"आम के आम, गुठलियों के दाम"

'रतनपुर' गाँव में 'चतुरसेन' नाम का एक बहुत ही होशियार और समझदार किसान रहता था। चतुरसेन के पास एक बहुत बड़ा 'आम का बागीचा' था, जिसमें गर्मियों के मौसम में बहुत ही रसीले और मीठे 'दशहरी आम' लगते थे।
गर्मियों का मौसम आया और बागीचे के सारे पेड़ पीले-पीले और रसीले आमों से लद गए। चतुरसेन ने शहर से एक बड़े फल व्यापारी को बुलाया।
व्यापारी ने आमों की मिठास चखी और बहुत खुश होकर चतुरसेन से कहा: "चतुरसेन भाई! तुम्हारे आम बहुत ही शानदार हैं। मैं पूरा बागीचा दस हज़ार रुपये में खरीदता हूँ। कल मैं अपने मज़दूरों को भेजकर सारे आम तुड़वा लूँगा।" चतुरसेन ने खुशी-खुशी सौदा पक्का कर लिया।
चतुरसेन का नया दिमाग: अगले दिन व्यापारी के मज़दूर आए और उन्होंने सारे आम तोड़कर ट्रकों में भर लिए। लेकिन बागीचे में ज़मीन पर अभी भी सैकड़ों ऐसे आम पड़े थे जो या तो पक्षियों ने खा लिए थे, या जो बहुत ज़्यादा पक कर टूट गए थे, और बहुत सारी 'आम की गुठलियाँ' ज़मीन पर बिखरी पड़ी थीं।
व्यापारी ने उन बेकार गुठलियों और कटे-फटे आमों को वहीं छोड़ दिया क्योंकि वे बाज़ार में नहीं बिक सकते थे।
चतुरसेन ने जब उन गुठलियों को देखा, तो उसके चतुर दिमाग में एक बहुत ही शानदार तरकीब आई। उसने सोचा, "ये गुठलियाँ बेकार क्यों जाएँ? इनमें भी बहुत गुण होते हैं।"
दोहरा मुनाफ़ा: चतुरसेन ने अपने गाँव के कुछ गरीब लड़कों को थोड़े से पैसे देकर बागीचे की सफाई करवाई और ज़मीन पर पड़ी सारी 'गुठलियाँ' इकट्ठा करवा लीं। उसके पास गुठलियों की कई बोरियाँ भर गईं।
चतुरसेन ने उन सारी गुठलियों को कई दिनों तक तेज़ धूप में अच्छे से सुखाया। फिर उसने उन्हें तोड़ा और अंदर के बीज को निकालकर चक्की में पीसकर उसका बहुत ही बारीक 'चूर्ण' बना लिया।
आयुर्वेद में आम की गुठली का चूर्ण पेट की बीमारियों (जैसे दस्त और हाज़मा) के लिए बहुत अच्छी दवा माना जाता है।
चतुरसेन ने उस चूर्ण को छोटी-छोटी पुड़ियों में बाँधा और पास के एक बड़े शहर में जाकर 'वैद्यों और पंसारी की दुकानों' पर बेच दिया। शहर के वैद्यों ने वह चूर्ण बहुत ही ऊँची कीमत पर खरीदा। चतुरसेन को उन बेकार गुठलियों के चूर्ण से 'पाँच हज़ार रुपये' की अतिरिक्त कमाई हो गई!
शाम को जब चतुरसेन खुशी-खुशी पैसे गिनते हुए अपने घर लौट रहा था, तो रास्ते में उसे गाँव का सरपंच मिला। सरपंच ने पूछा: "क्यों चतुरसेन! आज बहुत खुश लग रहे हो? आम तो तुमने पहले ही बेच दिए थे, अब यह पैसों की थैली कहाँ से आई?"
चतुरसेन ने मुस्कुराते हुए अपनी सूखी गुठलियों से चूर्ण बनाने और उसे बेचने की पूरी कहानी सरपंच को सुना दी।
सरपंच ने ज़ोर से ठहाका लगाया और चतुरसेन की पीठ थपथपाते हुए कहा: "वाह चतुरसेन! तुम्हारी बुद्धिमानी की तो दाद देनी पड़ेगी। तुमने आम बेचकर तो पैसे कमाए ही, लेकिन जो 'गुठलियाँ' लोग कूड़े में फेंक देते हैं, तुमने उनसे भी पैसे बना लिए! तुमने तो इस कहावत को बिल्कुल सच साबित कर दिया— 'आम के आम, और गुठलियों के दाम!' (यानी दोहरा और पूरा-पूरा लाभ कमाना)।"
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