"बगल में छोरा नगर में ढिंढोरा"

'मिसरीपुर' गाँव में एक बहुत ही भुलक्कड़ लेकिन तेज़ आवाज़ वाली 'पार्वती दादी' रहती थीं। दादी की उम्र सत्तर पार कर चुकी थी। उन्हें बिना अपने मोटे शीशे वाले चश्मे के कुछ भी साफ़ दिखाई नहीं देता था।
एक सुबह, पार्वती दादी कुएँ पर मुँह धो रही थीं। मुँह पर पानी मारने के लिए उन्होंने अपना चश्मा आँखों से निकाला और उसे खिसका कर 'अपने सिर पर (बालों के ऊपर)' टिका लिया।
मुँह धोने के बाद दादी चश्मा आँखों पर लाना भूल गईं और सीधे रसोई में चली गईं। जब उन्हें सब्ज़ी काटने के लिए चश्मे की ज़रूरत पड़ी, तो उन्होंने अपनी आँखों पर हाथ लगाया— चश्मा गायब था!
दादी का हंगामा: दादी की याददाश्त कमज़ोर थी। वे भूल गईं कि चश्मा सिर पर ही रखा है। उन्होंने पूरे घर में आसमान सिर पर उठा लिया।
"अरे मेरा चश्मा कहाँ गया? चोर... चोर! मेरे घर में चोरी हो गई!" दादी ने बिस्तर के नीचे झाड़ू मार-मार कर चश्मा ढूँढा। आटे के कनस्तर (Drums) खाली कर दिए। घर के कोने में शांति से सो रहे कुत्ते (शेरू) को लाठी मारकर उठाया और उसके नीचे भी चश्मा ढूँढा, लेकिन चश्मा तो सिर पर था, मिलता कैसे!
दादी रोती-पीटती घर से बाहर गाँव की चौपाल पर आ गईं। "हाय रे! किसी ने मेरा सोने के फ्रेम वाला चश्मा चुरा लिया। मैं अंधी हो गई रे!" दादी की तेज़ आवाज़ सुनकर पूरा गाँव इकट्ठा हो गया। सरपंच जी भी दौड़े-दौड़े आए। गाँव के सारे नौजवान दादी का चश्मा ढूँढने के लिए पूरे गाँव में फैल गए। किसी ने मुनीम की दुकान छानी, तो कोई तालाब के किनारे ढूँढने लगा। पूरे नगर में 'ढिंढोरा' (हंगामा) मच गया।
चश्मे की बरामदगी: तभी भीड़ में से एक छोटा सा पाँच साल का बच्चा, 'राजू', अपनी हँसी रोकते हुए दादी के पास आया।
राजू ने दादी के कुर्ते को खींचकर कहा: "दादी... ओ दादी! आप पूरे गाँव में चश्मा ढूँढ रही हो, ज़रा एक बार अपने सिर पर तो हाथ लगाओ!"
पार्वती दादी ने बड़बड़ाते हुए अपने काँपते हाथों को अपने सिर पर रखा। जैसे ही उनके हाथों को सिर पर टिका हुआ वह 'मोटा चश्मा' महसूस हुआ, दादी की आवाज़ गले में ही अटक गई। उनका रोना एकदम बंद हो गया।
दादी ने जल्दी से चश्मा सिर से नीचे खींचकर आँखों पर लगा लिया।
पूरी भीड़ यह नज़ारा देखकर एक सेकंड के लिए सन्न रह गई और फिर पूरा गाँव पेट पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा— "हा हा हा!"
सरपंच जी ने हँसते-हँसते अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा और कहा: "अरे पार्वती काकी! तुमने तो गज़ब कर दिया। चश्मा तुम्हारे सिर पर बैठा था और तुमने पूरे गाँव की नींद हराम कर दी। तुम्हारी इस हरकत पर तो बस एक ही कहावत सटीक बैठती है— 'बगल में छोरा... और नगर में ढिंढोरा!'" (यानी बच्चा अपनी ही गोद में है, और पूरे गाँव में मुनियादी करवा रहे हैं कि बच्चा खो गया)।
दादी शर्म से लाल हो गईं और अपनी छड़ी टेकते हुए चुपचाप अपने घर में खिसक लीं।
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