हवा और प्रकाश का महल — राजा की ज़िद और एक 'सपने' का मुकद्दमा

एक रात महाराजा कृष्णदेवराय गहरी नींद में सो रहे थे। उन्होंने एक बहुत ही अद्भुत और अविश्वसनीय सपना देखा। सपने में उन्होंने देखा कि ज़मीन से बहुत ऊपर, आसमान में बादलों के बीच एक बहुत ही जादुई और भव्य महल तैर रहा है। वह महल ईंट-पत्थर का नहीं, बल्कि केवल 'हवा और प्रकाश' से बना था। उस महल में रंग-बिरंगी रोशनियां चमक रही थीं और वह पूरी तरह से हवा में झूल रहा था।
जैसे ही महाराज की नींद टूटी, वे उस सपने के महल के मोह में पड़ गए। उनका दिमाग उसी 'हवा और प्रकाश के महल' में अटका रह गया।
अगली सुबह दरबार लगते ही महाराज ने अपने मुख्य वास्तुकारों और मंत्रियों को बुलाया और एक अजीबोगरीब फरमान सुना दिया: "मैंने कल रात सपनों में एक तैरता हुआ जादुई महल देखा है। मैं चाहता हूँ कि ठीक वैसा ही 'हवा और प्रकाश का महल' विजयनगर में असलियत में बनाया जाए! मैं तुम्हें तीन दिन का समय देता हूँ। यदि तीन दिन में इस महल का निर्माण शुरू नहीं हुआ, तो तुम सभी को फांसी पर लटका दिया जाएगा!"
मंत्रियों की दहशत: यह फरमान सुनकर पूरे दरबार में दहशत फैल गई। हवा और रोशनी से कोई महल कैसे बन सकता है? यह विज्ञान और प्रकृति के नियमों के बिल्कुल खिलाफ था। परंतु महाराज के सामने यह बात कहने की हिम्मत किसी में नहीं थी।
सभी मंत्री भागकर तेनालीरामा के पास पहुँचे और अपनी जान बचाने की भीख मांगने लगे। तेनालीरामा ने उन्हें शांत किया और कहा, "आप सब चिंता न करें। मैं महाराज की इस 'हवाई ज़िद' का कोई न कोई ज़मीनी इलाज ज़रूर निकालूँगा। बस आप मुझे दो दिन का समय दें।"
एक वृद्ध का मुकद्दमा: दो दिन बाद, महाराज दरबार में बैठे अपने महल के इंतज़ार में थे। तभी दरबार के बाहर से एक बहुत ही वृद्ध और कमज़ोर आदमी के ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ आई। वह आदमी लाठी टेकते हुए, फटे कपड़ों में दरबार के बीचों-बीच आया और ज़मीन पर गिरकर रोने लगा।
महाराज को उस पर दया आ गई। उन्होंने पूछा: "क्या बात है बाबा? तुम इतने दुखी क्यों हो? तुम्हारे साथ क्या अन्याय हुआ है?"
उस वृद्ध आदमी ने कांपती हुई आवाज़ में कहा: "महाराज! मैं पूरी तरह से लुट गया हूँ! कल रात मेरे घर में डकैती हुई है। डाकुओं ने मेरी जीवन भर की गाढ़ी कमाई, मेरे सोने के 500 सिक्के और मेरी ज़मीन के कागज़ात लूट लिए। अब मेरे पास कुछ नहीं बचा। मैं बर्बाद हो गया!"
महाराज को बहुत गुस्सा आया कि उनकी राजधानी में इतनी बड़ी डकैती कैसे हो गई। उन्होंने कड़क आवाज़ में पूछा: "बाबा! तुम डरो मत। मुझे उन डाकुओं का नाम बताओ। मैं अपनी पूरी सेना लगाकर उन्हें पाताल से भी खोज निकालूँगा। किसने तुम्हें लूटा?"
सपने का सच: वृद्ध आदमी ने हाथ जोड़कर कहा: "महाराज! मुझे लूटने वाले डाकू कोई और नहीं, बल्कि स्वयं आप और आपके सेनापति थे! कल रात आप लोग तलवारें लेकर मेरे घर घुसे और मेरा सारा खज़ाना लूट कर ले गए!"
यह सुनते ही महाराज का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने गरजते हुए कहा: "क्या बकवास कर रहे हो बाबा? तुम्हारी अक्ल तो घास चरने नहीं गई? कल रात तो मैं अपने महल में सो रहा था! मैं तुम्हें लूटने क्यों जाऊँगा? यह डकैती कब और कहाँ हुई?"
वृद्ध आदमी ने अत्यंत मासूमियत से कहा: "महाराज! यह डकैती कल रात मेरे 'सपने' में हुई थी! मैंने सपने में बिल्कुल साफ देखा था कि आपने मुझे लूटा है। इसलिए आप मुझे मेरा खज़ाना वापस लौटा दें।"
महाराज ने गुस्से से अपना सिर पीट लिया और ज़ोर से चिल्लाए: "अरे मूर्ख इंसान! क्या तू पागल हो गया है? जो चीज़ इंसान 'सपने' में देखता है, वह कभी हकीकत नहीं होती! सपने में घटी हुई घटना का वास्तविकता से क्या लेना-देना? तू सपने की बात को सच मानकर न्याय मांगने चला आया?"
तेनालीरामा का पर्दाफाश: तभी उस वृद्ध आदमी ने अपनी नकली सफेद दाढ़ी, मूंछें और फटे कपड़े उतार फेंके। उसके पीछे कोई और नहीं, बल्कि स्वयं तेनालीरामा खड़े थे!
तेनालीरामा ने मुस्कुराते हुए महाराज के सामने सिर झुकाया और अत्यंत शालीनता से कहा: "क्षमा करें महाराज! परंतु आपने अभी खुद ही कहा है कि जो चीज़ 'सपने' में देखी जाती है, वह कभी हकीकत नहीं हो सकती। तो फिर हुज़ूर... जब मेरा 'सपने में देखा गया डाकू' हकीकत नहीं हो सकता, तो फिर आपका 'सपने में देखा गया हवा और प्रकाश का महल' हकीकत में कैसे बनाया जा सकता है?"
महाराज कृष्णदेवराय यह अचूक तर्क सुनकर एकदम अवाक रह गए। उनका सारा भ्रम पल भर में टूट गया। तेनालीरामा ने महाराज के ही शब्दों (तर्क) का इस्तेमाल करके उन्हें आईना दिखा दिया था।
महाराज ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे और बोले: "तेनाली! तुम सचमुच लाजवाब हो। तुमने मुझे एक बहुत बड़ी भूल करने से बचा लिया।" महाराज ने अपना वह असंभव फरमान तुरंत वापस ले लिया और दरबार के सभी मंत्रियों की जान में जान आई।
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