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"चिराग तले अँधेरा"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"चिराग तले अँधेरा"

'विद्यापुर' गाँव में एक बहुत ही महान और ज्ञानी शिक्षक रहते थे, जिनका नाम था 'गुरु ज्ञानदास'। गुरु जी का ज्ञान पूरे इलाके में मशहूर था। वे गाँव के बाहर एक बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे अपना गुरुकुल चलाते थे। आस-पास के दस गाँवों से बच्चे उनके पास पढ़ने और अच्छे संस्कार सीखने आते थे।

गुरु ज्ञानदास दिन भर बच्चों को वेद, गणित और जीवन की अच्छी बातें सिखाते थे। वे पूरे गाँव के लिए 'ज्ञान के दीपक' के समान थे।

ज्ञानी का अज्ञानी बेटा: लेकिन भगवान का खेल भी अजीब होता है। गुरु ज्ञानदास का अपना एक सगा बेटा था, जिसका नाम था 'भोंदू'। भोंदू शरीर से तो बहुत हट्टा-कट्टा था, लेकिन दिमाग से बिल्कुल 'पैदल' था।

जबकि गुरु जी दूसरों के बच्चों को ज्ञान दे रहे होते, भोंदू दिन भर केवल सोता रहता या फिर गाँव में आवारागर्दी करता। उसने आज तक किसी किताब को हाथ नहीं लगाया था। उसे न तो अक्षर ज्ञान था और न ही दुनियादारी की कोई समझ। गुरु जी ने उसे पढ़ाने की बहुत कोशिश की, लेकिन भोंदू के दिमाग में कुछ घुसता ही नहीं था।

मूर्खता का प्रदर्शन: एक दिन गुरु ज्ञानदास किसी काम से शहर गए हुए थे। गुरुकुल की छुट्टी थी। भोंदू अपनी चौपाल पर आराम से बैठा एक बड़ा सा अमरूद खा रहा था।

तभी गाँव में डाकघर का पोस्टमैन आया। पोस्टमैन के हाथ में एक ज़रूरी सरकारी चिट्ठी थी। उसने भोंदू को देखा और सोचा कि यह तो इतने बड़े और ज्ञानी गुरु जी का बेटा है, इसे तो सब पढ़ना आता ही होगा।

पोस्टमैन ने भोंदू के हाथ में चिट्ठी दी और कहा: "भोंदू भाई! ज़रा यह चिट्ठी पढ़कर बताना कि इसमें गाँव के सरपंच के लिए क्या संदेश आया है? मुझे चश्मा लगाना पड़ेगा।"

भोंदू ने अमरूद खाना छोड़ा और बड़े ही गर्व से वह चिट्ठी अपने हाथ में पकड़ ली। उसने चिट्ठी को बिल्कुल 'उल्टा' पकड़ लिया और बहुत ही गंभीर चेहरा बनाकर उसे घूरने लगा।

भोंदू ने कागज़ की उल्टी लकीरों को देखकर अपना सिर हिलाया और बहुत ही दुख भरी आवाज़ में बोला: "अरे रे! बहुत ही बुरी खबर है पोस्टमैन भाई। चिट्ठी में लिखा है कि कल रात शहर में 'आसमान नीचे गिर गया' है और सारे तारे ज़मीन पर बिखर गए हैं!"

पोस्टमैन यह बेतुकी और मूर्खतापूर्ण बात सुनकर हक्का-बक्का रह गया। तभी गाँव के सरपंच वहाँ आ गए। सरपंच ने जब भोंदू के हाथ में चिट्ठी उल्टी देखी और उसकी बात सुनी, तो वे ज़ोर से अपना माथा पीट कर हँसने लगे।

सरपंच ने पोस्टमैन से कहा: "अरे पोस्टमैन भाई! तुम किस गधे से चिट्ठी पढ़वा रहे हो? यह गुरु ज्ञानदास जी का बेटा ज़रूर है, लेकिन इसे 'काला अक्षर भैंस बराबर' भी नहीं आता। यह तो दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख है।"

पोस्टमैन ने हैरानी से कहा: "सरपंच जी! मुझे तो यकीन नहीं हो रहा। गुरु जी तो पूरे इलाके में ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं, उनका अपना सगा बेटा इतना बड़ा अनपढ़ कैसे हो सकता है?"

सरपंच जी ने मुस्कुराते हुए एक बहुत ही गहरी बात कही: "भाई! तुमने रात के समय जलता हुआ 'दीपक' देखा है? वह दीपक अपनी लौ से पूरे कमरे में चारों तरफ खूब रोशनी फैलाता है, लेकिन ठीक उस 'दीपक के अपने ही नीचे' हमेशा एक गाढ़ा और काला 'अँधेरा' बना रहता है। गुरु जी की हालत भी बिल्कुल वैसी ही है। वे दुनिया को तो ज्ञान बाँट रहे हैं, लेकिन उनके अपने ही घर में अज्ञानता है। इसे ही कहते हैं— 'चिराग तले... अँधेरा!'"

🎉 कहानी समाप्त

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