सबसे सुंदर बच्चा — प्रेम का मनोविज्ञान और एक माँ की नज़र

एक दिन शहंशाह अकबर और बीरबल महल के छज्जे पर खड़े होकर शाही बाग का नज़ारा देख रहे थे। बाग में शहंशाह का छोटा पोता (राजकुमार) अपने रेशमी कपड़ों और गहनों से लदा हुआ खेल रहा था। राजकुमार सचमुच बहुत प्यारा और सुंदर लग रहा था।
अकबर ने राजकुमार को निहारते हुए बड़े गर्व से कहा: "बीरबल! ज़रा देखो तो, मेरा पोता कितना खूबसूरत है। मुझे लगता है कि मुग़ल खानदान के बच्चे ही दुनिया में सबसे सुंदर होते हैं। वैसे बीरबल, तुम्हारी नज़र में संसार का 'सबसे सुंदर बच्चा' कौन है?"
बीरबल का मनोवैज्ञानिक जवाब: बीरबल ने शहंशाह के इस अहंकार को भांप लिया। उन्होंने बड़ी शालीनता से जवाब दिया: "जहाँपनाह! राजकुमार बेशक बहुत सुंदर हैं। परंतु संसार के 'सबसे सुंदर बच्चे' की कोई एक तस्वीर नहीं होती। असल में, खूबसूरती किसी चेहरे या रेशमी कपड़ों में नहीं होती, बल्कि देखने वाले की नज़र में होती है। और हुज़ूर, दुनिया की हर माँ के लिए उसका अपना बच्चा ही संसार का 'सबसे सुंदर बच्चा' होता है!"
अकबर को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। उन्होंने अपनी ज़िद पकड़ ली और कहा: "यह तुम क्या दार्शनिक बातें कर रहे हो? सुंदरता तो सामने दिखाई देती है। जो बच्चा सुंदर है, वह सबको सुंदर लगेगा। मैं तुम्हारी इस बात को नहीं मानता। मैं तुम्हें हुक्म देता हूँ कि तुम पूरे आगरा शहर में घूमो और जो बच्चा तुम्हें 'संसार का सबसे सुंदर बच्चा' लगे, उसे कल मेरे दरबार में लेकर आओ!"
बीरबल ने सिर झुकाकर शहंशाह का आदेश स्वीकार कर लिया।
सबसे सुंदर बच्चे की तलाश: अगले दिन सुबह-सुबह, बीरबल उस 'सबसे सुंदर बच्चे' को लेकर दीवान-ए-खास में हाज़िर हुए।
पूरा दरबार बड़ी उत्सुकता से इंतज़ार कर रहा था कि बीरबल ज़रूर किसी बड़े नवाब या अमीर का बच्चा लाए होंगे, जिसकी त्वचा दूध जैसी गोरी और आंखें नीली होंगी।
परंतु जब बीरबल ने उस बच्चे को दरबार में पेश किया, तो सबको एक बड़ा झटका लगा। वह कोई शाही बच्चा नहीं था। वह एक बहुत ही गरीब मज़दूर का बच्चा था। उसका रंग एकदम पक्का (सांवला/काला) था, उसके बाल उलझे हुए थे, उसके शरीर पर फटे-पुराने कपड़े थे और उसके गालों पर मिट्टी लगी हुई थी। बच्चा दरबार की भीड़ देखकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा।
शहंशाह का क्रोध: उस बच्चे को देखकर पूरा दरबार ठहाके लगाकर हंसने लगा। मुल्ला दो प्याज़ा ने कहा, "क्या बीरबल की आंखें खराब हो गई हैं?"
अकबर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उन्होंने गरजते हुए कहा: "बीरबल! क्या तुम मेरा मज़ाक उड़ा रहे हो? मैंने तुमसे आगरा का सबसे सुंदर बच्चा लाने को कहा था, और तुम इस मैले-कुचैले और रोते हुए बच्चे को उठा लाए? इसमें तुम्हें कौन सी सुंदरता नज़र आ गई?"
बीरबल बिल्कुल शांत रहे। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, "जहाँपनाह! थोड़ा सब्र रखिए। इस बच्चे की असली सुंदरता को परखने वाला जौहरी बस आता ही होगा।"
एक माँ की नज़र: तभी दरबार के दरवाज़े पर एक भारी हंगामा हुआ। महल के पहरेदारों से लड़ती-झगड़ती, एक गरीब और बदहवास सी औरत दौड़ती हुई दरबार के बीचों-बीच आ पहुँची। वह उस रोते हुए बच्चे की माँ थी!
औरत ने न तो शहंशाह को देखा और न ही दरबारियों को। वह सीधे उस बच्चे के पास गई, उसे अपने गले से लगा लिया और उसकी मिट्टी से सनी हुई हथेलियों और गालों को चूमने लगी।
वह औरत रोते हुए अपने बच्चे से कहने लगी: "मेरे लाल! मेरे चांद! मेरी आंखों के तारे! तू कहाँ चला गया था? मेरी तो जान ही निकल गई थी। तुझसे ज़्यादा सुंदर और प्यारा इस दुनिया में मेरे लिए कुछ भी नहीं है। किसी की बुरी नज़र न लगे मेरे राजकुमार को!"
वह गरीब औरत अपने सांवले और मिट्टी से सने बच्चे को ऐसे चूम रही थी, जैसे उसे दुनिया का सबसे अनमोल खज़ाना मिल गया हो। उसके बाद उसने गुस्से से पूरे दरबार और अकबर की ओर देखा और कहा, "किसने मेरे फूल जैसे बच्चे को रुलाया?"
बीरबल का तार्किक निष्कर्ष: बीरबल ने मुस्कुराते हुए अकबर की ओर देखा और कहा: "जहाँपनाह! आपने इस माँ के शब्द सुने? इसने अपने बच्चे को 'चांद' और 'फूल' कहा। आपके और इन दरबारियों के लिए यह बच्चा मैला और बदसूरत हो सकता है, परंतु इस माँ की आंखों में देखिए—इसके लिए इसका बच्चा मुग़ल सल्तनत के किसी भी राजकुमार से लाख गुना ज़्यादा सुंदर है!"
बीरबल ने आगे कहा: "हुज़ूर! मैंने कल भी यही कहा था और आज मैंने साबित कर दिया। सुंदरता कभी रंग, रूप या कपड़ों में नहीं होती। सुंदरता तो 'प्रेम' में होती है। जिस नज़र में प्रेम होता है, उसे वही चीज़ दुनिया में सबसे सुंदर लगती है!"
शहंशाह अकबर अवाक रह गए। बीरबल ने इंसान के मनोविज्ञान का इतना बड़ा सत्य इतने सरल तरीके से उनके सामने रख दिया था। अकबर का सारा अहंकार टूट गया। उन्होंने उस माँ और बच्चे को बहुत सारे सोने के सिक्के और नए कपड़े देकर ससम्मान विदा किया और बीरबल की इस गहरी सोच की दिल खोलकर तारीफ की।
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