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🎭 तेनाली राम

सबसे बड़ा खज़ाना — अंगों की कीमत और असली दौलत का ज्ञान

लोक परंपरा — तेनालीराम5 मिनट का पठन
सबसे बड़ा खज़ाना — अंगों की कीमत और असली दौलत का ज्ञान

विजयनगर में एक रामू नाम का युवक रहता था। वह बहुत ही आलसी और निराशावादी था। वह दिन भर काम-काज करने के बजाय केवल अपनी गरीबी का रोना रोता रहता था। वह अक्सर लोगों से कहता, "भगवान बहुत अन्यायी है। उसने मुझे इतनी गरीबी में पैदा किया। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं दुनिया का सबसे बदनसीब इंसान हूँ।"

एक दिन रामू रोता हुआ तेनालीरामा के पास पहुँचा। उसने तेनालीरामा से कहा, "पंडित जी! आप तो सब जानते हैं। आप ही महाराज से कहकर मुझे कुछ धन दिलवा दीजिए। मेरे पास तो एक फूटी कौड़ी भी नहीं है। भगवान ने मुझे बिल्कुल कंगाल बनाया है।"

तेनालीरामा ने उस हट्टे-कट्टे और स्वस्थ युवक को ऊपर से नीचे तक ध्यान से देखा। वे समझ गए कि इसके भीतर गरीबी नहीं, बल्कि 'आलस' और 'निराशा' का रोग है।

तेनालीरामा का प्रस्ताव: तेनालीरामा ने अत्यंत आश्चर्य से कहा: "रामू! तुम यह कैसी बातें कर रहे हो? तुम कंगाल कैसे हो सकते हो? तुम तो विजयनगर के सबसे बड़े 'लखपति' हो! तुम्हारे पास तो लाखों सोने के सिक्कों की दौलत है।"

रामू हैरान हो गया। उसने कहा, "आप मेरा मज़ाक क्यों उड़ा रहे हैं? मेरे पास तो कल का खाना खाने के भी पैसे नहीं हैं।"

तेनालीरामा ने गंभीर होकर कहा: "मैं बिल्कुल सच कह रहा हूँ। यदि तुम्हें पैसों की इतनी ही ज़रूरत है, तो चलो मैं तुम्हारा एक सौदा करवा देता हूँ। महाराज के दरबार में एक बहुत ही अमीर व्यापारी है, जो अंधा है। उसे दो आँखों की ज़रूरत है। तुम अपनी दोनों आँखें उसे दे दो, वह तुम्हें तुरंत 10,000 सोने के सिक्के दे देगा।"

यह सुनते ही रामू घबरा गया। उसने पीछे हटते हुए कहा: "नहीं-नहीं! 10,000 तो क्या, अगर वह मुझे 1 लाख सोने के सिक्के भी दे, तो भी मैं अपनी आँखें नहीं बेचूँगा। आँखों के बिना मेरी ज़िंदगी बेकार है!"

दौलत का हिसाब: तेनालीरामा ने मुस्कुराते हुए कहा: "अच्छा, कोई बात नहीं। तो एक काम करो, तुम अपने दोनों हाथ बेच दो। एक दूसरा व्यापारी अपने कटे हुए हाथों के बदले तुम्हें 20,000 सोने के सिक्के देने को तैयार है। दे दोगे?"

रामू पसीने-पसीने हो गया। उसने ज़ोर से कहा, "पागल हो गए हैं आप? मैं 20,000 क्या, पूरी दुनिया की दौलत के लिए भी अपने हाथ नहीं काट सकता।"

तेनालीरामा ने अपना आखिरी तीर छोड़ा: "ठीक है, फिर अपने दोनों पैर दे दो। इसके बदले तुम्हें 50,000 मोहरें मिल जाएंगी!"

रामू गुस्से और घबराहट में चिल्लाया: "बस कीजिए पंडित जी! मैं अपना शरीर का कोई भी अंग किसी भी कीमत पर नहीं बेच सकता! मेरे अंग अनमोल हैं।"

तेनालीरामा का असली संदेश: तेनालीरामा ने रामू के कंधे पर हाथ रखा और अत्यंत प्रेम और गंभीरता से कहा: "रामू! तुम खुद सोचो। जिस इंसान के पास 1 लाख सोने के सिक्कों से भी ज़्यादा कीमती 'आँखें' हैं, दुनिया की दौलत से भी महंगे 'हाथ' हैं, और अनमोल 'पैर' हैं... वह इंसान गरीब और कंगाल कैसे हो सकता है?"

तेनालीरामा ने उसे जीवन का सबसे बड़ा सच समझाते हुए कहा: "ईश्वर ने तुम्हें 'एक स्वस्थ शरीर और एक स्वस्थ दिमाग' के रूप में दुनिया का सबसे बड़ा खज़ाना मुफ्त में दिया है! सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि तुम इस अनमोल खज़ाने को पहचानते नहीं हो और इसे 'आलस' की जंग लगने दे रहे हो। उठो, अपने इन अनमोल हाथों और पैरों से मेहनत करो। तुम्हारे पास जो दौलत है, वह किसी भी राजा के खज़ाने से बड़ी है।"

रामू की आँखें खुल गईं। तेनालीरामा के इस छोटे से उदाहरण ने उसकी सारी निराशा को पल भर में खत्म कर दिया। उस दिन के बाद रामू ने कभी अपनी गरीबी का रोना नहीं रोया। उसने कड़ी मेहनत करना शुरू किया और जल्द ही एक सफल और सुखी इंसान बन गया।

🎉 कहानी समाप्त

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