त है। मैं कहानी सुनाता जाऊँगा, और तुम्हें हर बात के बाद 'हूँ' (हाँ) कहना होगा, ताकि मुझे पता चलता रहे कि तुम जाग रही हो और ध्यान से सुन रही हो। अगर तुमने 'हूँ' कहना बंद किया, तो मैं खज़ाने का पता नहीं बताऊँगा।"

पत्नी ने नींद में उबासी लेते हुए कहा, "ठीक है, सुनाइए।"

चोरों की 'हूँ' और रात भर की कहानी: तेनालीरामा ने कहानी शुरू की। "एक बार की बात है, मैं एक घने जंगल से गुज़र रहा था... बोलो 'हूँ'।" पत्नी ने कहा: "हूँ।"

तेनालीरामा ने 10-15 मिनट तक कहानी सुनाई। पत्नी दिन भर के काम से थकी हुई थी, इसलिए वह कुछ ही देर में गहरी नींद में सो गई और उसके खर्राटे गूंजने लगे।

अब जैसे ही तेनालीरामा ने कहा, "फिर मैं उस पुराने मंदिर के पास पहुँचा... बोलो 'हूँ'।" ऊपर से कोई आवाज़ नहीं आई।

नीचे छिपे चोर घबरा गए कि अगर पत्नी सो गई, तो तेनालीरामा खज़ाने का पता नहीं बताएंगे। इसलिए चारों चोरों ने चारपाई के नीचे से एक साथ दबी हुई आवाज़ में कहा: "हूँ... हूँ... हूँ!"

तेनालीरामा मन ही मन मुस्कुराए। उनका तीर निशाने पर लग चुका था। अब उन्होंने जानबूझकर कहानी को लंबा और उबाऊ बनाना शुरू कर दिया। "फिर मैंने वहाँ एक गड्ढा खोदा... (नीचे से आवाज़ आई- 'हूँ') ... फिर मैंने दूसरा गड्ढा खोदा... ('हूँ') ... फिर मैंने सौ गड्ढे खोदे... ('हूँ')।"

सुबह का नज़ारा: तेनालीरामा ने चोरों को पूरी रात खज़ाने के लालच में उलझाए रखा। चोर पूरी रात चारपाई के नीचे मच्छरों का डंक सहते हुए और नींद से जूझते हुए सिर्फ "हूँ... हूँ" करते रहे।

कहानी सुनाते-सुनाते सुबह हो गई और सूरज निकल आया। घर के नौकर जाग गए।

तेनालीरामा ने अचानक अपनी कहानी रोकी और ज़ोर से अपने नौकरों को आवाज़ लगाई: "अरे रामू! शामू! जल्दी आओ। रात भर मेरे गले में खराश हो गई कहानी सुनाते-सुनाते, और नीचे छिपे इन बेचारों के गले भी 'हूँ... हूँ' करते हुए सूख गए होंगे। इन्हें पकड़ो और पुलिस के हवाले करो!"

नौकरों ने तुरंत लाठियां लेकर चारपाई के नीचे से उन चारों चोरों को बाहर खींच लिया। चोर रात भर जागने के कारण इतने थक चुके थे कि उनमें भागने की भी हिम्मत नहीं बची थी। उन्हें अपनी मूर्खता पर बहुत रोना आया कि खज़ाने के लालच में वे पूरी रात 'हूँ... हूँ' करके खुद ही फंस गए।

🎉 कहानी समाप्त

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