"सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है"

'आनंदपुर' गाँव में 'सेठ मगनलाल' नाम का एक बहुत ही रईस व्यापारी रहता था। सेठ जी का महल गाँव के सबसे ऊँचे और सुंदर हिस्से में बना था। उनके महल के चारों तरफ एक बहुत ही विशाल और 'हरा-भरा बागीचा' था। नौकर दिन भर उस बागीचे में पानी डालते थे, जिससे वहाँ हमेशा मखमली घास और खिले हुए फूल रहते थे।
सेठ मगनलाल अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी उस महल की चारदीवारी से बाहर नहीं निकले थे। उन्हें बाहर की दुनिया का कोई ज्ञान नहीं था। उनके लिए दुनिया उतनी ही थी, जितनी उन्हें अपनी खिड़की से दिखाई देती थी।
गाँव में भयंकर अकाल: एक साल, आनंदपुर गाँव में बिल्कुल भी बारिश नहीं हुई। भयंकर 'अकाल' पड़ गया। गाँव के तालाब सूख गए, खेतों की ज़मीन फट गई और सारी फसलें जलकर राख हो गईं। गाँव के जानवरों को खाने के लिए एक तिनका तक नहीं मिल रहा था और गरीब किसान भूख से तड़पने लगे।
लेकिन सेठ मगनलाल के महल में कोई कमी नहीं थी। उनके पास एक बहुत गहरा निजी कुआँ था, जिससे उनके बागीचे में रोज़ पानी दिया जाता था और उनकी घास वैसी ही 'हरी' थी।
गाँव के कुछ गरीब किसान रोते हुए मदद माँगने सेठ जी के महल में पहुँचे। किसानों ने हाथ जोड़कर कहा: "सेठ जी! भगवान के लिए कुछ कर्ज़ा दे दीजिए। पूरे गाँव में अकाल पड़ गया है। हमारी फसलें सूख गई हैं और हमारे जानवरों के पास खाने के लिए 'घास का एक तिनका' भी नहीं बचा है। हम भूख से मर रहे हैं।"
अमीर सेठ की अज्ञानता: सेठ मगनलाल अपने नरम गद्देदार सोफे पर बैठे हुए ताज़े अंगूर खा रहे थे। उन्होंने अपनी खिड़की से बाहर अपने उस हरे-भरे बागीचे की तरफ देखा।
सेठ जी ने हँसते हुए और बहुत ही हैरानी से कहा: "अरे तुम लोग कैसे मूर्ख और झूठे इंसान हो? कहाँ है सूखा? कौन सा अकाल? ज़रा मेरी खिड़की से बाहर देखो! हर तरफ कितनी सुंदर और 'हरी-हरी घास' उगी हुई है। पेड़ फलों से लदे हुए हैं। अगर तुम्हारे पास अनाज नहीं है, तो तुम लोग बागीचे से यह 'हरी घास और ताज़े फल' क्यों नहीं खा लेते? तुम लोग बस कामचोर हो और मुझसे पैसे ऐंठने आए हो!"
(यह बिल्कुल उस विदेशी रानी 'मैरी एंटोनेट' जैसी बात थी, जिसने कहा था कि अगर रोटी नहीं है तो केक क्यों नहीं खाते!)
सेठ जी की यह मूर्खतापूर्ण और बेतुकी बात सुनकर किसान सन्न रह गए। उनका पेट भूख से जल रहा था और यह सेठ उन्हें घास खाने की सलाह दे रहा था।
तभी गाँव के समझदार सरपंच वहाँ आ गए। उन्होंने किसानों को बाहर भेजा और सेठ मगनलाल से कहा: "सेठ जी! इसमें आपकी कोई गलती नहीं है। आप जीवन भर इस सुख-सुविधा और अपने इस 'कृत्रिम हरे बागीचे' में कैद रहे हैं। आपने कभी बाहर की सूखी और फटी हुई ज़मीन देखी ही नहीं। आपकी हालत तो बिल्कुल वैसी ही है जैसे— 'सावन के अंधे को, हरा ही हरा सूझता है!'"
(यानी अगर कोई इंसान 'सावन' के महीने में अंधा हो जाए, जब हर तरफ हरियाली होती है, तो उसे उम्र भर यही लगता रहता है कि दुनिया हमेशा 'हरी' ही रहती है, चाहे बाहर कितना भी भयंकर पतझड़ या सूखा क्यों न आ जाए)।
सरपंच की यह बात सुनकर सेठ मगनलाल को थोड़ा अहसास हुआ। फिर सरपंच उन्हें ज़बरदस्ती महल के बाहर ले गए और जब सेठ जी ने गाँव की सूखी ज़मीन देखी, तब जाकर उनका भ्रम टूटा और उन्होंने किसानों की मदद की।
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