"सौ सुनार की, एक लोहार की"

एक बाज़ार में दो दुकानें अगल-बगल में थीं। एक दुकान थी 'कुंदन सुनार' की, जो सोने-चाँदी के बारीक ज़ेवर बनाता था। दूसरी दुकान थी 'मंगल लोहार' की, जो लोहे के भारी औज़ार (जैसे कुल्हाड़ी और फावड़े) बनाता था।
कुंदन सुनार शरीर से बहुत दुबला-पतला और स्वभाव से बहुत ही 'बड़बोला और चालाक' था। वहीं मंगल लोहार का शरीर बहुत ही गठीला और ताक़तवर था, लेकिन वह स्वभाव से बहुत ही 'शांत और कम बोलने वाला' इंसान था।
कुंदन सुनार जब अपने सोने के ज़ेवर बनाता, तो अपनी बहुत ही छोटी सी हथौड़ी से धीरे-धीरे चोट करता— "टिक... टिक... टिक..."। वहीं दूसरी तरफ, मंगल लोहार जब लाल-गर्म लोहे को पीटता, तो वह अपना बीस किलो का भारी 'घन' (Sledgehammer) उठाता और ज़ोर से लोहे के निहाई (Anvil) पर मारता— "धड़ाम!"
सुनार का रोज़ का मज़ाक: कुंदन सुनार को मंगल लोहार का शांति से काम करना बिल्कुल पसंद नहीं था। कुंदन रोज़ मंगल को अपनी बातों से परेशान करता और उसका मज़ाक उड़ाता।
कुंदन अपनी छोटी सी हथौड़ी दिखाते हुए हँसता और कहता: "अरे मंगल! तू दिन भर पसीने में नहाकर गधे की तरह लोहे पर हथौड़े मारता है। ज़रा मुझे देख! मैं कितनी नज़ाकत से 'टिक-टिक' करता हूँ और तुझसे ज़्यादा पैसे कमाता हूँ। तेरे अंदर दिमाग नहीं है, तू बस एक बेवकूफ़ और भारी-भरकम इंसान है। मैं चाहूँ तो अपनी इस छोटी सी हथौड़ी और तेज़ दिमाग से तुझे दिन में तारे दिखा दूँ।"
मंगल लोहार सब कुछ सुनता, लेकिन कोई जवाब नहीं देता। वह बस अपनी भट्ठी में लोहा गर्म करता रहता। मंगल की इस खामोशी को कुंदन ने उसकी 'कमज़ोरी' समझ लिया और रोज़ उसे और ज़्यादा तंग करने लगा।
लोहार का जवाब: एक दिन कुंदन सुनार ने अपनी सारी हदें पार कर दीं। उसने जानबूझकर अपना कूड़ा मंगल लोहार की भट्ठी के सामने फेंक दिया और उसे गालियाँ देने लगा।
कुंदन ने अपनी छोटी सी हथौड़ी हवा में लहराते हुए कहा: "तूने सुना नहीं बेवकूफ़ लोहार! आज मैं तुझे अपनी इस हथौड़ी से सबक सिखाऊँगा। मैं सौ बार वार करूँगा, तू देखता रह जाएगा।"
इस बार मंगल लोहार की बर्दाश्त की सीमा टूट गई। वह भट्ठी से उठा। उसकी आँखें गुस्से से लाल थीं और उसका पसीने से भीगा हुआ चौड़ा सीना लोहे की तरह चमक रहा था।
मंगल ने कुंदन की तरफ कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना वह 'बीस किलो का भारी घन' (Sledgehammer) दोनों हाथों से उठाया। मंगल ने कुंदन की उस मेज़ की तरफ देखा जिस पर कुंदन अपना सारा काम करता था।
मंगल ने पूरे ज़ोर से वह भारी हथौड़ा हवा में घुमाया और कुंदन की उस मेज़ के ठीक बीचों-बीच दे मारा— "भड़ामऽऽऽ!"
आवाज़ इतनी भयानक थी कि पूरा बाज़ार गूँज उठा! कुंदन की मेज़ एक ही वार में टूटकर बीच में से 'दो टुकड़ों' में फट गई। कुंदन का सारा घमंड चूर-चूर हो गया और वह डर के मारे काँपता हुआ ज़मीन पर गिर पड़ा। उसकी वह छोटी सी हथौड़ी कहीं दूर जाकर गिरी।
मंगल लोहार ने अपना भारी हथौड़ा अपने कंधे पर रखा और बहुत ही गंभीर और भारी आवाज़ में कुंदन की आँखों में देखते हुए कहा:
"कुंदन! तू रोज़ अपनी छोटी हथौड़ी से मुझे सौ बार 'टिक-टिक' करके चिढ़ाता था। मैंने आज तक कुछ नहीं कहा। लेकिन याद रख, जब ताक़तवर इंसान अपना एक वार करता है, तो कमज़ोर की सारी बकवास एक पल में शांत हो जाती है। इसीलिए दुनिया कहती है— 'सौ सुनार की... और एक लोहार की!'"
उस दिन के बाद से कुंदन सुनार ने कभी मंगल लोहार की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखा और बाज़ार में शांति छा गई।
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