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🎭 तेनाली राम

नाई की होशियारी और तेनालीरामा — पद का लालच और काले कुत्ते का स्नान

लोक परंपरा — तेनालीराम5 मिनट का पठन
नाई की होशियारी और तेनालीरामा — पद का लालच और काले कुत्ते का स्नान

विजयनगर के महाराजा कृष्णदेवराय को अपने शाही नाई की सेवाएं बहुत पसंद थीं। वह नाई बहुत ही कुशल था और महाराज की बहुत अच्छी मालिश और हजामत करता था।

एक दिन महाराज उसकी सेवा से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने नाई से कहा: "मैं तुम्हारे काम से बहुत खुश हूँ। आज तुम जो चाहो, मुझसे मांग सकते हो। मुग़ल सल्तनत नहीं, विजयनगर साम्राज्य का खज़ाना तुम्हारे लिए खुला है!"

नाई बहुत चतुर और महत्वाकांशी था। उसने सोचा कि धन-दौलत तो राजा से कभी भी मिल सकती है, परंतु समाज में ऊँचा रुतबा और सम्मान पाना आसान नहीं है।

नाई ने हाथ जोड़कर कहा: "महाराज! आपके आशीर्वाद से मेरे पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं है। परंतु समाज में लोग मुझे केवल एक 'नाई' की नज़रों से देखते हैं। मेरी इच्छा है कि मुझे एक 'महान विद्वान और उच्च कोटि के ब्राह्मण' का दर्जा दिया जाए, ताकि मैं भी आपके दरबार में अष्टदिग्गजों के साथ सम्मान से बैठ सकूँ।"

महाराज अपने वचन से बंधे थे। उन्होंने राज्य के प्रमुख पुजारियों और राजगुरु को आदेश दिया कि वे विशेष पूजा-पाठ और अनुष्ठान करके इस नाई को एक महान विद्वान और ब्राह्मण में परिवर्तित कर दें। पुजारी हैरान थे, परंतु राजा का आदेश टाल नहीं सकते थे।

तेनालीरामा की योजना: तेनालीरामा को जब यह बात पता चली, तो वे समझ गए कि महाराज ने भावनाओं में बहकर एक बहुत ही अनुचित आदेश दे दिया है। किसी भी इंसान को अनुष्ठान से विद्वान नहीं बनाया जा सकता, विद्या तो वर्षों की तपस्या और अध्ययन से आती है।

अगले दिन सुबह, जब महाराज अपने महल की बालकनी में टहल रहे थे, उन्होंने देखा कि महल के बाहर तालाब के किनारे तेनालीरामा बैठे हैं। उनके पास एक बड़ा सा, पूरी तरह से 'काला कुत्ता' था। तेनालीरामा उस कुत्ते को साबुन लगा रहे थे और एक कड़े ब्रश से उसे ज़ोर-ज़ोर से रगड़-रगड़ कर नहला रहे थे। कुत्ता दर्द से चीख रहा था।

महाराज को यह बहुत अजीब लगा। वे तुरंत नीचे गए और तेनाली से पूछा: "तेनालीरामा! यह तुम क्या कर रहे हो? इस बेचारे जानवर को इतनी बेरहमी से क्यों रगड़ रहे हो?"

कुत्ते को गाय बनाने का रहस्य: तेनालीरामा ने पसीना पोंछते हुए और अत्यंत गंभीरता से कहा: "महाराज! मैं इस काले कुत्ते को नहलाकर एक 'सफेद और पवित्र गाय' बनाने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं इसे तब तक रगड़ूँगा, जब तक इसका रंग सफेद न हो जाए और यह सींग निकालकर दूध न देने लगे!"

यह सुनकर महाराज ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। उन्होंने कहा: "अरे तेनाली! तुम्हारी अक्ल को क्या हो गया है? कुत्ता तो कुत्ता ही रहेगा। उसे चाहे कितना भी साबुन लगा लो, वह कभी अपनी प्रजाति बदलकर 'गाय' नहीं बन सकता!"

तेनालीरामा ने तुरंत ब्रश नीचे रखा, महाराज के सामने हाथ जोड़े और अपने असली कूटनीतिक अंदाज़ में कहा: "बिल्कुल सही फरमाया महाराज! जब रगड़-रगड़ कर नहलाने से एक कुत्ता 'गाय' नहीं बन सकता... तो फिर मंत्र पढ़ने और पवित्र जल छिड़कने से एक अनपढ़ 'नाई' रातों-रात एक महान 'विद्वान' कैसे बन सकता है? विद्या और ज्ञान तो कर्म और अध्ययन से आते हैं, किसी अनुष्ठान या शाही आदेश से नहीं!"

महाराज को अपनी भूल का एहसास: तेनालीरामा का यह अचूक तर्क महाराज के दिल में सीधा उतर गया। उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया कि उन्होंने नाई की सेवा से खुश होकर राज्य की विद्या और विद्वानों का अपमान कर दिया था।

महाराज ने तुरंत उस अनुष्ठान को रुकवा दिया। उन्होंने नाई को बुलाकर समझाया कि योग्यता के बिना पद देना राज्य के साथ न्याय नहीं है। महाराज ने नाई को उसके काम के लिए बहुत सारा सोना और धन देकर विदा किया। तेनालीरामा ने अपनी अक्ल से एक बार फिर विजयनगर के राजदरबार की गरिमा बचा ली।

🎉 कहानी समाप्त

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