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📖 मुहावरों की कहानियाँ

"आ बैल मुझे मार"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"आ बैल मुझे मार"

'पहलवानपुर' गाँव में 'ज़ोरावर' नाम का एक बहुत ही मगरूर और अक्खड़ नौजवान रहता था। ज़ोरावर दिन भर अखाड़े में कसरत करता था। उसके डोले बहुत बड़े थे और उसे अपनी ताक़त का इतना ज़्यादा घमंड था कि वह चलते समय अपनी छाती किसी गुब्बारे की तरह फुला कर रखता था।

ज़ोरावर को लगता था कि पूरे गाँव में उससे ज़्यादा ताक़तवर और बहादुर इंसान कोई नहीं है। वह हमेशा लोगों के सामने अपनी बहादुरी का फालतू 'दिखावा' करने के बहाने ढूँढता रहता था।

गाँव में खूँखार साँड़ का आना: एक दोपहर, गाँव में पास के जंगल से एक बहुत ही विशाल और 'पागल साँड़' घुस आया। साँड़ के सींग बहुत ही बड़े और नुकीले थे और उसकी आँखें गुस्से से लाल थीं। साँड़ ने गाँव में थोड़ा उत्पात मचाया, लेकिन दोपहर की तेज़ गर्मी के कारण वह थक गया और गाँव की चौपाल के किनारे एक बड़े से नीम के पेड़ के नीचे जाकर 'चुपचाप आँखें बंद करके लेट गया'।

गाँव के सभी लोग उस साँड़ से बहुत डरे हुए थे। जो भी उस रास्ते से गुज़रता, वह साँड़ को सोया हुआ देखकर, दबे पाँव बिना आवाज़ किए दूसरी गली से निकल जाता था, ताकि साँड़ जाग न जाए।

तभी ज़ोरावर पहलवान अपनी छाती तानता हुआ, गले में लाल गमछा डाले उसी चौपाल पर पहुँचा। उसके कुछ चमचे (दोस्त) भी उसके साथ थे।

दिखावे की बेवकूफी: ज़ोरावर के दोस्तों ने डरे हुए स्वर में कहा: "ज़ोरावर भाई! चुपचाप यहाँ से निकल लो। वह देखो, नीम के नीचे पागल साँड़ लेटा है। अगर वह उठ गया, तो किसी की खैर नहीं।"

ज़ोरावर का झूठा अहंकार जाग उठा। उसने ज़ोर से ठहाका लगाया और अपनी जाँघ पर ताल ठोकते हुए बोला: "अरे तुम सब डरपोक हो! मैं पहलवान ज़ोरावर हूँ। मैं इस मामूली से जानवर से डर कर रास्ता बदल दूँगा? मेरी बेइज्जती हो जाएगी। तुम सब यहीं रुको, मैं अभी इस साँड़ को अपनी ताक़त दिखाता हूँ।"

ज़ोरावर अकड़ता हुआ उस 'शांति से सो रहे' साँड़ के बिल्कुल पास चला गया। उसने ज़मीन से एक कंकड़ उठाया और जानबूझकर साँड़ के सिर पर मार दिया। साँड़ ने आँखें खोलीं और फुफकारते हुए ज़ोरावर की तरफ देखा।

लेकिन ज़ोरावर यहीं नहीं रुका! अपनी और ज़्यादा ताक़त दिखाने के लिए, उसने अपना लाल गमछा हवा में लहराया और साँड़ की पीठ पर एक ज़ोरदार 'लात' मार दी और चिल्लाया: "उठ रे जानवर! ज़ोरावर से मुकाबला कर!"

मुसीबत का गले पड़ना: लात पड़ते ही साँड़ का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया! वह एक झटके में खड़ा हुआ। उसने अपने खुरों से ज़मीन की मिट्टी उड़ाई, एक भयानक डरावनी आवाज़ निकाली और अपने नुकीले सींग आगे करके ज़ोरावर की तरफ पूरी रफ़्तार से 'दौड़ पड़ा'।

ज़ोरावर ने जब साँड़ का यह खौफनाक और विशाल रूप देखा, तो उसकी सारी पहलवानी और ताक़त हवा পরিচয় हो गई! उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

"बचाओऽऽऽ!" चिल्लाता हुआ ज़ोरावर अपनी जान बचाने के लिए गाँव की गलियों में अंधाधुंध भागने लगा।

साँड़ उसके पीछे हाथ-धोकर (बल्कि सींग धोकर) पड़ गया था। ज़ोरावर भागते-भागते कीचड़ में गिरा, उसके कपड़े फट गए, उसके घुटने छिल गए, लेकिन साँड़ ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। अंत में ज़ोरावर को अपनी जान बचाने के लिए एक बहुत ऊँचे पेड़ पर बंदर की तरह चढ़ना पड़ा। साँड़ नीचे खड़ा होकर पेड़ पर टक्कर मारता रहा।

ज़ोरावर के दोस्त सुरक्षित दूरी से यह सब नज़ारा देख रहे थे और ज़ोर-ज़ोर से हँस रहे थे। एक बुजुर्ग ने हँसते हुए कहा: "अरे मूर्ख ज़ोरावर! साँड़ तो आराम से सो रहा था, वह किसी को कुछ नहीं कह रहा था। तूने खुद जाकर अपनी बहादुरी दिखाने के चक्कर में उसे जगाया और लात मारी। तेरी इस बेवकूफी को ही कहते हैं— 'आ बैल... मुझे मार!'" (यानी जानबूझकर मुसीबत को दावत देना)।

पेड़ पर लटके हुए ज़ोरावर को अपनी पहलवानी और दिखावे पर बहुत भारी पछतावा हो रहा था।

🎉 कहानी समाप्त

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