तीन बेटे और 17 हीरों का गणित — बंटवारे की जादुई पहेली

विजयनगर के एक छोटे से गाँव में एक बहुत ही अमीर और समझदार व्यापारी रहता था। उसके पास कुल मिलाकर 17 बहुत ही बड़े और अनमोल हीरे थे।
जब वह व्यापारी मृत्यु शय्या पर था, तो उसने अपने तीन बेटों को बुलाया और एक वसीयत लिखकर उनके हाथ में दी। वसीयत में लिखा था:
"मेरे सबसे बड़े बेटे को मेरे हीरों का आधा हिस्सा (1/2) दिया जाए।"
"मेरे मंझले (दूसरे) बेटे को हीरों का एक-तिहाई हिस्सा (1/3) दिया जाए।"
"और मेरे सबसे छोटे बेटे को हीरों का नौवां हिस्सा (1/9) दिया जाए।"
व्यापारी की मृत्यु के बाद, जब तीनों बेटों ने हीरे बांटने की कोशिश की, तो वे एक भयानक गणितीय उलझन में फंस गए।
गणित की समस्या: हीरे कुल 17 थे। 17 का 'आधा' (1/2) होता है 8.5 (साढ़े आठ)। अब किसी हीरे को तोड़ा तो नहीं जा सकता था, वरना उसकी कीमत ही खत्म हो जाती। इसी तरह 17 का एक-तिहाई (1/3) और नौवां हिस्सा (1/9) भी बिना हीरों को तोड़े या काटे निकालना असंभव था।
तीनों भाइयों में भयंकर विवाद शुरू हो गया। गाँव के पंडित और सरपंच भी इस पहेली को नहीं सुलझा पाए। अंततः यह मामला महाराज कृष्णदेवराय के दरबार में लाया गया।
तेनालीरामा का जादुई गणित: महाराज ने दरबार के सभी गणितज्ञों को बुलाया, परंतु कोई भी बिना हीरे काटे यह बंटवारा नहीं कर सका। तब तेनालीरामा आगे आए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "महाराज! यह समस्या तो बहुत ही साधारण है।"
तेनालीरामा अपने घर गए और अपनी जेब से अपना खुद का 'एक हीरा' लेकर आए।
उन्होंने अपना वह हीरा उन 17 हीरों में मिला दिया। अब कुल हीरों की संख्या हो गई: 17 + 1 = 18 हीरे!
तेनालीरामा ने वसीयत पढ़ी और बंटवारा शुरू किया:
सबसे बड़े बेटे को 'आधा हिस्सा' (1/2) मिलना था: 18 का 1/2 = 9 हीरे (बड़े बेटे को दे दिए गए)
मंझले बेटे को 'एक-तिहाई' (1/3) मिलना था: 18 का 1/3 = 6 हीरे (मंझले बेटे को दे दिए गए)
सबसे छोटे बेटे को 'नौवां हिस्सा' (1/9) मिलना था: 18 का 1/9 = 2 हीरे (छोटे बेटे को दे दिए गए)
अब तेनालीरामा ने कहा, "ज़रा गिने कि कुल कितने हीरे बंटे?" सबने गिनती की: 9 + 6 + 2 = 17 हीरे!
तीनों भाइयों को उनके वसीयत के हिसाब से पूरे और बिना कटे हीरे मिल गए थे। और मेज़ पर केवल एक ही हीरा बचा था— जो तेनालीरामा का अपना हीरा था!तेनालीरामा ने शांति से अपना वह 'एक हीरा' उठाया और वापस अपनी जेब में रख लिया। तीनों भाई अपने-अपने हिस्से के हीरे पाकर बहुत खुश थे और वहाँ से जाने लगे।
पिता की वसीयत का असली रहस्य: तभी तेनालीरामा ने अपनी आवाज़ गंभीर करते हुए उन्हें रोका: "ठहरो! हीरे तो तुम्हें मिल गए, परंतु क्या तुम तीनों ने यह सोचा कि तुम्हारे चतुर और ज्ञानी पिता ने वसीयत में 17 हीरों का यह उलझा हुआ गणित जानबूझकर क्यों लिखा था?"
तीनों भाइयों ने हैरानी से एक-दूसरे की ओर देखा और सिर हिला दिया।
तेनालीरामा ने उन्हें जीवन का सबसे बड़ा सबक देते हुए समझाया: "तुम्हारे पिता बहुत दूरदर्शी थे। वे भली-भांति जानते थे कि 17 हीरों का यह बंटवारा तार्किक रूप से असंभव है। असल में, वे चाहते ही नहीं थे कि तुम तीनों भाई कभी हीरों का 'बंटवारा' करो और एक-दूसरे से अलग हो जाओ!
तेनालीरामा ने आगे कहा: "उनका असली उद्देश्य यह था कि जब तुम इन हीरों को बांट न सको, तो मजबूर होकर तुम तीनों भाई एक साथ रहो। वे चाहते थे कि तुम इस संपत्ति को टुकड़ों में बांटने के बजाय, एक साथ मिलकर इसे अपने व्यापार में लगाओ और अपनी 'एकता' को बनाए रखो। यह उलझा हुआ गणित तुम्हें अलग होने से रोकने और परिवार को जोड़े रखने की उनकी आखिरी कोशिश थी!"
यह सुनकर तीनों भाइयों की आँखें खुल गईं और उनमें आंसू आ गए। उन्हें अपने पिता की गहरी सोच और अपने स्वार्थ का एहसास हुआ। उन्होंने तुरंत वे सारे 17 हीरे वापस एक साथ मिला दिए और जीवन भर कभी अलग न होने और मिलकर व्यापार करने की कसम खाई।
पूरा दरबार तेनालीरामा की इस जादुई गणितीय सूझबूझ और पिता की भावनाओं को इतनी गहराई से समझने की कला को देखकर तालियों से गूंज उठा।
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