महाराज और भिखारी की शॉल — अहंकार और सच्चा दान

कड़ाके की सर्दियां चल रही थीं। विजयनगर में ऐसी ठंड पड़ रही थी कि लोगों का घरों से बाहर निकलना मुश्किल हो गया था। एक दिन राजदरबार में तेनालीरामा ने अपनी कुशाग्र बुद्धि से एक बहुत ही जटिल समस्या को सुलझाया। महाराजा कृष्णदेवराय अत्यंत प्रसन्न हुए।
इनाम के तौर पर महाराज ने तेनालीरामा को एक बेहद कीमती कश्मीरी शॉल भेंट की। यह शॉल असली पश्मीना की बनी थी और इसके किनारों पर सोने और चांदी के तारों से कढ़ाई की गई थी। ऐसी शॉल केवल राजघरानों के लोग ही पहन सकते थे।
तेनालीरामा ने शॉल को माथे से लगाया, महाराज को धन्यवाद दिया और शॉल ओढ़कर दरबार से बाहर निकल गए।
भिखारी की ठंड और तेनालीरामा का फैसला: जब तेनालीरामा अपने घर की ओर लौट रहे थे, तो रास्ते में उन्होंने एक मंदिर की सीढ़ियों पर एक बहुत ही बूढ़े और कमज़ोर भिखारी को देखा। उस भिखारी के शरीर पर केवल फटे-पुराने चिथड़े थे और वह ठंड के मारे बुरी तरह कांप रहा था। उसकी हालत देखकर लग रहा था कि अगर उसे गर्मी न मिली, तो वह रात भर में ही ठंड से मर जाएगा।
तेनालीरामा का हृदय दया से भर गया। उन्होंने बिना एक पल भी सोचे, अपने कंधों से वह 'शाही और कीमती शॉल' उतारी और उस कांपते हुए भिखारी को ओढ़ा दी। शॉल की गर्माहट पाते ही भिखारी की जान में जान आ गई और उसने तेनालीरामा को ढेरों दुआएं दीं।
दरबार में चुगली और राजा का क्रोध: अगले दिन महाराज कृष्णदेवराय की सवारी उसी रास्ते से गुज़री। महाराज की नज़र उस भिखारी पर पड़ी, जो वही शाही शॉल ओढ़कर मजे से बैठा था। महाराज तुरंत समझ गए कि यह वही शॉल है जो उन्होंने कल तेनालीरामा को दी थी।
महाराज का अहंकार जाग उठा। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया कि उनके सबसे प्रिय वज़ीर ने उनके शाही उपहार को एक सड़क के भिखारी को दे दिया!
उन्होंने तुरंत तेनालीरामा को दरबार में बुलवाया और गरजते हुए कहा: "तेनालीरामा! तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुमने मेरे दिए हुए उस अनमोल और शाही उपहार को एक गंदे भिखारी को दे दिया? क्या तुम्हारी नज़रों में मेरे दिए हुए इनाम की यही कीमत है? तुमने मेरा और मेरे उपहार का घोर अपमान किया है!"
सच्चे दान का अर्थ: तेनालीरामा बिल्कुल शांत रहे। उन्होंने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता और दार्शनिक भाव से कहा: "महाराज! मुझे क्षमा करें, परंतु मैंने आपके उपहार का अपमान नहीं किया, बल्कि उसकी 'कीमत' और 'सम्मान' को कई गुना बढ़ा दिया है!"
महाराज ने भृकुटी तानकर पूछा: "वह कैसे?"
तेनालीरामा ने समझाया: "महाराज! वस्त्र का असली धर्म शरीर को गर्माहट देना और जान बचाना होता है। मेरे घर में तो पहले से ही कई गर्म कपड़े और रज़ाइयां मौजूद हैं। यदि मैं उस शॉल को ले जाता, तो वह किसी संदूक में पड़ी रहती या मेरे अहंकार को बढ़ाती। परंतु उस भिखारी को इसकी सख्त ज़रूरत थी।"
तेनालीरामा ने आगे कहा: "महाराज! जब उस भिखारी ने वह शॉल ओढ़ी, तो ठंड से बचकर उसकी जान बच गई। और जान बचने के बाद, उसके दिल से जो 'दुआएं' निकलीं, वे सीधे विजयनगर के महाराजा के लिए थीं! मैंने आपकी दी हुई शॉल से, आपके लिए उस गरीब की दुआएं खरीद लीं। अब आप ही बताइए... आपके शाही उपहार का इससे बेहतर और पवित्र उपयोग और क्या हो सकता था?"
महाराज कृष्णदेवराय यह बात सुनकर निरुत्तर रह गए। उनका सारा क्रोध और अहंकार आंसुओं में पिघल गया। उन्हें एहसास हुआ कि सच्चा दान दिखावे में नहीं, बल्कि किसी की ज़रूरत पूरी करने में है। उन्होंने अपनी गद्दी से उठकर तेनालीरामा को गले लगा लिया और गरीबों के लिए कंबल बंटवाने का आदेश दे दिया।
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