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😄 शेखचिल्ली

खुद ही मुर्गी बन गया (अंडे सेने की ज़िद)

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
खुद ही मुर्गी बन गया (अंडे सेने की ज़िद)

शेख चिल्ली को जानवरों और पक्षियों से बहुत लगाव था। उसने अपने घर के आँगन में एक बहुत ही सुंदर और मोटी-ताज़ी मुर्गी पाल रखी थी। शेख उस मुर्गी का बहुत ख्याल रखता था।

कुछ समय बाद, उस मुर्गी ने अंडों पर बैठना शुरू किया। उसने घोंसले में दस-बारह बहुत ही सफेद और सुंदर अंडे दिए। शेख चिल्ली हर रोज़ उन अंडों को देखकर खुश होता कि जल्दी ही उसके घर में छोटे-छोटे प्यारे चूज़े दौड़ेंगे।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। एक रात गाँव में एक जंगली बिल्ली घुस आई और उसने शेख चिल्ली की उस प्यारी मुर्गी का शिकार कर लिया।

अगली सुबह जब शेख चिल्ली उठा, तो उसने घोंसले में मुर्गी को नहीं पाया। वहाँ सिर्फ कुछ पंख बिखरे हुए थे और वे दस-बारह अंडे वैसे ही लावारिस पड़े थे। शेख चिल्ली बहुत दुखी हुआ। वह उन अंडों के पास बैठकर रोने लगा कि अब इन बेचारों का क्या होगा।

शेख चिल्ली की पत्नी ने जब उसे रोते हुए देखा, तो वह बोली, "अरे शेख! जो होना था सो हो गया। अब इन अंडों को उठाकर फेंक दो या फिर ऑमलेट बना लो। बिना मुर्गी के अब इन अंडों में से चूज़े कभी बाहर नहीं आ सकते।"

शेख चिल्ली ने चौंककर पूछा, "क्यों? अंडों में से चूज़े बाहर क्यों नहीं आ सकते?"

पत्नी ने समझाते हुए कहा, "अरे सीधे इंसान! अंडे अपने आप नहीं फूटते। मुर्गी को हफ्तों तक अंडों के ऊपर बैठकर उन्हें अपने शरीर की 'गर्मी' देनी पड़ती है। जब अंडों को लगातार गर्माहट मिलती है, तभी उनके अंदर चूज़े पनपते हैं और बाहर आते हैं। अब मुर्गी ही नहीं रही, तो इन्हें गर्मी कौन देगा?"

शेख चिल्ली ने पत्नी की बात बहुत ध्यान से सुनी। उसके दिमाग के पहिए घूमने लगे। उसने सोचा कि बात तो बिल्कुल सही है, अंडों को सिर्फ 'गर्मी' की ही तो ज़रूरत है। अगर मुर्गी नहीं है, तो क्या हुआ? यह काम तो कोई भी कर सकता है जिसके शरीर में गर्मी हो!

शेख चिल्ली ने एक बहुत ही 'महान' फैसला लिया।

जब उसकी पत्नी किसी काम से पड़ोस में गई, तो शेख चिल्ली ने घर का एक बहुत बड़ा 'बाँस का टोकरा' उठाया। वह आँगन के उस कोने में गया जहाँ अंडे रखे थे। उसने अंडों को बड़े प्यार से एक जगह इकट्ठा किया, और फिर उन अंडों के ठीक ऊपर 'मुर्गी की तरह उकड़ूँ बैठकर' उन्हें सेने लगा!

उसने खुद को और अंडों को उस बड़े से बाँस के टोकरे से पूरी तरह ढक लिया ताकि उसके शरीर की गर्मी बाहर न जाए। वह टोकरे के अंदर बिल्कुल शांत होकर, मुर्गी की तरह आवाज़ें निकालने लगा— "कुक-ड़ू-कुक... कुक-ड़ू-कुक!"

कुछ घंटों बाद शेख चिल्ली की पत्नी घर वापस लौटी। उसने पूरे घर में शेख को ढूँढा, लेकिन वह कहीं नज़र नहीं आया। तभी उसकी नज़र आँगन के कोने में उल्टे रखे उस बड़े से टोकरे पर पड़ी। टोकरे के अंदर से अजीब सी आवाज़ें आ रही थीं— "कुट-कुट-कुट... कुक-ड़ू!"

पत्नी घबरा गई। उसने सोचा कि शायद कोई बड़ा जानवर घर में घुस आया है। उसने एक डंडा उठाया और सावधानी से उस बाँस के टोकरे को झटके से हटा दिया।

टोकरी हटते ही जो नज़ारा सामने था, उसे देखकर पत्नी की आँखें फटी की फटी रह गईं।

उसका हट्टा-कट्टा शौहर, शेख चिल्ली, अंडों के ऊपर बिल्कुल एक मुर्गी की तरह दुबक कर बैठा था और अपने मुँह से मुर्गी जैसी आवाज़ें निकाल रहा था!

पत्नी ने अपना माथा पीट लिया और झल्लाते हुए चिल्लाई, "अरे अल्लाह के बंदे! यह क्या पागलपन है? तुम इन अंडों के ऊपर ऐसे उकड़ूँ क्यों बैठे हो? उठो यहाँ से, वरना सारे अंडे टूट जाएँगे!"

शेख चिल्ली ने बिल्कुल नहीं हिला। उसने मुर्गी की तरह अपनी गर्दन हिलाई और बहुत ही गंभीरता से जवाब दिया:

"चुप रहो बेगम! मुझे डिस्टर्ब मत करो। तुम ही ने तो कहा था कि इन अंडों को चूज़े बनने के लिए 'गर्मी' की ज़रूरत है। बेचारी मुर्गी तो रही नहीं, इसलिए अब मैं इन अंडों की माँ बन गया हूँ। मेरे शरीर में मुर्गी से भी ज़्यादा गर्मी है। तुम बस मेरे खाने-पीने का सामान यहीं टोकरी के पास रख देना, क्योंकि जब तक इन अंडों में से चूज़े बाहर नहीं आ जाते, मैं अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिलूँगा!"

पत्नी यह सुनकर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी। गाँव के लोग भी यह तमाशा देखने इकट्ठे हो गए। सबने शेख चिल्ली को बहुत समझाया कि इंसान के बैठने से अंडे नहीं फूटते, लेकिन शेख चिल्ली अपनी ज़िद पर अड़ा रहा और खुद मुर्गी बनकर घंटों उन अंडों को सेता रहा!

🎉 कहानी समाप्त

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