"अधजल गगरी छलकत जाए"

'पहलवानपुर' गाँव में 'चंपक' नाम का एक बहुत ही दुबला-पतला और कमज़ोर सा नौजवान रहता था। चंपक का शरीर ऐसा था जैसे कोई 'सूखी हुई लकड़ी' हो। एक दिन चंपक काम ढूँढने के लिए शहर चला गया।
शहर में उसे एक बहुत बड़े अखाड़े में 'झाड़ू लगाने' और पहलवानों की मालिश करने का काम मिल गया। चंपक ने वहाँ कुछ महीने काम किया। उसने पहलवानों को कसरत करते और दाँव-पेंच लगाते हुए देखा, लेकिन खुद कभी अखाड़े की मिट्टी तक नहीं छुई।
झूठा घमंड और दिखावा: छह महीने बाद, चंपक वापस अपने गाँव लौटा। लेकिन अब उसका 'दिखावा' देखने लायक था!
उसने शहर से एक तंग और चमकदार लाल रंग की 'टी-शर्ट' खरीद ली थी। वह अपने दुबले-पतले शरीर को ज़बरदस्ती फुलाकर, छाती बाहर निकालकर और अपनी बाहों को ऐसे फैलाकर चलता था जैसे वह बहुत बड़ा 'चैंपियन पहलवान' बन गया हो।
गाँव की चौपाल पर आकर उसने ज़ोर-ज़ोर से डिंगें मारनी शुरू कर दीं: "अरे गाँव वालो! तुम मुझे क्या समझ रहे हो? मैं शहर का सबसे बड़ा पहलवान बन चुका हूँ। मैंने बड़े-बड़े 'टाइगर' पहलवानों को आसमान में उछाल कर ज़मीन पर पटका है। मेरे डोलों (Biceps) में लोहे जैसी ताक़त है। कोई है इस गाँव में जो मुझसे पंजा लड़ा सके?"
गाँव के सीधे-सादे लोग उसकी लाल टी-शर्ट और बड़ी-बड़ी बातें सुनकर सच में उसे बहुत बड़ा पहलवान मान बैठे। चंपक रोज़ सुबह अखाड़े के पास जाकर ज़ोर-ज़ोर से जाँघों पर ताल ठोकता— 'थपाक्... थपाक्!' और हवा में नकली घूँसे चलाता।
हवा निकलना: उसी गाँव में 'भीमा' नाम का एक असली पहलवान रहता था। भीमा का शरीर पहाड़ जैसा था, लेकिन वह स्वभाव से बहुत ही 'शांत और कम बोलने वाला' इंसान था। वह रोज़ चुपचाप अपनी कसरत करता था और कभी अपनी ताक़त का दिखावा नहीं करता था।
चंपक अपनी बकवास में इतना अंधा हो गया कि उसने भरी चौपाल में 'भीमा पहलवान' का मज़ाक उड़ा दिया और उसे कुश्ती की चुनौती दे डाली!
अगले दिन पूरा गाँव अखाड़े के पास इकट्ठा हो गया। चंपक अपनी लाल टी-शर्ट पहनकर, अजीब-अजीब सी उछल-कूद करते हुए अखाड़े में आया। वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था: "आज मैं भीमा की हड्डियाँ तोड़ दूँगा!"
भीमा बहुत ही शांति से, बिना कोई आवाज़ किए अखाड़े में उतरा।
जैसे ही रेफरी ने सीटी बजाई— 'पीऽऽऽ!' चंपक चिल्लाता हुआ भीमा की तरफ दौड़ा। लेकिन भीमा ने अपनी जगह से हिले बिना, बस अपना 'एक भारी हाथ' चंपक की गर्दन पर रखा और उसे हवा में किसी 'खिलौने' की तरह उठा लिया!
चंपक के पैर हवा में साइकिल चलाने लगे। उसकी सारी हवा निकल गई। उसका चेहरा डर से पीला पड़ गया और वह हवा में लटकते हुए ही रोने लगा: "अरे भइया! मुझे छोड़ दो। मैंने तो कुश्ती कभी लड़ी ही नहीं, मैं तो बस झाड़ू लगाता था!"
भीमा ने उसे बहुत ही आराम से ज़मीन पर वापस रख दिया। चंपक की यह हालत देखकर पूरा गाँव पेट पकड़कर हँसने लगा।
तभी गाँव के सरपंच ने भीमा की पीठ थपथपाई और हँसते हुए चंपक से कहा: "अरे चंपक! तूने देखा भीमा को? इसके पास असली ताक़त है, इसलिए यह पूरे भरे हुए मटके की तरह बिल्कुल 'शांत' था। और एक तू है, जिसके पास ताक़त के नाम पर बस हवा भरी थी, और तू पूरे गाँव में शोर मचाता घूम रहा था। तेरी हालत देखकर तो वही कहावत याद आती है— 'अधजल गगरी... छलकत जाए!'"
चंपक शर्म के मारे अपना मुँह छिपाकर अखाड़े से ऐसा भागा कि फिर कभी उसने पहलवानी का नाम नहीं लिया।
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