तेनालीरामा और दिल्ली का सुल्तान — आम का पौधा और चतुराई की जीत

विजयनगर के तेनालीरामा की बुद्धिमत्ता और हास्य के चर्चे दक्षिण भारत से निकलकर उत्तर भारत में दिल्ली के दरबार तक पहुँच गए थे। उस समय दिल्ली के सुल्तान बाबर थे। बाबर ने तेनालीरामा से मिलने की इच्छा जताई और विजयनगर के महाराज कृष्णदेवराय को एक संदेश भेजकर तेनालीरामा को दिल्ली आमंत्रित किया।
तेनालीरामा खुशी-खुशी दिल्ली दरबार पहुँचे। परंतु सुल्तान बाबर तेनालीरामा की परीक्षा लेना चाहते थे। तेनाली के दरबार में पहुँचने से पहले ही बाबर ने अपने सभी दरबारियों को एक सख्त आदेश दे दिया था: "तेनालीरामा चाहे कितने भी अच्छे चुटकुले सुनाए या कितनी भी हास्यपूर्ण बातें करे, दरबार में कोई भी नहीं हंसेगा! जो भी हंसा, उसे कड़ी सज़ा दी जाएगी।"
दरबार में तेनालीरामा का अपमान: जब तेनालीरामा दरबार में पेश हुए, तो उन्होंने अपनी सबसे बेहतरीन और हास्यपूर्ण कविताएं और किस्से सुनाए। उन्होंने ऐसी-ऐसी बातें कीं जिन पर आम इंसान हंसते-हंसते लोटपोट हो जाए। परंतु दरबार में एकदम सन्नाटा छाया रहा। न सुल्तान हंसे, और न ही कोई दरबारी मुस्कुराया।
लगातार 15 दिनों तक तेनालीरामा रोज़ दरबार जाते और अपनी पूरी कोशिश करते, परंतु कोई नहीं हंसता। तेनालीरामा को गहरा धक्का लगा। वे समझ गए कि यह कोई सामान्य बात नहीं है, बल्कि सुल्तान ने जानबूझकर उनका मनोबल तोड़ने और विजयनगर का अपमान करने के लिए यह साज़िश रची है।
तेनालीरामा ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक अचूक योजना बनाई।
बूढ़े किसान का भेष और आम का पौधा: तेनालीरामा को पता चला कि सुल्तान बाबर रोज़ सुबह यमुना नदी के किनारे घोड़े पर सवार होकर हवा खाने जाते हैं।
अगली सुबह, तेनालीरामा ने एक बहुत ही कमज़ोर और बूढ़े किसान का भेष धारण किया। उन्होंने सफेद दाढ़ी लगाई, फटे कपड़े पहने और पीठ झुका ली। वे उस रास्ते पर पहुँच गए जहाँ से सुल्तान गुज़रने वाले थे। जब सुल्तान की सवारी करीब आई, तो वह 'बूढ़ा आदमी' (तेनाली) मिट्टी खोदकर वहाँ 'आम का एक छोटा सा पौधा' लगाने लगा।
बाबर ने जब एक इतने कमज़ोर और बूढ़े इंसान को पौधा लगाते देखा, तो वे रुक गए। उन्होंने पूछा: "बाबा! तुम्हारी उम्र इतनी अधिक हो गई है। तुम कुछ ही दिनों के मेहमान लगते हो। यह आम का पौधा तो 10-15 साल बाद फल देगा। जब तुम इसके फल खाने के लिए ज़िंदा ही नहीं रहोगे, तो इतनी मेहनत क्यों कर रहे हो?"
बूढ़े का तार्किक जवाब और मोहरों की बारिश: बूढ़े (तेनालीरामा) ने मुस्कुराकर और कांपती आवाज़ में कहा: "जहाँपनाह! मैंने बचपन से लेकर आज तक जो मीठे फल खाए हैं, वे उन पेड़ों के थे जो मेरे पूर्वजों ने लगाए थे। तो क्या अब यह मेरा फर्ज़ नहीं है कि मैं अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए पेड़ लगाऊँ?"
बाबर इस निस्वार्थ सोच से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत उस बूढ़े को इनाम में सोने की मोहरों की एक थैली दे दी।
थैली मिलते ही बूढ़े ने कहा: "देखिए जहाँपनाह! मेरा पेड़ तो कितना जादुई है। आम के पेड़ तो 15 साल बाद फल देते हैं, परंतु मेरे लगाए हुए पेड़ ने तो मुझे बोते ही 'सोने के फल' (मोहरें) दे दिए!"
बाबर इस हाज़िरजवाबी पर मुस्कुराए और खुश होकर उन्होंने एक और थैली इनाम में दे दी।
बूढ़े ने फिर कहा: "सुभान अल्लाह! दुनिया के बाकी पेड़ तो साल में केवल एक ही बार फल देते हैं, परंतु मेरे इस जादुई पेड़ ने तो मुझे एक ही दिन में 'दो बार' फल दे दिए!"
सुल्तान का ठहाका और तेनाली की पहचान: यह सुनते ही सुल्तान बाबर ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाकर हंसने लगे। वे इतना हंसे कि उनकी आँखों में आंसू आ गए।
बाबर ने अपने सेनापति से कहा, "जल्दी चलो यहाँ से! यह बूढ़ा तो अपनी बातों से ही दिल्ली का सारा खज़ाना खाली करवा देगा!"
तभी उस बूढ़े ने अपनी नकली सफेद दाढ़ी और मूंछें उतार कर फेंक दीं और महाराज के सामने झुककर सलाम किया। "जहाँपनाह! मैं ही विजयनगर का तुच्छ सेवक, तेनालीरामा हूँ। आपने मुझे हंसाने का मौका नहीं दिया, परंतु मुझे खुशी है कि मेरी इस छोटी सी कोशिश ने दिल्ली के सुल्तान के चेहरे पर मुस्कान ला दी।"
बाबर तेनालीरामा की इस अद्भुत कुशाग्र बुद्धि, धैर्य और हाज़िरजवाबी से पूरी तरह हार मान गए। उन्होंने तेनालीरामा को गले लगाया और ढेरों कीमती उपहार देकर अत्यंत सम्मान के साथ विजयनगर वापस विदा किया।
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